कुछ बातें जो संभ्रात इतिहास में दर्ज नहीं की जा सकेंगी

ये जो राजनीति है न लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ये जो राजनीति है न लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बिहारी बहुएं और अंधे लोग

बार बार फोन की घंटी ने उठने पर मजबूर कर दिया फोन सी एन एन की रिपोर्टर का था जो मुझसे ओ पी धनकर नाम के बी जे पी नेता के बयान पर प्रतिक्रिया चाहती थी! कौन सा बयान और कौन हैं ये धनकर
कई दिनों से टी वी और अखबार से दुरी थी सो मुझे कुछ पता ही नहीं था खैर उन्होंने बताया की भाजपा की किसान इकाई के नेता ने हरियाणा में सरकार बनने पर वहाँ के कुंवारे युवाओं को बिहारी लड़कियां लाकर ब्याह करने का वादा किया है! उन्होंने ने सुशिल मोदी नाम के बिहारी नेता के साथ अपने अच्छे रिश्ते की भी दुहाई दी है! खैर मैंने अपनी संतुलित सी प्रतिक्रिया दे दी की ये अच्छी बात नहीं है और इससे समस्या और तस्करों के हौसले बढ़ेंगे!
मगर उत्सुकता में मैं फटाफट इन्टरनेट सर्च करके विस्तार से खबर की पड़ताल की देख कर ताज्जुब हुआ की कई सामाजिक संगठनों के साथ साथ कांग्रेस पार्टी की महिला शाखा ने भी इसकी आलोचना की है और कहा है की इससे तस्करी को बढ़ावा मिलेगा! अब मैं आश्चय्चाकित था अभी कोई साल भर पहले इसी पार्टी की सदस्य और देश की महिला एवं बाल कल्याण मंत्री ने इस प्रकार की शादी को अन्तर जातीय क्षेत्रीय बता कर इसको बढ़ावा दिए जाने की वकालत संसद में की थी! और जब विरोध स्वरुप मैंने उन्हें मेल लिखा तो कोई जवाब भी नहीं आया था!
 भाजपा के कृषक इकायोई के इस नेता के बयान पर कम से कम मुझे कोई ताज्जुब नहीं हुआ हो भी क्यूँ पिछले आठ से ज्यादा वर्षों से समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा इसे न्यायसंगत ठहराते हुए देखा सुना है! तो ज़ाहिर है वोट के खातिर समाज में तमाम विषमता घोलने वाली एक पार्टी के नेता से क्या अपेक्षा की जा सकती है! वैसे भी इससे पहले भी उत्तराखंड त्रासदी के समय हरयाणा के एक धर्म गुरु ने उत्तराखंड वासियों पर असीम अनुकम्पा दीखते हुए अपने शिष्यों की शादी का ऑफर दिया था! 
आह! अब ये बिदाई के समय ख़ुशी के आंसू तो नहीं हैं 
खैर 
वधू तस्करी का सबसे दुखद पहलु यही है की इसे हर प्रकार से न्याय संगत ठहराने की कोई कसर नहीं छोड़ी जाती! अकादमिक शोधार्थी हों या मीडिया या सामाजिक कार्यकर्त्ता समाज का हर तबका इसे लैंगिक असंतुलन के परिणाम के नाम पर एक प्रकार से उचित ठहरा देता है! सारा शोध खानपान में बदलाव और सांस्कृतिक आदान प्रदान पर आधारित हो जाता है! लड़कियों का साक्षात्कार उसी स्थान पर किया जाता है जहाँ उसे कई लोग घेरे खड़े होते हैं ज़ाहिर है साक्षात्कारकर्ता भी उन लड़कियों को उसके शोषको का हिस्सा लगता है (ज़्यादातर मामलों में होता भी है). एक जर्मन पत्रकार को यही दिखने के लिए मैंने पिछले साल एक ही लड़की से दो जगह साक्षात्कार करवाए थे! एक उसी गांव के भीतर जहाँ वो अपने तथाकथित पति के साथ रहती थी और दूसरा अपने एक कार्यकर्त्ता के घर! दोनों ही साक्षात्कार में आसमान ज़मीन का अंतर था! कारण साफ़ है की उसी गांव वातावरण और लोगो के बीच कोई भी लड़की उनके खिलाफ नहीं बोल पाती और अगर बोल दिया तो बाद में बचायेगा कौन ? ऐसे कई मामले मेरे दिमाग में अब भी ताज़ा हैं जिसमे किसी ने खरीद कर लायी गयी इन लड़कियों से बातें की और कुछ दिनों बाद वहाँ से गायब पायी गयीं! सामाजिक रूप से अनुमोदित वधू तस्करी को लिंगानुपात से जोड़ कर केवल अंतर क्षेत्रीय विवाह के बतौर स्थापित करने की कोशिश संभ्रात समाज की वर्गीय साजिश है जिसमे उसके अपने हित छुपे हैं ये किसी से नहीं छिपा की मीडिया शिक्षा और देश की मुख्यधारा (जो दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में ही निहित तथा सिमित है) में क्रियाशील समाज किसी न किसी रूप में लड़कियों का आयात राज्यों से सम्बन्ध रखता है जो उसे वर्गीय और सामाजिक ज़रूरतों के कारण वधू तस्करी को अनुमोदित करने पर मजबूर करता है! यही वो समाज है जिसे अपने घर के काम के लिए भी सस्ते (कई बार बिना वेतन के) घरेलु मजदूर उन्ही तस्करों से खरीदने है! ये वर्ग समाज के भीतर की किसी प्रकार के बदलाव की कोई मुहीम चलने का समर्थन और आशा तो करता है मगर कोई कोशिश नहीं करता!
शायद यही वजह है की दिल्ली से चलने वाली सैकडो संस्थाएं देश के तमाम हिस्सों में समानता और महिला भागीदारी के लिए काम तो करती है मगर दिल्ली के आसपास का ये क्षेत्र अब भी इनके लिए अछूता है जबकि ये पूरा क्षेत्र कठोर पितृसत्तात्मक समाज के कब्ज़े में हैं जहाँ महिला के जीवन का पूरा चक्र खतरे में है! कन्या भ्रूण हत्या हो या जाति अथवा पहचान आधारित सामूहिक बलात्कार या सम्मान हत्यां या वृद्ध महिलायों की सुनियोजित हत्याएं ये सब सामाजिक अनुमोदन दिल्ली की नाक के नीचे घटता है और कभी कभी अखबारों और टीवी की सुर्खियाँ भी बटोरता है मगर ज़मीनी काम का आभाव बदस्तूर जारी है!
पिछले आठ सालों में वधू तस्करी पर काम करते हुए मुझे हमेशा ही तमाम मुद्दों पर अकेला ही जूझना पड़ा! काम करने आफिस चलाने कार्यकर्ताओं को वेतन देने छोटी छोटी ज़रुरतो के लिए पैसा का इंतज़ाम हो या सहज क़ानूनी सहायता और किसी अन्य प्रकार के सहयोग का! ना सरकारें कभी तय्यार हुयी ना ही कोई देशी विदेशी एन जी ओ. रही बात पोलिस और प्रशासनिक महकमे की तो वो  समाज में अशांति फैल जाने का खतरा बता कर अपना पल्ला आसानी से झाड लेने में महारत रखता है!
   इस पुरे मामले को दूसरा रुख देने के क्रम में आयातित लड़कियों के माता पिता को ही गरीबी के कारण अपनी लड़कियां बेच देने के लिए आरोपित किया जाता है (ध्यान रहे की वधू तस्करी में ज़्यादातर मामले आप नब्बे फीसद भी कह सकते हैं पीडिता के माँ बाप की शिकायत पर ही खुलते अथवा रेस्कू आपरेशन होते हैं) और इस तर्क से सरकार और सामाजिक संगठन हरयाणा और पंजाब जैसे राज्यों में जेंडर और महिला भागीदारी पर काम नहीं करने का जायज़ बहाना बना लेते हैं! तो क्या ये महज़ एक विडम्बना भर है की हरयाणा जैसा उन्नत राज्य जहाँ १२५ विकास खंडों में २५० सरकारी गौशाला है वहाँ पुरे राज्य में महिलाओं के केवल तीन शेल्टर होम हैं जिसकी स्थिति किसी भी गौशाला से किसी हाल में बेहतर नहीं है!    
इन राज्यों में लड़कियों के आयात का एक लंबा इतिहास है जो ना केवल यौन उत्पीडन और शोषण से जुड़ा है बल्कि बंधुआ मजदूरी और नव दलितवाद से भी सीधा वास्ता रखता है! और यही कारण है की जातीय तथा धार्मिक रूप से दास रखने का आदी हमारा समाज एक नया समुदाय उत्पन्न कर रहा है जो उनकी सेवा में सदैव ही तत्पर रहे!
अगर आप याद करें की दिल्ली के जघन्य सामूहिक बलात्कार के परिणाम में उम्दा जनाक्रोश कितना जल्दी और चयांत्मक तरीके से ठंडा हो गया सारी बहस एक जगह आकर रुक गयी! मैं महिला विरोधी होने के आरोप के खतरे के बावजूद साफ़ कहूँगा की इस सारे आक्रोश को एक प्रकार से वर्गाधारित चयनात्मक चेतना के रूप में भी देखे जाने की ज़रूरत है! ऐसा आक्रोश भ्रूण हत्या, सम्मान हत्या, डायन हत्या या दलित नव दलित अल्सख्यक लड़कियों के सामूहिक बलात्कार और जघन्य हत्याओं के विरूद्ध नहीं उभरता! हाँ ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वालों का समर्थन किसी न किसी प्रकार से आ जाता है. भाजपा नेता का बयान भी उसी सामाजिक अनुमोदन और मानसिकता का परिचायक मात्र है!

अभी यक्ष प्रश्न ये हैं की हरयाणा में अगर भाजपा की सरकार आई तो क्या गौशालाओं की तरह महिलाओं और बच्चों के लिए शेल्टर होम की संख्या बढेगी ? क्या वो सम्मान हत्याओं के खिलाफ कानून लाने की हिमायत करेंगे ? क्या वो वधू तस्करी और जबरन शादी के विरूद्ध कार्यपालिका को बेहतर बनाने की दिशा में काम करेंगे ? क्या हरयाणा में भ्रूण हत्या को रोकने और महिला भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए कोई बेहतर उपाय निकालेंगे ? 

लेटस होप की अच्छे दिन आएंगे :)

सिद्धांतहीन राजनीति में भगदड़ :

खबर आई कि

- यशवंत सिन्हा ने भारतीय जनता पार्टी के महत्वपूर्ण पदों से इस्तीफ़ा दे दिया है।

- जसवंत सिंह ने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व और आरएसएस की कटु आलोचना की है.

- पार्टी में उनके खिलाफ़ कार्रवाई को लेकर मतभेद है.

- आरजेडी के महत्वपूर्ण नेता श्याम रजक ने लालू प्रसाद का साथ छोड़ दिया है.

- लालू प्रसाद आहत हैं. कह रहे हैं कि वह कल शाम तक साथ रहने की कसमें खा रहे थे.

- लालू प्रसाद के दल से अन्य लोगों के जाने की भी चर्चा है. वह कह रहे हैं, मैं शून्य से शुरुआत करूंगा.

- लालू प्रसाद का एक और महत्वपूर्ण बयान आया है. एमएलए, एमपी फ़ंड खत्म होना चाहिए. इस फ़ंड के लिए कार्यकर्ता झगड़ रहे हैं.

हालांकि अलग-अलग दलों की ये घटनाएं हैं, पर इन घटनाओं का मूल कारण या उत्स एक है. राजनीतिक दलों के अंदर अब विचार, मूल्य और प्रतिबद्धता नहीं बची है. दलों के अंदर लोकतंत्र नहीं है. हर दल में साइकोफ़ेंट्स (जी-हजूरी करनेवाले) निर्णायक भूमिका में हैं. हालांकि लालू प्रसाद ने लोकसभा में अन्य संदर्भ में यह शब्द इस्तेमाल किया, टीटीएम(ताबड़तोड़ तेल मालिश), पर यही संस्कृति कमोबेश हर दल में हावी है. दरअसल राजनीतिक दल, दल नहीं रह गये, वे परिवार की ईकाई बन गये हैं. जिस कांग्रेस के वंशवाद के खिलाफ़ राजनीति में समाजवादियों या लालू प्रसाद या रामविलास पासवान का उदय हआ, उन्हें मंथन करना चाहिए कि कांग्रेस का परिवारवाद अब उन्हें कितना अपनी गिरफ्त में ले चुका है? करुणानिधि की पार्टी परिवार और रिश्तेदारों की पार्टी बन गयी है. डीएमके कोटे से बना हर मंत्री उनका रिश्तेदार, सगा या उनके कुनबे से है.

वैसे कांग्रेस में भी इस बार मंत्री बननेवाले अनेक युवा सांसद बड़े नेताओं के पुत्र होने की वजह से ही गद्दी पर बैठे हैं. इसी तरह शरद पवार का दल देखिए. भतीजा, बेटी, सभी महत्वपूर्ण पदों पर. इसी तरह मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद और रामविलास पासवान के दलों में सगों और रिश्तेदारों का ओधपत्य और बोलबाला रहा. भारतीय जनता पार्टी में भी, लालू जी के फ्रेज का इस्तेमाल करें, तो टीएमटी तत्वों का बोलबाला है. चुनाव के ठीक पहले सुधांशु मित्तल को पार्टी में महत्व दिये जाने के प्रसंग पर अरुण जेटली और राजनाथ सिंह का विवाद देश ने देखा. सुधींद्र कुलकर्णी की सही आलोचना को भी पार्टी बरदाश्त करने को तैयार नहीं.

यह मत समझिए कि इससे कांग्रेस बरी है. दरअसल भारतीय राजनीति के पतन की संस्कृति का स्र्त तो कांग्रेस ही है. याद करिए, पहली बार 1977 में कांग्रेस हारी. तब ब्रह्मानंद रेड्डी कांग्रेस बनी. देवराज अर्स, जो इंदिराजी के भक्त थे, पार्टी से अलग हो गये. 1980 में भजनलाल जनता पार्टी के मुख्यमंत्री थे, हरियाणा राज्य में. 1980 के लोकसभा चुनाव में इंदिराजी दोबारा सत्तारूढ़ हईं, तो वह रातोंरात मंत्रिमंडल समेत कांग्रेस में चले गये. बाद में प्रणव मुखर्जी ने राजीव गांधी का साथ छोड़ा. नरसिंह राव के कार्यकाल में नारायण दत्त तिवारी और अर्जुन सिंह अलग हए. 2000 में जब एनडीए ताकतवर हआ, तो अनेक वरिष्ठ कांग्रेसी दल छोड़ने लगे. वे सोनिया गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठाने लगे. नजमा हेपतुल्ला और केसी पंत जैसे लोग कांग्रेस छोड़ गये. कर्नाटक चुनाव के आसपास मारग्रेट अल्वा जैसी नेता भी कांग्रेस को पानी पी-पी कर कोसने लगीं, क्योंकि उनके बेटे को कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया. वह कांग्रेस से निष्कासित हईं और पुन दोबारा कांग्रेस में शामिल हईं. इसी तरह संजय गांधी के अनेक प्रिय नेता विद्याचरण शुक्ल जैसे महारथी, सत्ता जाते ही उनको छोड़ कर सत्ता पानेवाली पार्टी के चरण पादुका उठाने लगे. यह भी खबर आयी है कि पीए संगमा ने कैसे कांग्रेस छोड़ने के नाम पर जाकर बड़े कांग्रेसी नेताओं से क्षमा मांगी है. उल्लेखनीय है कि उनकी बेटी केंद्र सरकार में सबसे कम उम्र की मंत्री बनी हैं.

राजनीतिक दलों के अंदर के परिदृश्य या घटनाएं क्या बताती हैं? पहली चीज, राजनीतिक नेताओं का सत्ता में रहना ही एक मात्र मकसद हो गया है. सत्ता के बगैर बिन पानी मछली की तरह धीरे-धीरे नेता बनते जा रहे हैं. फ़र्ज करिए, कांग्रेस सत्तारूढ़ नहीं हई होती, तो कांग्रेस में यही भगदड़ मचती, जो आज भाजपा, राजद, तेलुगुदेशम पार्टी, समाजवादी पार्टी या लोक जनशक्ति पार्टी में है. जब राजनीति का अर्थ सिर्फ़ सत्ता और कुरसी पाना हो जाये, तब राजनीतिक दलों में ऐसे ही बिखराव व टूट होते हैं. क्या कारण था कि पहले कांग्रेस, जनसंघ, समाजवादी दल या कम्युनिस्टों के बीच अनेक ऐसे बड़े नेता हए, जो पार्टी कार्यकर्ता के रूप में ही रह गये. कभी लोकसभा या विधानसभा का चेहरा नहीं देखा. तब ऐसे लोग विचारधारा के कारण दलों में आते थे. उनका कनविक्सन (दृढ़ मत) विचारों के प्रति होता था, सत्ता या पद के प्रति नहीं. इसलिए कि तप, त्याग और वैचारिक समर्पण का जीवन, वे जीते थे. डॉ लोहिया या जयप्रकाश नारायण जैसे लोग किस धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं? ये तो बड़े नेता थे. मामूली कार्यकर्ताओं की प्रतिबद्धता भी पार्टी के विचारों के प्रति होती थी. व्यक्ति निष्ठा या नेता की गणेश परिक्रमा में ये कार्यकर्ता नहीं रहते थे. तब दलों का वार्षिक अधिवेशन होता था. कार्यकर्ता-नेता एक साथ रहते थे. पार्टी के वार्षिक अधिवेशन में हर गंभीर मुद्दे पर पार्टी के अंदर बहस होती थी. नेता की इच्छा के अनुसार पार्टी की नीतियां नहीं बनती थीं. पार्टी के अंदरूनी लोकतंत्र और बहमत के आधार पर फ़ैसले होते थे. नीतियां तय होती थीं. और हर दल में नेताओं के विकसित होने का, बढ़ने का माहौल होता था. साधारण कार्यकर्ता भी अपनी प्रतिबद्धता, श्रम और ईमानदारी से शीर्ष पर पहंच सकता था. अब ये चीजें दलों में है ही नहीं. क्या विडंबना है कि ये दल देश में तो लोकतंत्र चलाने का ठेका लेते हैं, पर अपने दलों के अंदर लोकतांत्रिक पद्धति नहीं अपनाते? ऐसी स्थिति में सत्ता जाते ही, दलों के अंदर पलायन, टूट और विरोध के स्वर स्वाभाविक परिणति है. लालू प्रसाद ने सही कहा है कि अब एमपी और एमएलए विकास फ़ंडों को हटाया जाना चाहिए. सच यह है कि कमीशन और कमाई के स्र्ोत के रूप में दलों के कार्यकर्ता इस विशेष फ़ंड को देखते हैं. जिस दल में अब इस फ़ंड को पाने की स्थिति (एमएलए, एमपी बनाने) तक पहुंचाने की क्षमता घटती दिखाई दे रही है, ऐसे सूखते तालाब (राजनीतिक दल) से राजनीतिक पक्षी उड़ रहे हैं. उन्हें जहां भी हरा-भरा दिखता है, यानी जो भी दल उन्हें सत्ता के करीब पहंचता दिखाई देता है, उसके पास वे पहंच जाते हैं. इसलिए घोर वामपंथ से घोर दक्षिणपंथ की यह यात्रा ये नेता बेशर्म व बेहिचक कर रहे हैं.

भारतीय लोकतंत्र के लिए ऐसी राजनीतिक घटनाएं गंभीर चेतावनी हैं। एक तरफ़ बड़े पैमाने पर मतदाताओं की बढ़ती उदासीनता यानी वोट देनेवालों की घटती संख्या. दूसरी ओर राजनीतिक दलों के अंदर अंदरूनी लोकतंत्र का न होना, वैचारिक अराजकता, स्वअनुशासन का अभाव, नैतिक आग्रह का न होना, लोकतंत्र की जड़ों को लगातार कमजोर करेगा. जब बड़े-बड़े नेता छोटे-छोटे लाभ के लिए बेचैन दिखाई देते हैं, तब वे क्या आदर्श या प्रभाव कार्यकर्ताओं पर छोड़ पाते हैं? अगर नेताओं के साथ सत्ता है, तो कार्यकर्ता झुकते हैं. सत्ता के भय से या सत्ता में हिस्सेदारी मिलने के लोभ में. जब बड़े नेताओं के हाथ से सत्ता चली जाती है, तो कार्यकर्ता देखते हैं कि इनसे कोई लोभ-लाभ सधनेवाला नहीं, तो वे उनको छोड़ कर कहीं और निकल जाते हैं. अगर इन बड़े नेताओं का नैतिक असर होता, वैचारिक असर होता, तो शायद उनके इर्द-गिर्द ऐसे ही कार्यकर्ता जुटते, जो उन्हें संकट आने पर नहीं छोड़ते. यह युग सत्ता का है. पैसे का है. लोभ का है. लालच का है. यह माहौल इन्हीं बड़े नेताओं ने या राजनीतिक दलों ने बनाया है. इसलिए समय-समय पर ये दल या नेता, इसके कुपरिणाम भुगतने को भी अभिशप्त हैं.

लोकतंत्र के शिक्षक हैं ये

झारखण्ड से ...........
जंगल और पहाड़ों के बीच रहते हैं ये। आधुनिक जीवन शैली से कोसों दूर। ये ज्यादा पढ़े-लिखे भी नहीं हैं। अधिकतर निरक्षर। कागजी ज्ञान नहीं। हालाकि जो ज्ञान इनके पास है, उसके लिए मनोविज्ञान, आचार शास्त्र व समाज शास्त्र की कई पोथिया पढ़ने की जरूरत पड़ती है। इन पोथियों के पढ़े बिना ही ये इस क्षेत्र के पंडित हैं। हमारे आदर्श और लोकतंत्र के शिक्षक हैं ये। बात हो रही है खूंटी जिले के गावों में रहनेवाले आदिवासियों की। फटे-पुराने कपड़े पहने लोकतंत्र के ये प्रहरी कोसों दूर चल कर अपने बूथ पर पहुंचते हैं और अपना वोट डालते हैं। ये बोगस वोटिंग नहीं करते। सुरक्षा रहे न रहे इनके बूथ पर कोई हो-हल्ला नहीं। धूप में खड़े ये अपनी बारी का इंतजार करते हैं। बारी आने पर अपना वोट डाला और वहा से चल दिए।

बृहस्पतिवार को खूंटी लोकसभा क्षेत्र के दर्जनों मतदान केंद्रों पर सुरक्षाबलों की तैनाती नहीं थी। प्रशासन को जैसे पता था कि वहा पुलिस भेजो तब भी ठीक और न भेजो तब भी। सात बजे सुबह से ही ये पहुंचने लगे थे। मतदान बंद हुआ और सबने घर की राह ली। शहरी क्षेत्र से ग्रामीण क्षेत्रों का मत प्रतिशत अधिक रहा तो इसका कारण यही है कि इन ग्रामीणों की आस्था लोकतंत्र में है और ये वोट देने के प्रति किसी भी शिक्षित व्यक्ति से अधिक जागरूक हैं। मतदान को लेकर सभी जागरूकता कार्यक्रम शहरी क्षेत्र में ही चले। प्रशासन ने भी प्रखंड मुख्यालयों में ही होर्डिग लगाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली। लेकिन, इससे इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा।

बृहस्पतिवार को कर्रा जाने के क्रम में मिला गारू गांव। इस गाव का मतदान केंद्र चौकीदार के भरोसे। बिरहू, टुटोली, सावड़ा, कुदा, सागोर आदि कई बूथ, लेकिन दृश्य वहीं। सुरक्षाकर्मी कहीं नहीं। कर्रा से तोरपा जाने के रास्ते में पड़नेवाले बूथों पर भी यही नजारा देखने को मिला। यह पूछने पर कि क्या उन्हें डर नहीं कि कोई बोगस वोट डालेगा, या बूथ पर कब्जा कर लेगा। गारू के भुवन ने कहा नहीं, यहा ऐसा नहीं होता। एक युवक से पूछने पर कि क्या आपने वोट डाल दिया, नहीं हम मेहमानी में आए हैं, वोट नहीं देंगे, उसने कहा। एक वोट दे देंगे तो क्या हो जाएगा, उसने उल्टे सवाल किया, हम क्यूं दें वोट जब हमारा यहा नाम ही नहीं। अपने इसी चरित्र और मानसिकता से ये लोग पढ़े-लिखों से बेहतर हैं। सचमुच इनसे शिक्षा लेने की आवश्यकता है।

नेता वही, जो धारा बदल दे, देश बदल दे

चार बार अमेरिका के राष्ट्रपति रहनेवाले फ्रैंकलिन डीलेनो रूजवेल्ट. जिनकी मौत पर विंस्टन चर्चिल ने कहा, उनका जीवन मानवीय नियति की अत्यंत प्रभावकारी घटनाओं में से एक है. जब वह अमेरिका के राजनीतिक क्षितिज पर उभरे, तब अमेरिका दयनीय हाल में था. पर रूजवेल्ट ने अमेरिका को शिखर पर पहंचाया. अमेरिका, भयावह मंदी की चपेट में था. रूजवेल्ट ने न सिर्फ़ मंदी का मुकाबला किया, बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था को दुनिया की ताकतवर अर्थव्यवस्था में बदल दिया. जो मुल्क लड़खड़ा रहा था, उसकी सेना द्वितीय विश्वयुद्ध में विश्व मानचित्र पर छा गयी. इस तरह रूजवेल्ट ने अमेरिकी शताब्दी की नींव रखी. दुनिया का सबसे ताकतवर देश बनाया. समृद्ध देश और मुक्त समाज बनाया. रूजवेल्ट, मिलनसार थे, उदार विचारों के थे. अदभुत निजी साहस से संपन्न, धैर्यशील, बेहतर मर्यादित इंसान. पर निर्णयों में बेरहम और निष्ठुर भी. सफ़ल रणनीतिकार. वह देश के अंदर और बाहर लोकतंत्र के महान शिल्पियों में गिने गये.

पहली बार 1932 में वह राष्ट्रपति बने. देश ओर्थक मंदी से तबाह था. तीन करोड़ लोग बेरोजगार थे. पद संभालते ही रूजवेल्ट ने न्यूडील पॉलिसी का क्रियान्वयन शुरू किया. चुनाव प्रचार में उन्होंने जनता से वादा किया था, मैं जीता तो इस नीति को लागू कंगा. मंदी खत्म करूंगा. देश को अत्यंत समृद्ध बनाऊंगा. खेती, व्यापार और उद्योग में उन्होंने बड़े पैमाने पर सरकारी योजनाएं क्रियान्वित कीं. वाल स्ट्रीट क्रैश कर चुका था. इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था तबाह थी. इस तबाही से शिखर तक अमेरिका पहंचा, रूजवेल्ट के नेतृत्व में. बड़े नेता के लिए बड़ा संकट, बहत बड़ा अवसर भी होता है. भारत में आज संकट है, भ्रष्टाचार का, आतंकवाद का, नेताओं के बढ़ते परिवार मोह का, राजनीति में अपराधियों के आने का, देश में एक दूसरे के प्रति बढ़ते विद्वेष का.. मुसीबतों और चुनौतियों से घिरा है, यह मुल्क? क्या इन चुनावों में एक भी नेता है, जो यह झलक देता हो कि देश उसके नेतृत्व में कोई सपना देख सकता है?

रूजवेल्ट प्रशासन ने जनकल्याण के अनगिनत कदम उठाये. पूंजीवाद के पक्षधर और मुक्त बाजार के भाष्यकार, रूजवेल्ट के खिलाफ़ थे. पर रूजवेल्ट ने सामाजिक सुरक्षा का प्रावधान किया. ट्रेड यूनियन संगठित करने के मजदूरों के अधिकार की रक्षा की. कामकाज का समय निर्धारित किया. वेतन का सुस्पष्ट प्रावधान कराया. साथ ही साथ यह भी सुनिश्चित किया कि अमेरिका ओर्थक रूप से सबसे ताकतवर बने. अमरीकियों का खोया विश्वास इस राजनीतिक व्यवस्था में लौटे.

रूजवेल्ट का ख्वाब था कि दुनिया अमेरिका को एक बेहतर, विश्वसनीय और भरोसेमंद देश माने. अमेरिका, दुनिया में आजादी का गारंटर माना जाये. वह शुरू से नाजियों के खिलाफ़ थे. फ्रांस की पराजय के बाद उन्होंने ब्रिटेन को हरसंभव मदद की. वह नाजियों के खिलाफ़ लड़े. 1941 में रूजवेल्ट ने चार मूल्य (फ़ोर फ्रीडम्स) गढ़े. पहला, अभिव्यक्ति की आजादी (फ्रीडम आफ़ एक्सप्रेशन), दूसरा, इबादत की आजादी (फ्रीडम आफ़ वरशिप), भूख से छुटकारा (फ्रीडम फ्राम वांट), भय से मुक्ति (फ्रीडम फ्राम फ़ीयर). 1941 में रूजवेल्ट चर्चिल से मिले. इस तरह अटलांटिक चार्टर बना, जिसमें राष्ट्रों को अपनी सुरक्षा करने और अस्तित्व की रक्षा का नैसर्गिक अधिकार है, यह कहा गया. इस तरह संयुक्त राष्ट्र संघ को गढ़ने वाले सिद्धांत तय किये गये. 1941 में पर्ल हार्बर पर जापान का हमला हआ. इसके बाद रूजवेल्ट जर्मनी और जापान को पराजित करना जरूरी माना. रूजवेल्ट ने कहा भी, जिन मूल्यों के लिए हम लड़ते हैं, अगर वे मूल्य ही हार जायें, तो युद्ध लड़ना और जीतना निर्थक है. इस तरह रूजवेल्ट ने न सिर्फ़ संयुक्त राष्ट्र की नींव डाली, बल्कि पूर्वी यूरोप में स्टालिन की लगभग सभी शर्ते मानी. इसके कारण उनकी कटु आलोचना हई. पर रूजवेल्ट नहीं चाहते थे कि फ़िर कोई दूसरा युद्ध दुनिया में हो. रूजवेल्ट का विश्वास था कि लुटेरों से, पैसेवालों से, ताकतवर लोगों से, कमजोर लोगों की रक्षा ही धर्म है. हालांकि उनकी परवरिश और पैदाइश एक संपन्न परिवार में थी. पर उन्हें जीवन में एक अत्यंत प्रेरक हेडमास्टर मिला, जिसने उनके अंदर सामाजिक दायित्व का गहरा बोध कराया. उनकी पत्नी भी एक संपन्न परिवार से थी. पर प्रगतिशील सामाजिक आदशाब के प्रति प्रतिबद्ध. वंचितों के लिए वह लगातार लड़ती रहीं. 1962 में अपनी मृत्यु तक.

रूजवेल्ट का लोगों से संवाद अद्भत था. इस लोकसंपर्क में वह जीनियस माने गये. अपने घर में आग तापते हए जब वह रेडियो पर अपनी नीतियां या प्राथमिकताएं बताते थे, तब लाखों-करोड़ों अमेरिकी सांस थामें उनकी बातें सुनते थे. जनता को भरोसा था कि यह आदमी झूठ नहीं बोलेगा. छलेगा नहीं. रूजवेल्ट के शब्दों में जादू था. अत्यंत कठिन दिनों में रूजवेल्ट ने अमरीकियों से कहा, हमें नहीं डरना है, बल्कि डर को ही डरना है.

दूसरे विश्वयुद्ध को खत्म कराने के बाद फ़रवरी 1945 में दुनिया के तीन बड़े नेता मिले. माल्टा में. रूजवेल्ट, चर्चिल और स्टालिन. रूजवेल्ट प्रेस से मिले ह्वीलचेयर पर बैठकर. उनका यह रूप अप्रत्याशित था. पर उन्होंने कहा कि इस तरह चेयर पर बैठकर आना ज्यादा अच्छा है बजाय अपने पैरों में दस पौंड स्टील बांध कर खड़ा होकर आने से. पहली बार उन्होंने सार्वजनिक रूप से बताया कि पोलियो के कारण उनके पैर लकवाग्रस्त हो चुके हैं. 39 वर्ष की उम्र में ही. पर उन्होंने इसे छुपाया. पैरों में विभिन्न उपकरण लगाकर, इस अपंगता के खिलाफ़ वह लड़े. बिस्तर पर ही सीमित कर देनेवाला यह रोग, रूजवेल्ट के मनोबल और दृढ़ता को छू तक नहीं पाया. इस व्यक्ति ने अपने समय की सबसे गंभीर चुनौतियां ङोलीं. देश में-विदेश में. 1945 में अचानक उनकी मौत हई. 12 वर्ष के अपने शासनकाल में पोलियो और लकवा से पीड़ित इस इंसान ने अमेरिका को दुनिया में ओर्थक सुपरपावर बनाया. अपने साहस, आस्था और परिश्रम से अमेरिका को महाशक्ति बना दिया. दरअसल नेता वही है, जो धारा बदल दे, देश बदल दे, समाज बदल दे. दुर्भाग्य है कि भारत आज 15वीं लोकसभा का चयन कर रहा है , पर 111 करोड़ की आबादी में एक चेहरा नहीं, जो देश को दुनिया में सर्वÞोष्ठ बनाने का भरोसा दिला सके.