कुछ बातें जो संभ्रात इतिहास में दर्ज नहीं की जा सकेंगी

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खुलेआम बक्लोली

प्रिय देशवासियों
माफ करना मगर प्रिय शब्द सिर्फ इसलिए इस्तेमाल कर रहा हूँ क्यूंकि सब ऐसा करते हैं यही हमारी परंपरा है और परम्पराओं का पालन हम भारतीय बड़े जोश खरोश से करते हैं बल्कि परंपरा के लिए तो हम जान देने और लेने के लिए पिल पड़ते हैं! खैर नकारो के पास इसके अलावा और कोई काम होता भी नहीं! हम पारंपरिक रूप से नकारे और निट्ठल्ले हैं जब विश्व की प्रगति में हमारे योगदान की बात आती है तो हम बड़े शान से अपना शून्य आगे कर देते हैं! आह कितना मज़ेदार है की देश की प्रगति में हमारा योगदान शून्य है और हमें इसका गर्व भी है!
खैर जाने भी दो मगर मैं दिल से कहूँ तो तुम्हें प्रिय देशवासी कहते हुए मुझे तुम्हारी शकल टिंडे जैसी लग रही थी और मेरी जबान में करेले की कड़वाहट आगई थी तो
सो मेरे टिंडा जन
आज मैं कुछ कहना चाहता हूँ ये जानते हुए की तुम सुनना नहीं चाहोगे मत सुनो हो सकता है की तुम्हारी भावना आहत हो जाए! तुम मुझे जो कहना चाहो कहो मगर मेरी बाल सुलभ जिज्ञासा रही की हम अपनी परम्पराओं पर इतना गर्व क्यूँ करते हैं शर्म क्यूँ नहीं करते! हमने क्या किया है जिसपर गर्व किया जाए
शून्य पर क्या गर्व ??
शून्य का अर्थ क्या घंटा ??
फोटो का कोई मतलब नहीं कैमरा मेरे पास है 
सो फोटो खिंच के डाल दिया 

हमेशा बकलोल की तरह परंपरा परंपरा की बात करने वालों मुझे बताओ ज़रा की किस  परंपरा की बात करते हो असमानता की परंपरा की लुटेरो की प्रवृति की परंपरा की, शक्ति के सामने नतमस्तक रहने की परंपरा की कौन सी परंपरा
आजकल सुना है की तुम सहिष्णु समाज होने का दंभ भरते हो, सुनने में आता है की तुम्हें आजकल बलात्कार महिलाओं के प्रति हिंसा बहुत बुरी लगती है और कहते हो की ये तुम्हारी परंपरा नहीं! झूठ मत बोलो यारो झूठ मत बोलो ये विदेश से आयत की हुयी परंपरा नहीं है ये तुमने जनम दी है तुम्हारे पूर्वजो ने
मानलो तो शायद बदल पाओ
मगर मैं भी तुममे से एक हूँ जानता हूँ ना मानोगे ना
और ना ही तुम किसी असमानता के खिलाफ हो ना सहिष्णु हो,
तुम्हें दूसरों को दास बनाने की दमित इच्छाओं ने दास बनाया हुआ है!
तुम्हें मंदिरों मस्जिदों के आसपास होने पर आपत्ति है तुम इधर उधर भले कहो की ये तुम्हारे समाज की महान सहिष्णु परंपरा का प्रतीक है मगर दिल में मंदिर और मस्जिद को अलग करने की आग धकती रहती है!
तो जाओ झंडा लगा है लंबा चौड़ा

देशभक्ति जागो जन गन गाओ और सो जाओ 

बिहारी बहुएं और अंधे लोग

बार बार फोन की घंटी ने उठने पर मजबूर कर दिया फोन सी एन एन की रिपोर्टर का था जो मुझसे ओ पी धनकर नाम के बी जे पी नेता के बयान पर प्रतिक्रिया चाहती थी! कौन सा बयान और कौन हैं ये धनकर
कई दिनों से टी वी और अखबार से दुरी थी सो मुझे कुछ पता ही नहीं था खैर उन्होंने बताया की भाजपा की किसान इकाई के नेता ने हरियाणा में सरकार बनने पर वहाँ के कुंवारे युवाओं को बिहारी लड़कियां लाकर ब्याह करने का वादा किया है! उन्होंने ने सुशिल मोदी नाम के बिहारी नेता के साथ अपने अच्छे रिश्ते की भी दुहाई दी है! खैर मैंने अपनी संतुलित सी प्रतिक्रिया दे दी की ये अच्छी बात नहीं है और इससे समस्या और तस्करों के हौसले बढ़ेंगे!
मगर उत्सुकता में मैं फटाफट इन्टरनेट सर्च करके विस्तार से खबर की पड़ताल की देख कर ताज्जुब हुआ की कई सामाजिक संगठनों के साथ साथ कांग्रेस पार्टी की महिला शाखा ने भी इसकी आलोचना की है और कहा है की इससे तस्करी को बढ़ावा मिलेगा! अब मैं आश्चय्चाकित था अभी कोई साल भर पहले इसी पार्टी की सदस्य और देश की महिला एवं बाल कल्याण मंत्री ने इस प्रकार की शादी को अन्तर जातीय क्षेत्रीय बता कर इसको बढ़ावा दिए जाने की वकालत संसद में की थी! और जब विरोध स्वरुप मैंने उन्हें मेल लिखा तो कोई जवाब भी नहीं आया था!
 भाजपा के कृषक इकायोई के इस नेता के बयान पर कम से कम मुझे कोई ताज्जुब नहीं हुआ हो भी क्यूँ पिछले आठ से ज्यादा वर्षों से समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा इसे न्यायसंगत ठहराते हुए देखा सुना है! तो ज़ाहिर है वोट के खातिर समाज में तमाम विषमता घोलने वाली एक पार्टी के नेता से क्या अपेक्षा की जा सकती है! वैसे भी इससे पहले भी उत्तराखंड त्रासदी के समय हरयाणा के एक धर्म गुरु ने उत्तराखंड वासियों पर असीम अनुकम्पा दीखते हुए अपने शिष्यों की शादी का ऑफर दिया था! 
आह! अब ये बिदाई के समय ख़ुशी के आंसू तो नहीं हैं 
खैर 
वधू तस्करी का सबसे दुखद पहलु यही है की इसे हर प्रकार से न्याय संगत ठहराने की कोई कसर नहीं छोड़ी जाती! अकादमिक शोधार्थी हों या मीडिया या सामाजिक कार्यकर्त्ता समाज का हर तबका इसे लैंगिक असंतुलन के परिणाम के नाम पर एक प्रकार से उचित ठहरा देता है! सारा शोध खानपान में बदलाव और सांस्कृतिक आदान प्रदान पर आधारित हो जाता है! लड़कियों का साक्षात्कार उसी स्थान पर किया जाता है जहाँ उसे कई लोग घेरे खड़े होते हैं ज़ाहिर है साक्षात्कारकर्ता भी उन लड़कियों को उसके शोषको का हिस्सा लगता है (ज़्यादातर मामलों में होता भी है). एक जर्मन पत्रकार को यही दिखने के लिए मैंने पिछले साल एक ही लड़की से दो जगह साक्षात्कार करवाए थे! एक उसी गांव के भीतर जहाँ वो अपने तथाकथित पति के साथ रहती थी और दूसरा अपने एक कार्यकर्त्ता के घर! दोनों ही साक्षात्कार में आसमान ज़मीन का अंतर था! कारण साफ़ है की उसी गांव वातावरण और लोगो के बीच कोई भी लड़की उनके खिलाफ नहीं बोल पाती और अगर बोल दिया तो बाद में बचायेगा कौन ? ऐसे कई मामले मेरे दिमाग में अब भी ताज़ा हैं जिसमे किसी ने खरीद कर लायी गयी इन लड़कियों से बातें की और कुछ दिनों बाद वहाँ से गायब पायी गयीं! सामाजिक रूप से अनुमोदित वधू तस्करी को लिंगानुपात से जोड़ कर केवल अंतर क्षेत्रीय विवाह के बतौर स्थापित करने की कोशिश संभ्रात समाज की वर्गीय साजिश है जिसमे उसके अपने हित छुपे हैं ये किसी से नहीं छिपा की मीडिया शिक्षा और देश की मुख्यधारा (जो दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में ही निहित तथा सिमित है) में क्रियाशील समाज किसी न किसी रूप में लड़कियों का आयात राज्यों से सम्बन्ध रखता है जो उसे वर्गीय और सामाजिक ज़रूरतों के कारण वधू तस्करी को अनुमोदित करने पर मजबूर करता है! यही वो समाज है जिसे अपने घर के काम के लिए भी सस्ते (कई बार बिना वेतन के) घरेलु मजदूर उन्ही तस्करों से खरीदने है! ये वर्ग समाज के भीतर की किसी प्रकार के बदलाव की कोई मुहीम चलने का समर्थन और आशा तो करता है मगर कोई कोशिश नहीं करता!
शायद यही वजह है की दिल्ली से चलने वाली सैकडो संस्थाएं देश के तमाम हिस्सों में समानता और महिला भागीदारी के लिए काम तो करती है मगर दिल्ली के आसपास का ये क्षेत्र अब भी इनके लिए अछूता है जबकि ये पूरा क्षेत्र कठोर पितृसत्तात्मक समाज के कब्ज़े में हैं जहाँ महिला के जीवन का पूरा चक्र खतरे में है! कन्या भ्रूण हत्या हो या जाति अथवा पहचान आधारित सामूहिक बलात्कार या सम्मान हत्यां या वृद्ध महिलायों की सुनियोजित हत्याएं ये सब सामाजिक अनुमोदन दिल्ली की नाक के नीचे घटता है और कभी कभी अखबारों और टीवी की सुर्खियाँ भी बटोरता है मगर ज़मीनी काम का आभाव बदस्तूर जारी है!
पिछले आठ सालों में वधू तस्करी पर काम करते हुए मुझे हमेशा ही तमाम मुद्दों पर अकेला ही जूझना पड़ा! काम करने आफिस चलाने कार्यकर्ताओं को वेतन देने छोटी छोटी ज़रुरतो के लिए पैसा का इंतज़ाम हो या सहज क़ानूनी सहायता और किसी अन्य प्रकार के सहयोग का! ना सरकारें कभी तय्यार हुयी ना ही कोई देशी विदेशी एन जी ओ. रही बात पोलिस और प्रशासनिक महकमे की तो वो  समाज में अशांति फैल जाने का खतरा बता कर अपना पल्ला आसानी से झाड लेने में महारत रखता है!
   इस पुरे मामले को दूसरा रुख देने के क्रम में आयातित लड़कियों के माता पिता को ही गरीबी के कारण अपनी लड़कियां बेच देने के लिए आरोपित किया जाता है (ध्यान रहे की वधू तस्करी में ज़्यादातर मामले आप नब्बे फीसद भी कह सकते हैं पीडिता के माँ बाप की शिकायत पर ही खुलते अथवा रेस्कू आपरेशन होते हैं) और इस तर्क से सरकार और सामाजिक संगठन हरयाणा और पंजाब जैसे राज्यों में जेंडर और महिला भागीदारी पर काम नहीं करने का जायज़ बहाना बना लेते हैं! तो क्या ये महज़ एक विडम्बना भर है की हरयाणा जैसा उन्नत राज्य जहाँ १२५ विकास खंडों में २५० सरकारी गौशाला है वहाँ पुरे राज्य में महिलाओं के केवल तीन शेल्टर होम हैं जिसकी स्थिति किसी भी गौशाला से किसी हाल में बेहतर नहीं है!    
इन राज्यों में लड़कियों के आयात का एक लंबा इतिहास है जो ना केवल यौन उत्पीडन और शोषण से जुड़ा है बल्कि बंधुआ मजदूरी और नव दलितवाद से भी सीधा वास्ता रखता है! और यही कारण है की जातीय तथा धार्मिक रूप से दास रखने का आदी हमारा समाज एक नया समुदाय उत्पन्न कर रहा है जो उनकी सेवा में सदैव ही तत्पर रहे!
अगर आप याद करें की दिल्ली के जघन्य सामूहिक बलात्कार के परिणाम में उम्दा जनाक्रोश कितना जल्दी और चयांत्मक तरीके से ठंडा हो गया सारी बहस एक जगह आकर रुक गयी! मैं महिला विरोधी होने के आरोप के खतरे के बावजूद साफ़ कहूँगा की इस सारे आक्रोश को एक प्रकार से वर्गाधारित चयनात्मक चेतना के रूप में भी देखे जाने की ज़रूरत है! ऐसा आक्रोश भ्रूण हत्या, सम्मान हत्या, डायन हत्या या दलित नव दलित अल्सख्यक लड़कियों के सामूहिक बलात्कार और जघन्य हत्याओं के विरूद्ध नहीं उभरता! हाँ ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वालों का समर्थन किसी न किसी प्रकार से आ जाता है. भाजपा नेता का बयान भी उसी सामाजिक अनुमोदन और मानसिकता का परिचायक मात्र है!

अभी यक्ष प्रश्न ये हैं की हरयाणा में अगर भाजपा की सरकार आई तो क्या गौशालाओं की तरह महिलाओं और बच्चों के लिए शेल्टर होम की संख्या बढेगी ? क्या वो सम्मान हत्याओं के खिलाफ कानून लाने की हिमायत करेंगे ? क्या वो वधू तस्करी और जबरन शादी के विरूद्ध कार्यपालिका को बेहतर बनाने की दिशा में काम करेंगे ? क्या हरयाणा में भ्रूण हत्या को रोकने और महिला भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए कोई बेहतर उपाय निकालेंगे ? 

लेटस होप की अच्छे दिन आएंगे :)

बलात्कारी मानसिकता से निकलिए


राजधानी में हुए सामूहिक बलात्कार ने सचमुच जनमानस को हिल कर रख दिया और शायद पहली बार सड़क और संसद पर एक ही चर्चा एक ही भाव से चलती रही! आक्रोश की अभिव्यक्ति इतनी ज़बरदस्त थी की अभियुक्त ने न्यायलय में सीधे अपने लिए ही फँसी की सजा मांग ली! हालांकि ये आक्रोश और अभिवक्ति ज़रा सलेक्टिव किस्म की रही है और मामला कुछ कुछ  वर्ग से भी जुड़ता नज़र आता है मगर जो भी हो मुझे महिला आयोग के अध्यक्ष और महिला एवं बाल कल्याण मंत्री के संवेदनशील होने का भी ताजुब भरा अहसास हुआ! सब बलात्कार के लिए कई प्रकार की सजा का अनुमोदन कर रहे हैं! कुछ युवा मिडिया कर्मी तो उनको फाँसी या हमको फांसी जैसे मुहावरे के साथ कार्यकर्म भी कर रहे हैं! तो कुछ फाँसी से कुछ कम मगर उम्र कैद से ज़रा भी कम नहीं पर समझौतावादी होने का आरोप झेलते दिख रहे हैंनपुंसक करने की विधियों पर टीवी कार्यकर्म हो चुके हैं और विद्वान रासायनिक तौर पर सर्जरी पर या सीधे जंग लगे चाकू से बधिया कर देने की चर्चा भी कर रहे हैं! सजा इतना अधिक महत्वपूर्ण मुद्दा बन चूका है की दुसरे तमाम मामले पीछे धकेल दिए गए हैं इनमे एक आठ वर्षीय दलित बच्ची का मामला हो डिफेन्स कालानी के युवाओं द्वारा दो महीने तक बंधक बना कर एक नाबालिग से बलात्कार का मुद्दा हो या गाज़ियाबाद में सड़क के किनारे बेहोश हालत में मिली एक अनजान लड़की का मामला हो
मगर एक बात सब कह रहे हैं की दिल्ली में दरिन्दे घूम रहे हैं और इसको साबित करने के लिए टीवी की रिपोर्टर रात में रिपोर्टिंग कर रही हैं कहीं ख़ुफ़िया कमरे के साथ तो कहीं खुलेआम! (अगर आप टीवी में काम करने वाले दरिंदों की बात याद करना चाहते हैं तो कर सकते हैं)
विपक्ष की नेता खुलेआम कह रही हैं अगर लड़की बच भी गयी तो न जिंदा रहेगी न मारेगी अख़बार तस्दीक करते हैं और पुराने बलात्कार के मामले की पड़ताल करके बताते हैं की एक बलात्कार ने अमुक लड़की की सारी ज़िन्दगी तबाह कर दी
और मैं सिलसिलेवार उन तमाम मुद्दों याद कर रहा हूँ जो कभी जवलंत थे जिनपर ऐसी ही क्रांतियाँ मच चुकी हैं! आह लोकपाल आन्दोलन से ठीक पहले खाप पंचायतों और सम्मान हत्याओं पर इतनी ही मोमबत्तियां जल चुकी हैंएक बारगी को लगा सम्मान हत्याएं जल्दी अतीत की बात हो जायेंगी और खाप पंचायतें जल्दी ही अवैध घोषित कर दी जायेंगी! मोमबत्ती ब्रिगेड ने सम्मान हत्याओं के लिए मौत की सजा मांगी थी और मांग थी कानून में बदलाव की! ना सम्मान हत्या रुकी ना मौत की सजा का प्रावधान हुआ और ना ही कानून बदला हाँ मोमबत्ती बुझ ज़रूर गयी और फिर जली तो वो लोकपाल को बुलाने के लिए! सम्मान हत्याएं जारी हैं खबर आती है चली जाती हैं किसी को कोई असर नहीं कोई दर्द नहीं
जिस देश में सरकारी आकडे के अनुसार रोज़ दो सौ से अधिक लडकियां वेश्यावृति में धकेल दी जाती हों वहां यौन उत्पीडन पर उभरा जनाक्रोश उत्साहित तो करता है मगर दिशाहीनता और अनिवार्य जागरूकता की कमी तुरंत ही ठंडा पानी डाल जाता है
हमारे बौद्धिक समाज (पढ़े मध्यमवर्गी समाज) की सबसे बड़ी कमजोरी ये है की वो हर चीज़ को अपने सुविधानुसार समझते हैं अगर ऐसा नहीं है तो खेलेआम टेलेविज़न पर बहस करती हुयी एक तथाकथित नारीवादी महिला सम्मान हत्या के विरुद्ध बोलते बोलते खाप पंचायत के नेता से प्रभावित नहीं हो जाती और बाद में खाप पंचायत के प्वाईंट आफ आर्गुमेंट के पक्ष में खड़ी ना हो जाती! हलके ढंग से कहूँ तो कहना चाहूँगा की अगर आप समझते हैं की आपके बच्चे ही होमवर्क नहीं करते तो आपको हमारे देश के सामाजिक कार्यकर्ताओं खास कर महिला मुद्दों पर काम करने वालों को देख कर संतोष कर लेना चाहिए वो भी कभी होम वर्क नहीं करतेऔर जो बलात्कार के लिए मौत की सजा की बात कर रहे हैं उन्हें याद रहे की धनञ्जय चटर्जी को बलात्कार के लिए ही फाँसी दी गयी थी उससे अपराध कम नहीं हुआ और ना ही होगा!  आप मान भी लें की आपके देश में बलात्कार करने पर बधिया करने या मौत की सजा दे देने का कानून आजायेगा तो इस बात की क्या गारंटी है की जज साहिबान सजा दे ही देंगे या वो बायज नहीं होंगे! अगर आप महिला जज के तहत ऐसे केस की सुनवाई का सोच रहे हैं तो घरेलु हिंसा के मामलों को याद किये जाने की ज़रूरत है!
सबसे पहली बात की हमने ये जानने की कोशिश भी नहीं की आखिर महिलाओं के विरुद्ध होने वाली हिंसा के कारण क्या हैंअगर हम इसकी खोज नहीं करते और समाज में एक व्यापक समझ नहीं बना सके तो कानून कितना भी कठोर हो अपराधी कानून लागू करने वालों की सहानुभूति ले जाएगा और केस सही तरीके से तैयार ही नहीं किया जाएगा!
बलात्कार कभी भी सेक्स की इच्छा पूर्ति के लिए किया जाता हो ये संभव नहीं है! बलात्कारी अपनी सेक्स की इच्छा से अधिक इस बात का ख्याल रखता है की वो लक्ष्य (युवती) को  अधिक से अधिक प्रताड़ित कर सके! कई ऐसे भी मामले नज़र आते हैं जिसमे नपुंसकता का इलज़ाम सहने वाले व्यक्ति ने बच्चों या बूढों से यौनाचार करने की कोशिश की और मार डाला! लडको (मर्दों) के साथ गुदा मैथुन के मामले भी नज़र आते हैं! बलात्कार का औजार के रूप में पोषण समाज करता है! जो इससे सम्मान यानी इज्ज़त से जोड़ता है! सम्मान वो शब्द है जो हमें और आपको किसी और परिभाषा में समझाया जाता है मगर असली परिभाषा कुछ और है!
सम्मान की अवधारणा प्रचलित सामाजिक धारणा  (सम्मान के केवल एक व्यक्ति के स्वयं के व्यवहार पर निर्भर करता है) से पूरी तरह अलग है.
सम्मान की अवधारणा महिला के व्यवहार पर निर्भर करती है और कुछ समय के लिए पुरुषों पर भीइस अवधारणा के तहत 'व्यवहारएक व्यक्ति (पढ़ें स्त्री) का मामला नहीं है और यह दूसरों (पढ़ें पुरुष) के व्यवहार पर निर्भर हो जाता है इस लिए इसे नियंत्रित किया जाना चाहिए.
सामाजिकशब्द सम्मान "शक्ति संपन्न समूह" के लिए है जो परिभाषित करनेविस्तार और एक प्रतिस्पर्धी क्षेत्र में अपनी विरासत की रक्षा के लिए संघर्ष की विचारधारा है. सम्मान की इस अवधारणा को पारंपरिक या पितृसत्तात्मक समाजों में पाया जाता है.
सम्मान आदमी के "गर्व करने के लिए दावा" है  जो मूल रूप से अपने परिवारधनऔर उदारता के रूप में या इस तरह के अन्य कारकों में परिलक्षित हो सकता है.
हालांकिसबसे अधिक बारीकी से एक आदमी के "सम्मान" या प्रतिष्ठा उनके परिवार में महिलाओं के यौन आचरणविशेष रूप से उसकी माँबहन(ओं) पत्नी(यों)और बेटी(ओं)से  बंधा हुआ है.  इन महिलाओं द्वारा यौन कोड के संदिग्ध उल्लंघन या उल्लंघन की सम्भावना "आदमी के सम्मान" परिवार के सम्मान "और / या" सम्मान के सांप्रदायिक निधि "एक कबीलेजनजाति या अन्य वंश  पर एक शक्तिशाली हमला के रूप में देखा जाता है.

और  "सम्मान" "शर्म की बात" या "लज्जा" में तब्दील होजाता है  इस दर्शन के अनुसार इस तरह की "लज्जा" से छुटकारा पाने और "सम्मान" बहाल करने के लिए महिला 'अपराधी' को दंडित किया जाना ज़रूरी हो जाता है! 
दुनिया के अधिकांश हिस्से में 'सम्मान'  महिलाओं पर नियंत्रण और उनके के खिलाफ हिंसा के लिए एक तर्क के रूप में इस्तेमाल किया गया है. हम कह सकते हैं कि वर्तमान शब्द 'सम्मान' मानवीय संबंधों का सबसे बड़ा दुश्मन है" 

नियंत्रण की इसी पद्धति के तहत पित्रसत्तात्मक समाज (अपनी) महिलाओं की रक्षा की बात करता है और उनपर हुए यौन हमलो का सामूहिक जवाब देता है! मगर बराबरी या भागीदारी की बात नहीं करता! 

फेसबुक पर वितरित हो रहे कुछ फ़ोटोज़ जिनमे बलात्कारियों की विभस्त सजाएं दिखाई गयी हैं वो उन देशो के हैं जहाँ महिलाओं की आज़ादी लगभग ना के बराबर है!
दूसरी बात कठोर कानून किसी भी व्यवस्था के कमज़ोर होने की निशानी है! नक्सालियों या दुसरे तरह के विद्रोही समूह का कंगारू कोर्ट जिस अपराध के लिए सीधे मौत की सजा देगा उसी अपराध के लिए अधिक से अधिक सात साल या चौदह साल की सजा देगा तो इसका मतलब ये नहीं की विद्रोही कोर्ट ज्यादा सक्षम है इसका मतलब है की कंगारू कोर्ट सक्षम नहीं है और ना ही वो किसी प्रकार से अपने कानून को लागू कर सकता है मगर किसी भी देश की स्थापित सरकार जो कम सजाएं दे रही हैं वो अपने फैसले को सक्षम है और धारणीय (sustainable) है

तीसरी बात की कानून में बदलाव की मांग कर करना और व्यवस्था पर सवाल उठाना दो अलग बातें हैं! व्यवस्था एक समग्र सवाल है और कानून व्यवस्था का एक अंग विशेष मात्र है! व्यवस्था पर सवाल खड़ा करना एक फैशन है मगर उसकी समझ भी होना उतनी ही ज़रूरी हैजैसे इस सामूहिक बलात्कार काण्ड में व्यवस्था का प्रश्न बनता है की एक व्यस्त रूट पर रात आठ बजे से ही सार्वजानिक वाहनों की भरी कमी है जिसके कारण पीड़ित जोड़े को एक लक्सरी बस में चढ़ने को मजबूर होना पड़ा! सवाल ये भी है की आखिर एक स्कुल बस इतनी रात को सड़क पर क्या कर रही थीसवाल ये है की अगर पुलिस चैतन्य होती तो अपराधी पहले ही पकडे जाते (बस में सवार अपराधियों ने आधे घंटे पहले ही क युवक से आठ हज़ार रूपये लुट कर उतार दिया था) . मगर इन तमाम सवालों को नज़र अंदाज़ करके जिस प्रकार कठोर कानून और बधिया किये जाने की बात पर जोर दिया जा रहा वो दरअसल उसी मानसिकता का प्रतिक है जो मानसिकता बलात्कारी की होती है!
अगर आप याद कर सके तो आप पायेंगे की बलात्कार चलन में आया अपेक्षाकृत नया शब्द है इससे पहले इसे इज्ज़त लुट जाना कहते थे!  ये बदलाव  पित्रसत्तात्मक समाज से सामान लैंगिक अवसर वाले समाज की तरफ बढ़ने की निशानी है! बलात्कार हमेशा ही एक सनकी मानसिकता सबक सिखाने और सम्मान को ठेस पहुचने के बदले में किया गया अपराध है! और इसके लिए दी जाने वाली सजा के साथ साथ इसको रोकने के उपायों पर बात करना शुरू होगा! मुद्दों को समग्रता से देखना और समझना होगा उसके समावेशी उपायों पर बात करनी होगी! पित्र्सत्तात्मक समाज से उपजी एक बुराई को समाप्त करने के लिए पित्र्सत्ता से ही उपाय नहीं निकले जा सकते! 

बाहरी ०१

मैं जिस जगह में पैदा हुआ वहां मैं बाहरी था साथियों के साथ खेलते पढ़ते हुए बराबर अहसास रहता की मैं यहाँ का नहीं हूँ और जैसे ही ये बात भूल जाता कोई याद दिला देता! "पठान शैतान लम्बे लम्बे कान" जैसी कवितायेँ कोर्स में तो नहीं थी मगर सबको एक सामान रूप से याद थीं जबतक होश कम रहा खुद भी बड़े लय में गाते रहे और जब पता चला की हम खुद ही पठान हैं तो बदन से खून ही सुख गया जैसे! 
अब बड़ा होगया हूँ अब बड़े से देश में बड़े मज़े से रहता हूँ लोग याद दिलाते हैं की तुम बाहरी हो जी चाहता है साथ में जोड़ दूँ जन्मजात बाहरी हूँ! पहले बच्चा था अब बच्चा नहीं रहा मैं जानता हूँ एक बाहरी की क्या सीमाएं हैं सो मैं उससे बाहर नहीं आता अपने विकास और संभावनाओं को  को सीमित रखना बचपन से सिखा गया है! मगर आप अगर समझते हैं की मैं अपने बाहरी टैग से परेशां हूँ तो आप ग़लत हैं ये मुझे संतोष देता है की मैं इन में से नहीं हूँ मैं अलग हूँ और अलग होना अपने आप में मज़ेदार हैं! 
इमानदारी से कहूँ तो मैं सचमुच देशभक्त नहीं हूँ और ना कभी बन सकूँगा अगर मैं कहूँ की मैं देशभक्त हूँ तो यकीनन झूठ होगा वैसे मैं गद्दार भी नहीं बनसकता क्योकि गद्दार बन्ने के लिए अपना होना ज़रूरी है सो बाहरी का टैग मुझे बेवफा और गद्दार की श्रेणी से अलग कर देता हैं ये मुझे रोमांचित कर देता हैं! 
बेसिर बेपैर की परेशानियों से बचा निकालता है! 
मुझे उन लोगों पर अफ़सोस आता है जो मेरे जन्मस्थान पर पुश्तैनी थे बेचारे जैसे ही बड़े हुए और बड़े स्तर  पर बाहरी की श्रेणी में आ खड़े हुए उनकी बिलबिलाहट और गुस्सा  कभी मेरी ख़ुशी का कारण  बन जाता है तो कभी दुःख का 
आखिर बेचारों को वो प्रशिक्षण नहीं मिल पाया जो मुझे मिला था! बचपन में ज़लील हो जाना बुरा नहीं है बुरा तो तिल तिल के जीने में है 
अच्छा लोग कहेंगे तुम ऐसा क्यों कह रहे हो अपनी जन्मभूमि के बारे में तुम बेहद घटिया इंसान हो और उसने तुम्हें ये दिया वो दिया! सही बात है दिया तो है मगर इस की ट्रेनिंग भी बचपन में ही मिल गयी थी जब कहा जाता की हमने तुम्हें ज़मीं दी रहने के लिए तो हमारा जवाब होता मुफ्त में दी थी क्या ??? सो ये सब बकवास बात है कोई देता है तो लेता है और व्यापार में प्यार कहाँ 
मैं नहीं मानता के देश गाँव मुहल्लों के बाहर होता है! वो एक समन्वय हो सकता है जनसंगठन हो सकता है सामान लोगों जिसमे मेरे तरह के कुछ अजीब लोग भी शामिल हो का समूहीकृत  संगठन  हो सकता है देश नहीं हो सकता! जब भी मैं देश की सोचता हूँ तो अपने आपको बिहारी पाता हूँ और कुछ  भी नहीं ना तो निचे वाली यूनिट में फिट हो पाता  हूँ और ना ही ऊपर वाली में! मतलब मुझे गया या मगध  के अस्तित्व की चिंता नहीं है और जिस कसबे ने मुझे बाहरी टैग दिया वो तो पक्के तौर पर दुश्मनों की कैटेगरी में नज़र आता है ना हिंदुस्तान के स्तर पर अपने आप को फिट पाता हूँ! रही बात कानूनी  फड्डे की तो हर बाहरी की तरह मैं भी बहुत बड़ा डरपोक हूँ कानून मानता हूँ और डर से मानता हूँ स्वेच्छा से मानने का तो प्रश्न ही नहीं उठता 
वैसे तो मैं संयुक्त राष्ट्र के भी सभी कानून मानता हूँ मगर उसके पीछे भी डर ही है स्वेच्छा  बिलकुल नहीं

(मूड बना तो जारी रहेगा ...................) 

Stand With the Struggling Mass

how came the untimely strom 
and behold there rises lalgarh 
how shall we live with dignity 
how shall we save our children 
somewhere, a bomb goes off
and makes everyone blind 
prisons handging over our heads
how shall we save our children 
a child died in the womb 
was it guilty as well ??
we're beaten and denied life 
how shall we save our children 
the untimely tempest drags
even our women out of homens
the abymal storm has dragged 
look how police room our villages 
prisons loom over our heads 
we;re beaten and we must die 
how the troops storm our homes 
how shall we save 'em children??



कहाँ है तरक्की बोले तो विकास


पिछला एक पूरा हफ्ता पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलग अलग जिलों में बीता कर लौटा हूँ! मन पहले ही झल्लाया हुआ था रही सही कसर दलालों (सीधे तौर पर कहें तो विदेशी एजेंट) की एक मीटिंग में देश की तरक्की की दास्ताँ सुन ली! 
वैसे सच में आप किसी से बात कीजिये बंदा फटाक से कहेगा की तरक्की हुयी है तो हालात तो बदलेंगे ही समाज में तरक्की आई है और रोजगार बढ़े हैं और की शिक्षा बढ़ी है! उदाहरण इन्टरनेट और गाडी ही होगी! मगर भैय्या जब खुद को देखता हूँ तो लगता है की कोई तरक्की नहीं हुयी हाँ परेशानी ज़रूर बढ़ी है! मगर आप देखे ब्लॉग या और कोई नेट्वोर्किंग साईट पर घूमें पता चलेगा गाली गलौज और कट्टरता हावी है वजह साले सब के सब अपनी निजी जीवन की भड़ास निकल रहे हैं कोई धार्मिक हुआ जा रहा है कोई छायावादी कवि कोई राष्ट्रवादी 
मगर सब हैं परेशान अपने निजी जीवन में लम्बी लम्बी फेक देते हैं फिर सोचते हैं की मैंने तरक्की नहीं की है तो इसमें मेरा ही कसूर है! नौजवानों की पूरी पीढ़ी मिडिया या समाजसेवा में जा रहे हैं हर बंदा सामाजिक कार्यकर्त्ता बना फिर रहा है या पत्रकार जैसा कुछ असल में हैं सब के सब बेरोजगार 
अच्छा एक उदाहरण सुनो शरद चाचू को दिन में तारे दिखने वाला बंदा पहले बोला मंहगाई की वजह से मारा फिर बोला लोकपाल की वजह से (मिडिया वालों (गालियाँ देता मगर क्या है ना की आजकल हर दूसरा आदमी मिडिया या लेखक है सो मै अपने थोबड़े का ख्याल रखता हूँ ) ऐसा खूब दिखाया) मगर जी मामला कुछ और ही है हरविंदर सिंह के बारे में बताया जाता है की वो टैक्सी ड्राइवर है और उसकी दो ऑटो हैं मगर ताज्जुब की बात ये है की उसके पड़ोसियों ने उसे कभी टैक्सी या ऑटो चलते नहीं देखा! वो हमेशा घर पर ही पड़ा रहता था वजह समझ आई लुच्चों 
सनको मत बेरोजगारी और विकल्प की कमी हरविंदर के गुस्से की असली वजह है मगर वो सामाजिक स्थितियों के कारण थप्पड़ की वजह कभी लोकपाल और कभी मंहगाई बता रहा था! मतलब ये की सरकार जिन बातों से अलग करती है हम जैसे बैल उससे सचमुच अलग हो जाते हैं! 

हाल में सुना बिहार बड़ा तरक्की कर रहा है और श्रमिको का पलायन रुक गया है! तुर्रा किस ने कहा आकडे से मैं भी खेल लेता हूँ मगर हालात नहीं बदलते कहाँ बदल रहा है बिहार कहाँ हो रहा है विकास! मुझे तो समझ नहीं आया मेरा एक भी दोस्त आजतक सेटल नहीं हो पाए और जो कम रहे है सब बिहार से बाहर हैं! और हाँ भैय्या उसमे से कोई जाहिल नहीं है (आकड़ें भी हैं जिसको चाहिए दे दूंगा)

ऐसा ही कहते हैं की पश्चिमी उत्तर प्रदेश सोना उगलता है मैं गया और मैंने देखा आम आदमी की रोज़मर्रा की तकलीफें जिन लोगों के पास ज़मीन है वो बेच रहे हैं और जगह जगह गुमटिया खोले बैठे हैं ज़मीन बेच कर आई गाडी को तरक्की कहा जा रहा है! गोबर के गंडों के बजाये गैस तो जल रही है मगर साथ साथ फसल भी और खेत भी ! लड़के पढ़ रहे हैं सो खेती नहीं करेंगे सब एम् बी एय कर रहे हैं कोई कंप्यूटर कोर्स कर रहा है! जिसने कर लिया वो क्या कर रहा है वो तो जी ट्वीशान पढ़ा रहा है या दिल्ली में नौकरी कर रहा है दस हज़ार पर अभी नया है ना 
ऐसे ही बड़े शहरों में भूखे लोग जो कभी बड़े तरक्की याफ्ता लोग कहे जाते थे भूखे मरान्सन्न निकलते हैं! 
बढ़िया है करो तरक्की अपने बाप का क्या जाता है मगर याद रखो जो आसपास भूखे लोग हैं (आपको नज़र नहीं आयेंगे जी आपकी नज़र पर विकास का पर्दा पड़ा है) वो प्रेत बन कर आपका जीना मुश्किल कर देंगे! 


इसको जारी रखने की कोशिश करूँगा पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जिलेवार ब्यौरा दर्ज करूँगा सरोकार.नेट  पर :) 

विकास करो या विनाश तुम्हारी मर्ज़ी मगर बोलो सच बोलो 

हरामखोरी की हसरत


फोटो हरियाणा की एक बस्ती का है! डेल्ही का नहीं ;)



............बस्ती से बहार आते हुए तैमूर नगर गुरुद्वारे के पास वाले सुलभ शौचालय के सामने से गुज़रे तो देखा की शौचालय का स्टाफ एक आदमी पर चिल्ला रहा था की स्टाफ हो तो अपनी पहचान दिखाओ 
मतलब यहाँ भी स्टाफ चलाया जा रहा था! अक्सर बसों में किराया ना देने वाले लोग अपने को स्टाफ बताते रहे हैं दिल्ली की रिवायत है और दिल्ली क्या कई जगह ऐसे स्टाफ बताया जाता है! कालेज और विश्व-विद्यालय के छात्र अगर बस वालों को किराया दें तो ये उनकी तौहीन मानी जाती है (बेईमानी का प्रशिक्षण यहीं से शुरू हो जाता है) मैंने भी बचपन में अक्सर सोचा है की काश मैं भी बस का स्टाफ होता तो मुझे भी किराया नहीं देना पड़ता! मगर नहीं अपनी किस्मत में स्टाफ बनना था ही नहीं! सो मैंने बसों में किराया देना शुरू कर दिया पहले मज़बूरी में और बाद में स्वेच्छा से! अपने छात्र जीवन में भी हमेशा किराया दिया अक्सर मजाक उड़ाया गया की नालायक किराया देता है! डरपोक साला (वैसे ये सच था मुझे कंडक्टर से हमेशा डर लगता रहा है अब भी इसी लिए तो कम दुरी के लिए कभी बस का इस्तेमाल नहीं करता) फिर भी देता रहा आज भी देता हूँ! स्टाफ नहीं चला सका अब सुलभ शौचालय की बात आई है तो बिन्देश्वरी पाठक से कई बार मिला भी हूँ हम दोनों बिहारी भी हैं पटना गया लाइन के एक ही धंधे में हैं तो अगली बार ट्राई करूँगा की सुलभ शौचालय में स्टाफ चला सकूँ! और मुफ्त में कुछ कर पाने की ख़ुशी हासिल कर सकूँ! और दोस्तों को गर्व से बता सकूँ की मैंने भी बेईमानी और हरामखोरी की परम्परा कायम रखी है

(डायरी से 5 जून 2010)

जब मौत ताण्डव करती है तो कुछ लोग गुलाबों मे मगन होते हैं

फैसला और न्याय में सचमुच कितना फासला होता है, इसे बताया है 25 बरस बाद भोपाल गैस कांड के ताजे फैसले ने। दुनिया के सबसे बड़े, सबसे भयानक औद्योगिक कांड के ठीक एक महीने बाद लखनऊ में हुई राष्ट्रीय विज्ञान कांग्रेस में एक वैज्ञानिक ने इस विषय पर अपना पर्चा पढ़ते हुए बहुत ही उत्साह से कहा थाः ”गुलाब प्रेमियों को यह जानकर बड़ी प्रसन्नता होगी कि भोपाल में गुलाब के पौधों पर जहरीली गैस मिक का कोई असर नहीं पड़ा है। “ भर आता है मन ऐसे ‘शोध’ देखकर, पर यह एक कड़वी सचाई है। भोपाल कांड के बाद हमारे समाज में, नेतृत्व में, वैज्ञानिकों में, अधिकारियों में ऐसे सैकड़ों गुलाब हैं, जिन पर न तो जहरीली मिक गैस का और न उससे मारे गए हजारों लोगों का कोई असर हुआ है। वे तब भी खिले थे और आज 25 बरस बाद भी खिले हुए हैं।




भोपाल के भव्य भारत भवन में ठहरे फिल्म निर्माता श्री चित्रे की नींद उचटी थी बाहर के कुछ शोरगुल से। पूस की रात करीब तीन बजे थे। कड़कड़ाती सर्दी। कमरे की खिड़कियां बंद थीं। चित्रे और उनकी पत्नी रोहिणी ने खिड़की खोलकर इस शोरगुल का कारण जानना चाहा। खिड़की खोलते ही तीखी गैस का झोंका आया। उन्होंने आंखों में जलन महसूस की और उनका दम घुटने लगा। तुरंत खिड़की बंद कर दी। आंखों व नाक से पीले रंग का पानी झरने लगा था।

खतरे का आभास हो चुका था। दोनों ने पलंग पर बिछा चादर उठाया और दौड़ते हुए कमरे से बाहर आ गए। उन्हें आश्चर्य हुआ कि आसपास के सभी कमरे पहले ही खाली हो चुके थे। भारत भवन के अहाते के पास राज्य सरकार के श्रममंत्री का बंगला था। वहां भी कोई नहीं। पास ही तो मुख्यमंत्री का बंगला था। शायद उन्हें भी खबर लग गई थी।

सड़क पर पहुंचकर चित्रे दंपति ने अजब नजारा देखा। भगदड़ मची हुई थी। जिसे जिधर जगह दिखाई दे रही थी, उधर ही भाग रहा था। भागते-भागते लोग गिर पड़ते थे। कुछ गिर कर उल्टियां कर रहे थे। कुछ वहीं तड़प कर मर रहे थे। वे भी भागने लगे। कुछ दूर जाकर उन्होंने देखा कि एक परिवार के लोग भागते-भागते थक कर बैठ गए थे। परिवार के एक पुरुष ने कहा, ‘हम सभी साथ-साथ मरेंगे। पास से गुजरी पुलिस की एक गाड़ी में बैठे सिपाहियों को भी नहीं मालूम था कि किस दिशा में भागना है। लाशों पर कूदते-फांदते चित्रे दंपति एक कॉलेज के पास जाकर रुके। उन्होंने तय किया कि वे वहीं रुकेंगे, जो होगा देखा जाएगा। दो घंटे बाद करीब पांच बजे सुबह एक पुलिस वैन वहां पहुंची। उस पर लाउडस्पीकर लगा था, जिससे कहा जा रहा था कि अब घर लौट सकते हैं। लेकिन लोग तब भी भागे जा रहे थे। किसी ने पुलिस की बात नहीं मानी।

हजारों लोग भागते-भागते अपने घरों से मीलों दूर निकल आए थे। कुछ भागकर दूसरे शहरों, कस्बों तक में पहुंच गए थे। सिहोर, विदिशा, होशंगाबाद, रायसेन, ओबेदुल्लागंज, आष्टा, उज्जैन, देवास, इंदौर, रतलाम और यहां तक कि 400 किलोमीटर दूर नागपुर पहुंच गए थे। करीब दस हजार औरतें, बच्चे और मर्द रात दो से चार बजे के बीच तक सिहोर पहुंच चुके थे और इतने ही लोग रायसेन। ये सभी लोग अस्पतालों की तरफ टूट पड़े। सैकड़ों लोग उज्जैन और इंदौर पहुंचे। सैकड़ों ट्रक, टैक्सी और टैंपो वालों ने जान जोखिम में डालकर हजारों लोगों को भोपाल से बाहर लाकर उन्हें उनकी दूसरी जिंदगी में उतारा था।

रिसी गैस 40 वर्ग किलोमीटर इलाके में फैल गई थी। हवा के बहाव की दिशा में 8 किलोमीटर दूर तक उसका करीब दो लाख लोगों पर असर पड़ा था। भोपाल उस रात मानों गैस-कोठरी बन गया था, जिसमें शहर की चैथाई आबादी का दम घुट रहा था। भोपाल अगर ताल तलैयों का शहर न रहा होता तो और ज्यादा संख्या में लोग मरते। पानी ने गैस के बादलों का काफी जहर सोख लिया और इस तरह अन्य लोगों को मरने से बचा लिया।

भोपाल रेलवे स्टेशन यूनियन कारबाइड कारखाने से ज्यादा दूर नहीं है। गैस के गुबार ने उधर का भी रुख किया था। स्टेशन उस समय यात्रिायों से भरा हुआ था। खतरे का आभास रेलवे कर्मचारियों को भी हो चुका था। लेकिन मौत की परवाह न करते हुए भी उनमें से कुछ ड्यूटी पर मुस्तैद रहे।
डिप्टी चीफ पावर कंट्रोलर रहमान पटेल ऐसे ही एक कर्मठ कर्मचारी थे। पटेल के अफसर ने पाया कि पड़ोस के क्वार्टर में पटेल की पत्नी और 14 साल का बच्चा मौत की नींद सो चुके थे, लेकिन पटेल यह जानने के बावजूद अपनी ड्यूटी पर डटे रहे।
आधी रात के बाद 116 अप गोरखपुर-बंबई एक्सप्रेस भोपाल से सुरक्षित निकल गई। उसके तमाम यात्री मौत से बाल-बाल बचे शायद उस वजह से क्योंकि कड़ाके की ठंड के कारण डिब्बों के खिड़की दरवाजे बंद थे और भोपाल की जहरीली हवा डिब्बों में घुस नहीं पाई। एक वजह शायद यह भी थी कि स्टेशन अधीक्षक एच.एस. धुर्वे ने जान जोखिम में डालकर ट्रेन को फौरन आगे भगाने का सिग्नल दे दिया था। धुर्वे की जान नहीं बचाई जा सकी लेकिन रेल के सैकड़ों यात्रिायों की जान बचाकर वे अमर हो गए। मरने से पहले उन्होंने आसपास के सभी स्टेशनों को संदेश भेजकर खबर कर दी कि भोपाल में मौत का तांडव चल रहा है, कोई गाड़ी इधर न भेजी जाए। सात घंटे तक भोपाल का देश के अन्य हिस्सों से संपर्क टूटा रहा। अगली सुबह बच गए भाग्यशाली लोगों ने देखा कि स्टेशन लाशों से पटा हुआ है। दफ्तरों के भीतर बाबू लोग कुर्सियों पर मरे पड़े थे। कंट्रोल रूम में भी मौत का सन्नाटा छाया हुआ था।

जो मौत से किसी तरह बच निकले, उन्हें सुबह अस्पतालों में भर्ती कराया गया। भोपाल का 1,200 बिस्तरों वाला हमीदिया अस्पताल सुबह तक मरीजों से पटा हुआ था। पहला मरीज रात करीब सवा बजे अस्पताल पहुंचा था। उसने आंख में बेतहाशा जलन की शिकायत की। पांच मिनट बाद ऐसे मरीजों की संख्या हजार तक पहुंच गई और ढाई बजे रात तक अस्पताल पहुंचे मरीजों की संख्या 4,000 थी। मरीज सिर्फ आंखों की तकलीफ नहीं बता रहे थे। उनकी सांस भी अटक रही थी। अस्पताल के कर्मचारी मरीजों का यह रेला देखकर सकते में आ गए थे। उन्हें समझ में ही नहीं आ रहा था कि आखिर यह हो क्या गया है, हजारों लोग कैसे एक साथ बीमार पड़ गए? 



सुबह होने तक 25 हजार से ज्यादा लोग हमीदिया अस्पताल में थे। गलियारे उल्टियों और खून से सने पड़े थे। एक डाक्टर ने कहा, ”मैं आपको बता नहीं सकता कि वहां क्या हो रहा था। तिल धरने की जगह नहीं थी। जैसे ही कोई मरीज मरता था, उसके परिवार वाले लाश के पास से हट जाते थे। कुछ लाशें लेकर नाते-रिश्तेदार बाहर भी चले जाते थे। करीब 1,000 लाशें मेरे सामने से गुजरीं। “ कौन मर चुका है और कौन मर रहा है, उन्हें अलग करना कठिन हो गया था। मुर्दाघर में जो लोग ड्यूटी पर थे, उन्हें भी लाशें अटाना कठिन पड़ गया था।


जब पूरा शहर मुर्दाघर बन गया हो तो अस्पताल के मुर्दाघर के बारे में क्या कहा जाए।

श्मशान पर शवों का पहुंचना सुबह नौ बजे शुरू हुआ। पहली बार में 15 चिताएं एक साथ जलीं। लेकिन जब शवों का सिलसिला रुका नहीं तब और चिताएं बनानी पड़ीं। देखते-देखते श्मशान की तमाम लकड़ियां समाप्त हो गईं, नई खेप आई। फिर तो हर चिता पर 15-15 लाशें रखी जाने लगीं। हिंदू मान्यताओं के अनुसार बच्चों व शिशुओं का दाह-संस्कार नहीं किया जाता, इसलिए उन्हें दफनाया जाने लगा। अपनी संतानों के अंतिम संस्कार पर उपस्थित रहने वाले माता-पिता भी कितने बच पाए थे?

जो हाल श्मशान का था, वैसा ही हाल कब्रिस्तानों का था। एक के बाद एक शव लाया जा रहा था। दफनाने की जगह भर चुकी थी। फिर एक ही कब्र में कई शव दफनाने लगे। इसके बाद भी जब मैयत का तांता बंद नहीं हुआ तब पुरानी कब्रें खोद कर उनमें लाशें दफनाई गईं। इसके लिए भोपाल के मुफ्ती को खास फतवा जारी करना पड़ा, जिसमें पुरानी कब्रें खोदकर नई लाशें दफनाने का हुकुम दिया गया था।

यूनियन कारबाइड उस काली रात को भी झूठ बोल रही थी। इधर, हमीदिया अस्पताल में बेहाल मरीजों की भीड़ उमड़ पड़ी थी और उधर कंपनी के डाक्टर एल.डी. लोया हमीदिया अस्पताल के स्तब्ध और हतप्रभ डाक्टरों को जता रहे थे कि गैस जहरीली नहीं है। मरीजों से केवल इतना भर कहें कि वे आंखों पर गीला तौलिया ढांप लें।

यह कोई अकेला झूठ नहीं था। यूनियन कारबाइड के बड़े लोग बड़ी बेशर्मी से लगातार झूठ बोलते रहे। रात करीब एक बजे भोपाल के पुलिस अधीक्षक स्वराज पुरी को जगाकर बताया गया कि कारबाइड कारखाने से दो किलोमीटर दूर छोला इलाके में भगदड़ मची है, क्योंकि कारखाने से कोई गैस रिसी है। श्री पुरी लपक कर उठे और 1.25 बजे तक कंट्रोल रूम पहुंच गए। उनके होश उड़ गए जब उन्होंने डयूटी पर तैनात सिपाहियों को बुरी हालत में पाया। वे आंखें मल रहे थे और उल्टियां कर रहे थे। 1.25 से 2.10 के बीच उन्होंने यूनियन कारबाइड को तीन बार फोन किया, जिसमें दो बार बताया गया कि यहां तो सब कुछ ठीक-ठीक है और चिंता की बात नहीं है। तीसरी बार कहा गया ”सर हम नहीं जानते कि क्या हो गया है।“

गैस रिसने के करीब 45 मिनट बाद यानी पौने दो बजे अतिरिक्त जिलाधिकारी खुद कंपनी के वक्र्स मैनेजर के. मुकुंद के घर गए। मुकुंद को तब तक नहीं पता था कि कोई गैस रिसी भी है। उन्होंने टका-सा जवाब दियाः

”हमारे प्लांट से गैस रिस ही नहीं सकती। प्लांट बंद है। हमारे काम में गलती नहीं हो सकती। हमारे यहां गैस रिसाव की गुंजाईश नहीं है।“
उस पूरी रात यूनियन कारबाइड ने अपनी ओर से इस हादसे की जानकारी देने की कोई कोशिश नहीं की। तीन बजे सुबह यूनियन कारबाइड ने एक आदमी भेज कर कहलवाया कि गैस रिसाव रोक दिया है। यह भी सफेद झूठ था। कंपनी ने रिसाव रोकने की कोई कोशिश नहीं की थी। गैस बनना और रिसना अपने आप रुक गया था। लेकिन तब तक जो होना था, वह हो चुका था।

भोपाल में मरने वालों की संख्या रहस्य ही बनी रहेगी। पहले दिन सरकार ने संख्या 400 बताई, लेकिन गैर सरकारी सूत्रों ने 500। दूसरे दिन सरकारी और गैर सरकारी संख्या में अंतर और बढ़ गया। सरकारी गिनती 550 पर पहुंची, जबकि गैर-सरकारी गिनती 1200 पर। तीसरे दिन गैर सरकारी संख्या 16 सौ हो गई, लेकिन सरकार की संख्या केवल 620 रही। इसमें भी भोपाल में केवल 583 और बाकी 37 अन्य शहरों में। चौथे दिन गैर सरकारी संख्या 1700 बताई गई, उधर सरकार ने भी अपनी गिनती बढ़ा कर दुगनी कर दी 1327। मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने सफाई दी कि मरने वालों की संख्या कम बताने का कोई सवाल ही नहीं है। ”लीपापोती नहीं की जा रही है,“ उन्होंने कहा। तब तक भोपाल के आसपास के गांवों और शहरों से रिपोर्ट नहीं मिल पाई थी।

पांचवें दिन से गैर-सरकारी और सरकारी गिनती का अंतर फिर बढ़ने लगा। जनवरी 85 तक राज्य सरकार केवल 1430 मृतकों की रट लगा रही थी, लेकिन हमारे और दुनिया भर के अखबार ढाई हजार लोगों के मरने की खबर दे रहे थे। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने जनवरी में जाकर बताया कि ज्यादातर लोग गैस रिसाव के पहले 48 से 72 घंटों में मरे। परिषद ने कहा कि 1200 लोग अस्पतालों में मरे। और इस तरह मृतकों की कुल संख्या 2000 के लगभग है। अमेरिकी अदालत में दायर यूनियन कारबाइड के विरुद्ध हर्जाने और मुआवजे के दावे में केंद्र सरकार ने मृतकों की संख्या 17 सौ बताई है।

भोपाल में अनेक लोग मानते हैं कि गैर सरकारी गिनती भी गलत है और मृतकों की संख्या ढाई हजार से कहीं ज्यादा है। जहरीली गैस कांड मोर्चा के लोग कहते हैं कि सेना के ट्रकों में भर कर लाशें ले जाई गईं और उन्हें दफना दिया गया। गैस रिसाव के पहले दो दिनों में तो शायद ही किसी को होश रहा होगा लाशें गिनने का। मोर्चे का कहना है कि मृतकों की संख्या 5000 से भी ज्यादा है।

यूनीसेफ के एक अधिकारी ने भोपाल में एक हफ्ता रहने के बाद दिल्ली लौटने पर एक गोपनीय रिपोर्ट में मरने वालों की संख्या 10 हजार तक बताई थी। रिपोर्ट में कहा गया कि कई सरकारी लोग और डाक्टर भी निजी तौर पर यही मानते हैं। शहर में कपड़ा बेचने वालों का कहना है कि कोई दस हजार कफन तो बिके थे।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली के सोशल मेडिसिन एंड कम्युनिटी हेल्थ सेंटर ने सबसे ज्यादा पीड़ित 29 इलाकों में हर 15 वें परिवार से पूछताछ की थी। बस्तियों की आबादी 68 हजार थी। कुल मिलाकर इस सर्वे में मरने वालों की तादाद 1305 बताई गई।

तालाबों के शहर भोपाल में उस समय मृत्यु की नदी बही थी। पर सरकार, वैज्ञानिक, डाक्टर, सर्वे वाले लोग बस कुछ बूंदें गिन रहे थे।

मरने वालों की संख्या अभी थम ही रही थी और अस्पताल आने वालों की कतार कुछ छोटी हो रही थी कि सातवें दिन भोपाल अचानक फिर कांप उठा। पता चला कि यूनियन कारबाइड कारखाने में 15 टन जहरीली गैस अभी भी बच रही है और अब उसे बेअसर किया जाएगा। बच रही गैस को बेअसर कर दिए जाने के बाद ही सरकार की नजर में भोपाल पूरी तरह बेखौफ हो सकता था। वैज्ञानिक व औद्योगिक अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष डाक्टर वरदराजन की अध्यक्षता में विशेषज्ञों की एक टीम को बेअसरी का तरीका तय करने का जिम्मा सौंपा गया। डाक्टर वरदराजन ने भोपाल में केंद्र सरकार की क्षेत्रीय अनुसंधान प्रयोगशाला में अपना अस्थायी कार्यालय कायम किया और दम साध कर बैठ गए। बच रही गैस को बेअसर करने के कुछ तरीके ढूंढ़े गए। गैस को कास्टिक सोडा के जरिए बेअसर किया जाए, इसे ड्रामों में भर का जहाजों से अमेरिका में संरक्षक कंपनी को भेज दिया जाए, या कारखाना पुनः चलाकर बच रही मिक भी खपा ली जाए, ताकि मिक अंतिम उत्पाद कारबेरिल कीटनाशक में बदल जाए।

हर कोई जानता था कि यूनियन कारबाइड कंपनी इस अंतिम विकल्प के पक्ष में ही थी। कंपनी के अमेरिकी मुख्यालय ने दुनिया में अपनी सभी फैक्टरियों को हिदायत दे दी थी कि जितनी जल्दी हो सके, मिक का इस्तेमाल कर उसे कारबेरिल बना डाला जाए। भोपाल कारखाने के प्रबंधकों ने भी सात दिसंबर को अपनी ओर से कोशिश की थी कि कारखाना चलाकर मिक को खपा लिया जाए। लेकिन इस काम के लिए जो कर्मचारी कारखाने पहुंचे, उन्हें जिला प्रशासन ने, जिसने कारखाने को अपने नियंत्राण में ले लिया था, वापस भेज दिया।

कारखाना दुबारा चलाने का मतलब होता कि मुख्यमंत्री की बात खाली चली जाती। उन्होंने हादसे के चौथे दिन बहुत जोर से कहा था कि कारखाना दुबारा खुलने नहीं दिया जाएगा। अखबारों व लोगों ने भी इस विकल्प का कड़ा विरोध किया।

दस दिसंबर को यह बात फिर फैली कि कारखाने में काम दोबारा शुरू हो गया है। जिला प्रशासन के एक अधिकारी ने कहा कि मिक को कीटनाशक में बदला जाना तय कर लिया गया है और इसके लिए कारखाना शुरू किया जा चुका है। लेकिन वरदराजन ने बड़ी फुर्ती से इसका खंडन किया। इस बीच भोपाल सांस रोक कर इंतजार करता रहा। अगले दिन इन अफवाहों के बीच कि वरदराजन की निगरानी में कारखाना फिर चलाया जाएगा, मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने जनता से अपील की, ”अब डरने की कोई बात नहीं है और मैं अपील करता हूं कि डर कर शहर मत छोड़िए।“ लेकिन मुख्यमंत्री एक ओर यह अपील कर रहे थे, उनकी सरकार कुछ और ही कर रही थी। लगभग उसी समय सरकारी वाहन शहर में दौड़ने लगे, जिन पर लगे माइक सहमे हुए भोपाल को यह सूचना दे रहे थे कि शहर के सभी स्कूल-कॉलेज कल से अगले 12 दिनों के लिए बंद रहेंगे। मध्य प्रदेश सड़क परिवहन निगम से पूछताछ में मालूम पड़ा कि राज्य के दूसरे भागों से बड़ी संख्या में बसें भोपाल मंगाई गई हैं। लेकिन परिवहन निगम यह सफाई देने से नहीं चूका कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि भोपाल से भाग गए लोग वापस भोपाल पहुंच सकें।

इन सारी बातों से लोगों का संदेह पक्का हुआ कि सरकार ने शहर खाली कराने की योजना बनाई है। सरकार ने पुलिस वाहनों के जरिए शहर के कोने-कोने में सूचना पहुंचाई कि भय की कोई बात नहीं रह गई है। ऐसी घोषणा आकाशवाणी भोपाल से भी बार-बार प्रसारित की गई। लेकिन मिक से डरे भोपाल पर संदेह का, अविश्वास का कुहरा घना होता गया।

अगले दिन उहापोह की स्थिति खत्म हो गई। सरकार ने अंततः वही फैसला किया जो यूनियन कारबाइड चाह रही थी। मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने उसी शाम घोषणा की कि विशेषज्ञों की राय में फैक्टरी को दोबारा चालू कर मिक को खपा लेना ही सर्वोत्तम और सबसे सुरक्षित उपाय होगा। उन्होंने कहा कि 16 दिसंबर से कारखाना चार या पांच दिन के लिए फिर चला जाएगा। लेकिन वे यह कहने से नहीं चूके कि इस दौरान सुरक्षा के सभी उपाय किए जाएंगे और किसी किस्म के खतरे की गुंजाइश नहीं छोड़ी जाएगी। उन्होंने कहा, ”उस पूरे समय मैं खुद कारखाने में मौजूद रहूंगा।

लेकिन मृत्यु इतनी हल्की होकर जिस शहर में घर-घर उतरी हो, वहां ऐसे शब्दों का वजन खो गया था। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि कारखाने को दोबारा चलाए जाने के दौरान आसपास की तेरह बस्तियों के सवा लाख लोगों के लिए सरकार ने सुरक्षित स्थान पर शिविर कायम किए हैं। ऐसा सिर्फ लोगों की सहूलियत के लिए किया गया है। जो लोग भोपाल के बाहर जाना चाहते हों, उनके लिए सरकार ने विशेष बसों का भी इंतजाम किया है। इसी तरह मवेशियों के लिए भी अलग शिविर लगाने की बात कही गई।

भोपाल के लोगों का विश्वास उठ चुका था। ज्यादातर ने अपनी मदद आप करने की ठानी। तेरह दिसंबर की शाम तक करीब एक लाख लोग भोपाल छोड़कर आसपास के शहरों, कस्बों व गांवों में जा चुके थे। शांतिकाल में लोगों का इस बड़े पैमाने पर पलायन शायद ही कभी हुआ होगा। बस अड्डा यात्रिायों से खचाखच भरा था और सैंकड़ों बसें लोगों को भोपाल से  बाहर पहुंचाने में लगी थीं। रेलगाड़ियों में तिल धरने की जगह भी नहीं थी। हजारों लोगों ने अपने मवेशी पड़ोस के गांवों में पहुंचा दिए थे। अगले दिन भी पलायन जारी था। दहशत इतनी थी कि अस्पतालों में भर्ती सैकड़ों मरीज भी रही-सही ताकत बटोर भोपाल से बाहर चले गए थे। 14 दिसंबर की शाम तक भोपाल की करीब चैथाई आबादी शहर छोड़ चुकी थी।

सरकार ने जो शिविर कायम किए थे, उन पर किसी को यकीन नहीं था। बस 4,800 लोग इन शिविरों में पहुंचे। ये वो लोग थे, जिनके पास न पैसा था, न बाहर नाते रिश्तेदार। लोगों के न आने के कारण अधिकारियों को दो शिविर बंद कर देने पड़े।

सारा भोपाल भोपाल से कहीं दूर चला गया था। 

लोग क्या सोच रहे थे, इसकी तरफ से आंख मूंदे सरकारी विशेषज्ञ अपने तरीके से कारखाना दुबारा चलाने की तैयारियों में जुटे थे। विशेषज्ञों ने सुरक्षा बंदोबस्त के छह कदम बताए। लेकिन पहले कदम का सुरक्षा उपाय से कोई ताल्लुक नहीं था। मालूम पड़ता है कि विशेषज्ञों ने इसे बस यों ही गिना दिया था। पहला कदम वह प्रक्रिया थी जिससे मिक गैस की अल्फानैफ्थाल के साथ रासायनिक क्रिया करवाने के बाद कीटनाशक कारबेरिल बनाया जाना था। दूसरा उपाय था अतिरिक्त सुरक्षा वाल्व लगाना। यह उस रात काम नहीं कर पाया था जिससे मिक गैस वायुमंडल से मिल गई थी। इसमें दो नए हौजपाइप जरूर लगाए गए थे, ताकि स्क्रबर गर्म न हो जाए।

मिक गैस पानी के साथ क्रिया कर सकती है। इस बात को ध्यान में रखकर तीन नए उपाय और किए गए थे। हालांकि कुछ विशेषज्ञों के अनुसार ये उपाय इतने साधारण थे कि इनसे फिर मिक गैस रिसने की आशंका कतई कम नहीं होती थी। मसलन जिस चिमनी से मिक गैस निकलती थी, उसे शामियाने से ढंक दिया गया! यह शामियाना पानी से तर रखा जाना था ताकि मिक यदि रिस भी जाए तो पानी से तत्काल रासायनिक क्रिया करके उसे डाइ-मैथिल्स यूरिया में बदला जाए। इसके अलावा फैक्टरी के जिस ओर जयप्रकाशनगर था, उस ओर दीवार पर टाट के बड़े-बड़े परदे लगा दिए गए थे, जिन्हें हमेशा गीला रखा जाना था, ताकि रिसी गैस को पानी तुरंत उदासीन बना सके। छठे बंदोबस्त में वायुसेना के हेलीकाप्टर कारखाने के ऊपर मंडराते रहने वाले थे ताकि जरूरत पड़ने पर कारखाने के ऊपर पानी का छिड़काव किया जा सके। इतनी सावधानी बरते जाने के बावजूद गैस यदि तब भी रिस गई तो उस स्थिति में विशेष सायरन बजाने की व्यवस्था भी की गई थी। सेना के विशेष बचाव दस्ते भी तैयार रखे गए थे, जो सायरन के साथ ही बचाव कार्य में लग जाते।

सारे उपाय एक तरफ, लेकिन चिंता बनी ही रही कि यह अभियान किसकी निगरानी में संपन्न होगा। सरकारी विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों को कारखाने के एक-एक कलपुर्जे की जानकारी तो थी नहीं। यह जानकारी सिर्फ यूनियन कारबाइड के विशेषज्ञों को ही थी और इसीलिए यह काम प्रबंधकों के जिम्मे छोड़ दिया गया था। डाक्टर वरदराजन ने खुद कहा, ”हमसे यह उम्मीद कैसे रखी जा सकती है कि हम कारखाने के एक-एक पुर्जे के बारे में जान लें।“ रिस रही मिक खत्म करने की इस पूरी प्रक्रिया में यूनियन कारबाइड कार्पोरेशन (अमेरिका) के विशेषज्ञों को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया गया। भोपाल कारखाने के जिन अधिकारियों को हादसे के अगले ही दिन संगीन दफाओं में गिरफ्तार किया गया था, उन्हें सोलह दिसंबर को इस शर्त पर रिहा कर दिया गया कि वे इस प्रक्रिया में सरकारी वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की पूरी मदद करेंगे! इनमें अमेरिका से आए विलियम तूमर भी थे, जिन्हें कारखाने में घुसने की इजाजत नहीं दी गई थी कि कहीं वे सबूत मिटाने की कोशिश न करें।

सब खलनायक एक बार फिर नायक बन गए थे।

15 दिसंबर की शाम मुख्यमंत्री ने घोषणा की, ”यूनियन कारबाइड कारखाने में बच रही विषैली गैस को समाप्त करने की तैयारियों पूरी हो चुकी हैं। हालांकि कारखाने में दुबारा उत्पादन यूनियन कारबाइड के पूरे नियंत्राण में रहेगा और किसी भी दुर्घटना के लिए जिम्मेदारी उनकी ही रहेगी लेकिन कारखाना चलाने के लिए अंतिम आदेश मैं खुद दूंगा। मेरे लिए निःसंदेह वह अत्यंत नाजुक और पीड़ादायी घड़ी होगी। नितांत एकाकी क्षणों में व्यक्ति की नियंता पर आस्था और बलवंत हो जाती है। विश्वास हृदय की गहराइयों से पैदा होता है। पिछले दिनों की दुखद घटनाओं ने हम सबको तोड़ कर रख दिया है और ईश्वर पर हमारा विश्वास भी डिगने लगा है। लेकिन हमें ईश्वर पर विश्वास रखना होगा। इसलिए हम इसे आस्था अभियान कहेंगे। हम सबको इसकी सफलता की प्रार्थना करनी चाहिए।“

सारी रात आस्था अभियान की तैयारियां की जाती रहीं। हर सड़क पर पानी के टैंकर और दमकल गाड़ियां खड़ी थीं। हालांकि यह समझना कठिन था कि मिक अगर फिर रिस गई तो ये गाड़ियां भला क्या कर लेंगी? चप्पे-चप्पे पर पुलिस के जवान तैनात थे जो अपनी सुरक्षा के लिए अपने पास पानी से भरी बाल्टी और गीले गमछे, तौलिए रखे हुए थे। कारखाने के उस हिस्से को, जिसमें मिक बननी थी, शामियाने से ढांक रखा गया था। दमकल वाले उसे पानी से तर कर रहे थे। हर पांचवें मिनट कारखाने के ऊपर मंडरा रहे हेलीकाप्टर से पानी का छिड़काव किया जा रहा था।



16 दिसंबर को सुबह साढ़े आठ बजे मुख्यमंत्री की उपस्थिति में कारखाना चालू किया गया। राज्यपाल प्रो. के.एम. चांडी भी, जिन्होंने हादसे के बाद से भोपाल का पानी भी पीना बंद कर रखा था, कारखाने पधारे। बाहर कारखाने के फाटक पर अटलबिहारी वाजपेयी पुलिस वालों से भीतर जाने के लिए झगड़ रहे थे।

पहला दिन खत्म होने तक स्टोरेज टेंक नंबर 619 में रखी 15 टन मिक में से चार टन और फौलादी ड्रमों में रखी 1.2 टन मिक को कीटनाशक में बदल दिया गया था। अगली सुबह यह सारी प्रक्रिया फिर दोहराई गई और शाम होते-होते चार टन मिक और समाप्त हो चुकी थी। तीसरे दिन के खत्म होने तक बारह टन मिथाईन आइसोसाइनाईड कीटनाशक बनाकर खपाई जा चुकी थी। पहले लगाए गए अनुमान के हिसाब से अब सिर्फ चार टन मिक ही बच रही थी, लेकिन बाद में मालूम हुआ कि यूनियन कारबाइड के प्रबंधक इस बारे में भी झूठ बोल रहे थे। कारखाने में कहीं ज्यादा मिक मौजूद थी। कारखाना तीन के बजाए पूरे सात दिन चलाना पड़ा और इस दौरान बारह के बजाए चैबीस टन मिक को खपाना पड़ा। 

भोपाल में आस्था अभियान से जुड़े किसी भी वैज्ञानिक या नेता का सिर उस हफ्ते शर्म से नीचे नहीं झुका था।

लगातार कई दिनों तक भोपाल के लोग यह भी नहीं तय कर पाए कि वे क्या खाएं, क्या न खाएं। क्या हवा और पानी सुरक्षित है? क्या फल और सब्जियां इस्तेमाल करना निरापद है? क्या मछली और मांस इस्तेमाल किया जा सकता है? प्रशासन की ओर से जो सूचनाएं दी गईं, उनमें भ्रम और भी बढ़ा। कहा गया पानी सुरक्षित है, पर कृपया उबालकर पिएं। सब्जियां सुरक्षित हैं, पर पकाने से पहले उन्हें अच्छी तरह धो डालें। इसी तरह कहा गया कि मछली और मांस खाने योग्य है, पर साथ-साथ मांस और मछली बेचने पर प्रतिबंध भी लगा दिया। कत्लखाने अगले आदेश तक के लिए बंद कर दिए गए। कोई अधिकारी यह बताने की हालत में नहीं था कि ये सारे आदेश क्यों और किस आधार पर दिए गए।

पहल की एकलव्य नामक एक संस्था ने। मध्य प्रदेश शासन के अनुदान से गांवों के स्कूलों में विज्ञान-शिक्षण का प्रचार करने वाली इस संस्था ने हवा, पानी, वनस्पति, अनाज व अन्य वस्तुओं की जांच का बीड़ा उठाया। लेकिन बहुत जल्द उसे समझ में आ गया कि तमाम प्रयोगशालाएं सरकारी नियंत्राण में हैं और उनमें काम करने वाले ज्यादातर वैज्ञानिक ऐसे परीक्षणों से कतरा रहे हैं।

जांच सरकार ने भी करवाई। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान का एक जांच दल 11 दिसंबर को भोपाल पहुंचा। उस दल ने पाया कि गैस के असर से मवेशी महज तीन मिनट में मर गए थे। मवेशियों की आंखों में पानी बहा था और मुंह से झाग निकला था। गाभिन गायें अचानक जन गई थीं। हल्के असर में आए पशुओं का दूध भी एकाएक सूख गया था और रोज 8 से 10 लीटर दूध देने वाली गायें आधा लीटर दूध भी नहीं दे पा रही थीं।

सरकारी हिसाब से मवेशी ज्यादा नहीं मरे सिर्फ 1047। हां, करीब 7 हजार पर असर जरूर पड़ा और वे बीमार हो गए।

गैस के असर वाले इलाकों में कई जगहों से पानी और मछली वगैरह के नमूने लिए गए। भोपाल की झीलों व ताल तलैया की मछलियों में रक्त की कमी पाई गई।

वनस्पति और मिट्टी पर मिक के असर का अध्ययन केंद्रिय जल प्रदूषण निवारण बोर्ड ने किया। बोर्ड ने नीम के पेड़ पर अध्ययन केंद्रित किया, क्योंकि नीम वातावरण के प्रति अपेक्षाकृत सबसे ज्यादा संवेदनशील होता है। बोर्ड ने पाया कि फैक्टरी के आसपास करीब साढ़े तीन वर्ग किलोमीटर क्षेत्रा में वनस्पतियों पर मिक का सबसे भयानक, इसके बाद साढ़े दस वर्ग किलोमीटर इलाके में बुरा, 16 वर्ग किलोमीटर इलाके में मामूली और 25 वर्ग किलोमीटर इलाके में हल्का असर पड़ा था।

पत्तियों तक ने गवाही दी।

मेथी के पौधे भी काफी संवेदनशील पौधे हैं। फैक्टरी से चार वर्ग किलोमीटर दूर तक ये पौधे पूरी तरह नष्ट हो गए थे। हादसे के आठ दिन बाद भी नए पौधे जड़ें पकड़ने को तैयार नहीं थे। नीम, अरंडी, करंज और बेर पूरी तरह बर्बाद हो गए थे। लेकिन तालाबों, तलैयों के किनारे यही पौधे व पेड़ एकदम ठीकठाक व स्वस्थ थे मानो पानी के संसर्ग ने उन्हें अपार जीवनी-शक्ति प्रदान की। वैज्ञानिकों ने इस आधार पर कहा कि भोपाल अगर ताल-तलैयों का शहर न रहा होता तो मिक का कहर और भी भयानक होता।

एहतियात के तौर पर बोर्ड ने सुझाव दिया कि गैस-प्रभावित क्षेत्रों के बेर, आम व पपीते वगैरह कम से कम एक मौसम तक इस्तेमाल न किए जाएं।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का एक दल भी भोपाल गया था। अपने अध्ययन के बाद इन वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी कि बाग-बगीचों के फलों व सब्जियों का कम से कम एक मानसून बीतने तक इस्तेमाल न किया जाए क्योंकि इन पौधों की अनुवांशिकी पर भी मिक का असर पड़ा है। इन वैज्ञानिकों ने तो सारी फसल उखाउ़ डालने और जमीन को कम से कम एक साल तक परती रखने की सलाह भी दी थी।

हादसे के एक महीने बाद लखनऊ में हुई राष्ट्रीय विज्ञान कांग्रेस में भोपाल पर भी बातचीत हुई। एक वैज्ञानिक ने अपना पर्चा पढ़ते हुए बड़े उत्साह से कहा थाः ”गुलाब प्रेमियों को यह जानकर बड़ी प्रसन्नता होगी कि भोपाल में गुलाब के पौधों पर मिक का कोई खास असर नहीं पड़ा है।“ भर आता है मन ऐसी शोध को देखकर। पर यह एक बहुत कड़वा सच है कि भोपाल कांड के बाद हमारे समाज में, नेतृत्व में, वैज्ञानिकों में, अधिकारियों में ऐसे सैकड़ों गुलाब हैं, जिन पर न तो जहरीली मिक का और न उससे मारे गए हजारों लोगों का कोई असर हुआ है। वे तब भी खिले हुए थे और आज 25 बरस बाद भी खिले हुए हैं।

गांधी शांति प्रतिष्ठान से प्रका”शित पुस्तक ‘हमारा पर्यावरण’ के स्वास्थ्य नामक अध्याय में छपे ‘भोपाल कांड’ के संपादित अंश।

छत्तीसगढ़ के डी. जी.पी. श्री विश्वरंजन के लेख पर मेरा कमेन्ट!

(मोहल्ला लाइव पर छपे छत्तीसगढ़ के डी. जी.पी. श्री विश्वरंजन के लेख पर पर मेरा कमेन्ट! मैं नक्सालियों की हिंसा का पैरोकार नहीं हूँ मगर पुलिस की तानाशाही के खिलाफ अवश्य हूँ! विश्वरंजन के लेख से जो मन में शंकाएं हुयी साफ़ साफ़ कह दी! लोकतंत्र में विश्वाश का मतलब ये नहीं होता की सरकार को गुंडई का लाइसेंस दे दिया जाए! सच ये है की आज़ादी के ६३ साल बाद भी आम जनता खाकी वर्दी से कापती है! हाँ ये बात अलग है की यही डरने वाले लोग पुलिस की हर उस कारवाई को जायज़ ठहरा देते हैं जब वो किसी को आतंकवादी या नक्सली कह कर मार गिराते हैं! हम हर प्रकार की हिंसा की कड़ी आलोचना करते हैं!  चाहे वो कानूनी हो या गैरकानूनी! हम मानवीय समाज की कल्पना करते हैं और यहाँ खून खराबे की कोई इजाज़त नहीं )

महामहिम,

मैं २७ साल का हूँ! आपकी भाषा में रोमानी नक्सली हूँ! माले के साथ जुड़ा रहा था बाद में समाजवादी(?) हो गया! अब भटक रहा हूँ किसी सच्ची राह में! लोकतंत्र में विश्वाश है भीड़तंत्र में नही!

आपके लेख के बाद कुछ बातें मन में आई हैं सार्वजानिक तौर पर कहने की जुर्रत कर रहा हूँ

लेख के अंत में आप स्वय ही साबित करते हैं की कवि या चित्रकार होने का मतलब ये नहीं की आदमी संवेदनशील हो या क्रूर ना हो! मुझे लगता है आप अपना परिचय दे रहे है की आप कवि तो हैं मगर संवेदनशीलता की उम्मीद ना की जाए! तो हजुर आपसे है भी नहीं!

हम जानते हैं और मानते हैं की नक्सली दूध के धुले नहीं हैं! एक डाक्टर एक सामाजिक कार्यकर्त्ता नक्सली हो सकता है बल्कि आदर्श स्थिति में उसे होना ही चाहिए! क्योकि लोकतान्त्रिक सरकारें दबाव गुटों के बिना नहीं चलती है! आप चाहते हैं की आपके अधिकारी अदालतों को जवाबदेह ना हों और सीधे नक्सल विरोधी अभियान चलायें!

आप नक्सालियों को सिख देना चाहते हैं की वो दस्तावेजीकरण बंद कर दें ठीक वैसे ही जैसे पुलिस नहीं करती! ऍफ़ आई आर दर्ज करने से लेकर फर्जी मुठभेड़ें अंजाम देकर ही सच्चे लोकतंत्र की स्थापना की जा सकती है!
छत्तीसगढ़ के डी. जी.पी. श्री विश्वरंजन
उनके उद्देश्य तो साफ़ है वो लाल सत्ता स्थापित करना चाहते हैं और इसके लिए विध्वंस का रास्ता अपना रहे हैं! इसमें कौन सी चेतावनी देने वाली बात है! ये देश और दुनिया का हर बच्चा जानता है!
आप ये सब बता कर आखिर स्वय को “घोर बौद्धिक” के अलावा क्या साबित करना चाह रहे हैं!
विरोध पुलिस या सरकार की उन बातों का नहीं है की उन्होंने किसी को गिरफ्फ्तर क्यों किया है! विरोध मानवाधिकारों को कुचल देने का है! आप छत्तीसगढ़ में भारतीये गणतंत्र के त्रतिनिधि हैं! वहां की आम जनता के अभिभावक भी दोहरी ज़िम्मेदारी है और आप दस्तावेजीकरण के विरोध में बोल रहे हैं ये आपकी औप्नेवेशिक मानसिकता नहीं दर्शाता तो और क्या है आप किसी भी हाल में निबट लेना चाहते हैं! आदिवासियों या आम जनता को बिना आदालत गए सलटा देना चाहते हैं! और एक पत्रिका में लिख कर घोषणा करते हैं !

महामहिम,

आप जानते हैं! की आम जनता पुलिस वालों से किस कदर खौफ खाती है ??? आपकी बड़ी मेजों के सामने आकर हर कांपने वाला इंसान अपराधी नहीं होता वो नैतिक तौर पर स्वय को अपराधी मान लेता है!
क्या मैं आशा करूँ की आप मेरे इस खुले पत्र को सकारात्मक रूप से लेंगे और अपने काम के साथ साथ पुलिस मनुअल में सुधर के लिए आवश्यक कदम उठाएंगे ???
क्या आप आदिवासी लड़कियों की तस्करी के खिलाफ विशेष कार्यबल बनाने की दिशा में मुख्यमंत्री जी को पत्र लिखेंगे या कोई विशेष अध्यन करवाने के लिए गृह विभाग को अनुशंषा पत्र लिखेंगे ?????

क्या आप बस्तर में शोशल आडिट को मुस्तैदी से अंजाम दिलवाने के लिए आरक्षी अधीक्षक को कहेंगे ????
क्या आप बस्तर में बाल अशिकारों को सुनिश्चित करने की बात करेंगे ????

क्या आप वादा करते हैं की पुलिस कर्मी या कोई भी अपराधी या सलवा जुडूम का कार्यकर्त्ता किसी महिला की आबरू से खिलवाड़ नहीं करेगा ?????

क्या आप सुनिश्चित करते हैं की आप कानून के प्रहरी के रूप में हर कानूनी अपराधी को कानूनी रास्तों से सजा दिलवाएंगे ????????

अगर हाँ तो आपके पीछे सारा देश खड़ा है

अगर नहीं तो माफ़ कीजिये मैं आपको अपराधी और नक्सालियों की भषा में राजनैतिक और औधोगिक दलाल ही कहूँगा


(महामहिम शब्द का उपयोग किसी अविवादित पद के लिए किया जाता है! यहाँ सनद रहे की तानाशाह भी अविवादित हुआ करते हैं )

हमारी विचारधाराएँ कैसे बनती हैं


हमारी  विचारधाराएँ  कैसे  बनती  हैं  ? मैं  सोचता  हूँ  की  हर  विचारधारा  के  अपने  व्यक्तिक  कारण  हैं , और  यही  व्यक्तिक  कारण  तमाम  वैचारिक  द्वंदों  को  जनम  भी  देती  हैं  और  समुहवादी संकल्पना भी तैयार करती हैं! विचार एक प्रकार का नशा है जो जीवन भर आपका पीछा नहीं छोड़ता! और हर व्यक्तिक जीवन समाज पर अपना प्रभाव अपनी विचारधारा के ज़रीये ही छोड़ता है, ये बात अलग है की वर्ग विशेष उसे नकारात्मक समझा है या सकारात्मक 
अभी मैंने अपने चैतन्य जीवन का पहला दशक पार किया है और पुरे दशक जिस अथक संघर्ष का सामना किया वो किसी नेपोलियन किसी मुसोलनी किसी बिस्मार्क से कम नहीं ऐसा मैं समझता हूँ वैसे हर इंसान स्वय के लिए ऐसा ही समझता है! एक पुरे दशक के संघर्षों ने जीवन के इतने रंग दिखाए हैं की कभी कभी तो सब झूठ ही लगता है!  
बिनायक सेन को उम्रकैद दिए जाने के बाद से मेरे निजी जीवन पर गंभीर प्रभाव हुआ है! वैचारिक बदलाव की प्रकिर्या में ये एक गंभीर झटका है! 
सिलसेवार याद करता हूँ तो याद आता है की मैंने जहाँ जनम लिया वो भूमि किसी लैंड माइंस से भरी युद्ध भूमि से किसी तरह कम नहीं थी! ७या ८ की उम्र से ही शिलापूजन और हिन्दू मुस्लिम दंगे की ख़बरों से सहमा हुआ इलाका अर्ध-सैनिक बलों के जूतों से गूंजता ही रहता था ऊपर से हर महीने दो महीने पर किसी रिश्तेदार के नक्सलियों के हाथों मारे जाने की खबर भी आजाती थी! ये २०वि सदी का अंतिम दशक की शुरुआत थी! भय और  अविश्वाश के वातावरण में शांतिकाल की बात इतिहास की फटी किताबों की कहानियों की तरह सुनाई जाती थी! याद करता हूँ तो याद आता है की बंदूकों को साफ़ करते हुए परिवार के लोग समरसता की बातें बताया करते थे! मेरे अब्बी (पिता) मुझे अक्सर कहा करते की आम इंसान बुरा नहीं होता मगर सियासतदान उनकी परेशानियों का नाजायज़ फायदा उठाया करर्ते हैं! जो भी हो मैं अपने ननिहाल नहीं जा पाता था वहां रहना खेलना और मस्ती करना मज़ा देता था मगर जाति का पठान होना कोठी क्षेत्र (वर्त्तमान में झारखण्ड का चरता जिला) में नक्सलियों के हाथों मारे जाने के लिए काफी था मुसलमान होने की वजह से हुन्द्दंगियों का शिकार होजाना भी स्वाभाविक था! और इन सब से बच जाने पर अर्ध सैनिक बलों का शिकार होना कोई अनहोनी नहीं होती! तितार्फे खतरे की वजह से मुझे ननिहाल नहीं भेजा जाता था! मुझसे बड़े भाइयों को पहले ही शहरों के लिए रवाना कर दिया गया था! मैंने बचपन अकेला ही गुज़ारा! यही वो दौर था जब मैंने पहली बार एयर गन से निशाना लगाना सिखा और भी दो नाली से होते हुए रायफल तक चलाना सिखा! और ये सब कुछ किसी विशेष परिश्थिति के लिए था! भय की सिहरन साफ़ महसूस होती थी 
९५   के बाद ये बादल कुछ छटे मैं ननिहाल गया! हुमाजान नाम का गाँव है सिल्दाहा बाज़ार के पास चतरा जिला तब शायद हजारीबाग था! मेरे नाना बड़े सामाजिक किसम के बड़े दिल वाले इंसान थे! इनकी एकलौती खानदान थी जिसे ना तो नक्सालियों ने कभी टोका ना ही पुलिस ने! 
इस गाँव की कुल आबादी कम से कम दो सौ घर थी दूर दूर फैले जंगलों के बीच ये गाँव काफी खुबसूरत हुआ करता था! करीब १०० घर शेखों के और १०० घर दूसरी हिन्दू जातियों के थे! यहाँ हमारा ननिहाल ही एकलौता पठान था जो कुछ ही बरस पहले वहां जाकर आबाद हुआ था! नाना ने १९८० में अपना पुश्तैनी इलाका छोड़ कर इस जगह को चुना था ताकि वो अपना अंतिम जीवन पूरी तरह आज़ाद हो कर जी सकें! बड़े सूफी विचारों के थे वो भी! शायद उन्हें पाता ही नहीं था की वो जहाँ शांति की तलाश में जा रहे हैं वहां जिंदा रहना ही अपने आप में एक चमत्कार था! अब जो हो किसी एक व्यक्ति के लिए समाज कहाँ रुकता है भला  
इस गाँव में अर्ध सैनिक बलों के लिए कैम्प लगा और बाद में जला दिया गया! मैंने देखा की पुलिस की जिप की घरघराहट सुनते ही लोग भागते हुए जंगल में घुस जाते थे! लालटेन धीमी कर दी ज़ाती थी! जवान लडकियां अनाज की कोठियों के पीछे छुप ज़ाती बच्चों को बिस्तर पर ज़बरदस्ती लिटा कर मुंह छिपा दिया जाता! मैंने कभी देश पर आकर्मण नहीं देखा मगर मैं समझता हूँ ऐसा ही कुछ हुआ करता होगा! ऐसी अफरा तफरी मच ज़ाती की लगता जैसे कोई विदेशी आकर्मंकारी घुस आया हो बर्बादी के इरादे से 
मैं समझता था की थाने की पुलिस इमानदार होती है वो सिर्फ चोर डाकुओं को पकडती है! अर्ध सैनिक बलों के लिए तो पहले से ही विश्वाश था ये कमीने होते हैं और सरकार इन्हें मारने के लिए ही भेजती है! मगर यहाँ ये भी भरम टूट गया! थाने की पुलिस को नंगा नाच करते देखा तो सोचा इनकी शिकायत करनी चाहिए! तब तक मुझ कलम से लिखने की इजाज़त नहीं थी पेन्सिल से ही लिखा करता था सो अपनी पेन्सिल से ही कई ख़त एस पी को लिखा! सब बातें लिखी मैंने कहा मैं गवाही दूंगा मगर एस पी साहब ने या तो ख़त नहीं देखा या एक बच्चे की बात को दिल पर नहीं लिया! 
इसी दौरान मुझे अपने दोस्तों से पता चला था की अर्ध सैनिक बलों के  पास ऐसा यंत्र होता है जिससे ये किसी के घर में होने वाली बात भी सुन लेते हैं! और सरकार इन्हें उन्हीं इलाकों में भेजती है जहाँ सरकार के खिलाफ विद्रोह हुआ हो! और इन्हें गोली चलाने के लिए किसी से आदेश नहीं लेना पड़ता इनके पास दरों गोलियां होती हैं जिनका हिसाब भी देना नहीं होता! मैं ने सोचना शुरू किया की हम तो देश भक्त ही हैं सब लोग झंडा फहराते हैं! मेरे कमरे में अब्बी ने भगत सिंह और सुभाष बाबू की तस्वीर भी लगवाई थी! हम चोरी डकैती भी नहीं करते! अवैध असलहा भी नहीं है फिर हम लोग देश द्रोही कैसे हुए! मेरे अब्बी  क्षेत्र के जाने माने ठेकेदार थे सारा ठेका सरकारी ही होता है! क्षेत्र के विधायक जी भी हमेशा आते हैं बड़ा बाबु और छोटा बाबु(इंस्पेक्टर और सब इंस्पेक्टर) भी हमेशा आते हैं! अगर हम लोग देश द्रोही हैं तो आखिर ये क्यों आते हैं!     
मेरे घर से एकाध किलो मीटर की दुरी पर अर्ध सैनिक बलों का कैम्प था जहाँ की सुबह गूलियों की आवाज़ से होती थी! शूरू शुरू में लगा की ये रात में जिनको पकड़ कर लाते हैं उनको जान से मारने के लिए गोली चलते हैं मगर बाद में पाता चला की वहां शूटिंग रेंज भी है जहाँ ये शूटिंग परैक्टिस करते हैं! मगर बात बड़ी सीधी सी रही डर तो हर हाल में लगता था 
मैं हाल तक पंजाबियों से सख्त नफरत करता था इसका बीज वहीँ पड़ा था! क्योकि ज़्यादातर पुलिस वाले पंजाबी होते थे और बात बात में गाली देना समान छीन लेना हर मामले में दखल देना इनकी आदत में शुमार था 
जी टी रोड पर बनी पान गुमटियों और किराना दूकान से मुफ्त में समान लेना कोई नयी बात नहीं थी!  
(----जारी रहेगा) 
सपाट ढंग से पिछले पुरे दो दशक को रखने की कोशिश कर रहा हूँ! जैसा मैंने समझा और जो अनुभव किया 

ये जो मुसलमान हैं ना


आज का पूरा दिन मुस्लिम मुद्दों के साथ गुज़रा! अपनी ज़िन्दगी का शायद पहला दिन था! वैसे भी आपकी सामाजिक पहचान आप आचार विचार से ज्यादा अहमियत रखती है सो आप चाहे अनचाहे प्रोफाइलिंग का श्हिकर होते हैं फिर अपनी पहचान से जुड़ने की कोशिश करते है मगर मैं सही मायने में मुस्लिम मुद्दे को बेहतर ढंग से समझना चाहता था! समाज में जाकर उन्हें जांचना ज्यादा प्रभावी रहता है मगर व्यावाहारिक रूप में आम जनता और सामाजिक मुद्दा अलग अलग अलग होते हैं! सामाजिक मुद्दे आम लोग तय  नहीं करते ये काम खास लोगों का होता है! और ये खास लोग आम जनता को मवेशियों की तरह हांकते हैं सो ज्यादा ज़रूरी था की इनकी विचार गोष्ठियों में जाया जाए और इन्हें समझने की कोशिश की जाए 
और संजोग ऐसा हुआ की पहला में एलिट मुस्लिम ग्रुप के साथ तो दूसरा पहर में पसमांदा मुस्लिम ग्रुप के साथ गुज़रा 
दो ही तिन घंटे में कुछ हद तक तस्वीर साफ़ होगई की दर-असल समस्या क्या है और ये खास लोग खास क्यों हुआ करते हैं 
ताज्जुब हुआ की तमाम मसलों में वो बातें घायब थी जिनपर सही मायने में चर्चा की जानी चाहिए थी! पहले पुरे पहर में एक इंजिनियर समाज की बात करते रहे और किस तरह मुस्लिम समाज की सही तस्वीर देश और दुनिया के सामने पेश की जाए ये बताते रहे! उनके साथ डायस पर बैठे दुसरे पत्रकार थे (मगर ये मुस्लिम नहीं है) जो ये बताते रहे की इन्टरनेट का इस्तेमाल मुस्लिम इमेज के लिए कितना ज़रूरी है 
मुस्लिम मुद्दों की बैठकें हमेशा से ही ऐसी बचकानी होती हैं! आप मुसलमान है तो दंगे की बात कीजिये आर एस एस की बात कीजिये कांग्रेस का रोना रोईये! मतलब काम नहीं बकवास करते रहिये अब मुझे समझ नहीं आता की इन्टरनेट वार करने से कौनसा किसी का भला होना या समाज की समस्या ख़तम हो जानी! और अगर मीडिया सच नहीं दीखता तो कौन सा आपही सच दिखा देंगे जो अस्तित्व में है उसको सुधरने के बजाये अक्सर है लोग दुसरे विकल्पों को खड़ा करने में क्यों लग जाते हैं! और आम आदमी इन्टरनेट से जुड़ भी कितना पाया है मुझे नहीं pata 
एक साहब इसी मित्तिंग में कह रहे थे की हम हजारो साल ग़ुलाम रहे हैं इस लिए हमारी मानसिकता ऐसी है (अब इनको कौन कहे की ये प्रचार आर एस एस का है और वो इसे मुसलमानों के खिलाफ ही इस्तेमाल करते हैं)! और यकीनन हम ऐसा क्यों माने की हम गुलाम रहे हैं! जो लोग मानते हैं उन्हें मानने दें 
किसी भी सत्ता के अन्दर रहना अगर  गुलामी है तो यकीनन आप आज भी ग़ुलाम है और हमेशा रहेंगे क्योकि लोकतंत्र में भी सरकारें बहुमत से नहीं बनती 
इसी सरकार को देखे तो पचास प्रतिशत से कम की टोटल पोलिंग में से बहुमत प्राप्त किया है! इसलिए अगर कुल ९० प्रतिशत वोट भी प्राप्त कटी तो ज़ाहिर है की कुल देश का बहुमत इसके खिलाफ है 
खैर गिलास आधा खली है या भरा इस पर बहस कभी ख़तम नहीं होगी 
इसी मीटिंग में एक लड़की ने मुस्लिम औरतों का मुद्दा भी उठाया जिसपर बात की गुंजाईश ही नहीं थी क्योकि यहाँ बात धरातल की नहीं अंतरजाल की हो रही थी!
यहाँ अंग्रेजी के शान में कसीदे भी पढ़े गए! क्या लगता है ये वैश्विक भाषा से जोड़ने की कोशिश है१ पहली नज़र में भले ऐसा लगे मगर सही मायने में ऐसा है नहीं जहाँ तक मैं सोचता हूँ और खासकर वहां से लौटते हुए जब मैं ऑटो वाले से बात कर रहा था उसके बाद! 
उसके विचार से मुस्लिम औरतों में शिक्षा की कमी है बेचारी पढ़ लिख नहीं पाती! सोच कर हंसी सी आई की आज से पंद्रह साल पहले खातून मशरिक और तमाम तरह की उर्दू मासिक पत्रिकाओं का सर्कुलेशन २५ लाख से ऊपर था! मेरे पुश्तैनी गाँव (बिहार के गया के गुरुआ का जेईबीघा) में मेरी बाएँ पढ़ा करती थी! और जब हम वहां जाते तो हमें ये किताबें पड़ने नहीं क्योकि इश्क और सेक्सुअलिटी की की अभिवयक्ति की वजह से इसे बच्चों के लायक नहीं माना जाता था) 
उर्दू का एक रूप गुरुमुखी(पंजाबी भाषा जिसमे लिखते हैं) अब भी पूरी तरह से प्रचलित है! शाहमुखी (अरबी स्क्रिप्ट वाली उर्दू) मार दी गयी ज़ाहिर है दायरा संकुचित होगया!
कुद्र्तुलैन ह्य्दर की उर्दू कहानियाँ आज पड़ना अपने आप में क्रांति होगी मगर ये कहानियाँ ज्यादा से ज्यादा  दो दशक भर पहलेतक आम मुस्लिम लड़कियों में आम तौर पर पढ़ी जाती थी! 
हमने उर्दू को खो दिया हमने औरतों को (मर्द भी कितने पढ़े लिखे माने जाते हैं, माने जाते तो मोदी कब कहता की ये लुंगी वाले लोग पंचर लगाने वाले लोग) को जाहिल की श्रेणी में खड़ा कर दिया! मैं उर्दू हिंदी किसी का पक्षधर नहीं हूँ मैं तो सिर्फ एक स्थिति रख रहा हूँ 
इलीटिस्ट अपने समाज को सही रूप में दिखाना चाहते हैं इस लिए भाषाएँ बदल रहें हैं! 
मेरे एक दोस्त के दादा अच्छी फ़ारसी जानते थे उर्दू भी इंग्लिश भी और हिंदी भी संस्कृत में कवितायें भी की हैं उन्होंने मेरा दोस्त संस्कृत पढ़ लेता है इंग्लिश बोलता है हिंदी जानता है मगर उसका उर्दू फारसी से दूर दूर का रिश्ता नहीं! क्यों ??????
वो नहीं जानना चाहता हमारे बारे में अगर जानना होता तो वो अपने दादा की परंपरा निभाता और मामलों में तो निभाता है इसमें क्यों नहीं 
सीधा है वो नहीं जानना चाहता तो मैं क्यों ज़बरदस्ती उसे बताऊँ  
मैं ने हिन्दू धरम को अच्छी तरह अध्ययन किया तमाम सेक्टों को! विवादों को जानता हूँ आर्यसमाज को जाना समझा बुध्य धरम को पढ़ा जैन धरम को......मुझे जानना था मैंने किताबें खरीदी और पढ़ा 
संकृत की क्लास किया ताकि सिख सकूँ.........जितना सिख सका सिखा 
मुझे किसी ने हाथ पकड़ कर नहीं बोला ऐसा करो तो मुसलमान ऐसा क्यों करना चाहते हैं.
 दरअसल इनका असली उद्देश्य समाज को लगातार अवसाद में रखना है इन्हें लगातार सिखने में लगाना है! 
मुसलिम समाज समझता है की साइंस ही तरक्की का सही रास्ता है सही समझता है मगर इसने आजतक तेक्नालोग्य और साइंस में फरक नहीं जाना! इंजीनियर्स की बड़ी फ़ौज तो बना ली मगर एक भी बेहतरीन समाज विज्ञानी पैदा नहीं कर सका! जो हुए सो चल दिए उनकी जगह खली ही रही साहित्यकार पैदा ना कर सका जो शायर बने वो निहायत ही नकारे और चापलूस........फीकी कलम वाले नौटंकीबाज़..........मुस्लिम लीडरशिप तो खैर है ही नहीं और ना हो ये अच्छा भी है क्योकि  
आर एस एस जैसे संगठनो को बढावा देने वाले असली लोग यही इलीटिस्ट और कौम की रहनुमाई करने वाले लोग (मजाक उदा रहा हूँ) हैं 

दुसरे पहर के कार्यक्रम में पसमांदा मुस्लिम ग्रुप में चर्चा आरक्षण की शुरू हुयी और सच्चर और रंगनाथ मिश्र कमीशन पर बहस चलती रही बचकाना और अहमकाना 
ताज्जुब लगा की कुछ लोग इस के बड़े खिलाफ है और उनका मानना है की इस्लाम ऐसी इजाज़त नहीं देता इस्लाम में जाती व्यवस्था नहीं है 
हम्म अगर नहीं है तो अली अनवर को "जोलाहवा" पुकारते तो सुना है मगर किसी को सय्यादवा (सय्यद), शेखंडी (शेख) पठान्वा कहते नहीं क्यों आखिर (अच्चा हाँ ये लास्ट वाले शब्द मेरे आविष्कार हैं इसलिए कोई भी जब इस्तेमाल करे तो महामहिम का नाम लिखे वरना केस ठोंक दूंगा)
खैर इन चीजों पर गुस्सा निकलने से कुछ नहीं होना 
आखिर समस्या क्या है मुस्लिम समाज की ???????
मुझे लगता है एकलौती समस्या है की इस समाज के भीतर अब ना तो करम के साहित्यकार बचे हैं और ना सामाजिक कार्यकर्त्ता (एक नाम होसके तो बताये जो मुस्लिम तो हो मगर मुस्लिम मुद्दों अंगे दंगे या मुस्लिम एजुकेशन के फलाह के अलावा किसी सामाजिक मसले  पर काम करता हो) नहीं ऐसा कोई नाम मेरी नज़र से नहीं गुज़रा 
असली समस्या यही है! एलिटिस्ट समाज पर पूरी तरह से हावी हैं जो ना तो असली मुद्दे को जानते हैं और ना ही जानना चाहते हैं 
देश होने वाली कुल मानव तस्करी में ७० फिसद से ज्यादा भुक्तभोगी  और इस व्यापार से जुड़े ५० फिसद लोग मुसलमान हैं! देश में बच्चों की तस्करी का शिकार सबसे बड़ा हिस्सा मुस्लिम बच्चों का है! मगर आज तक इन सवालों को उठाने की हिम्मत किसी में नहीं हुयी! कंधमाल दंगों के बाद से एक इसाई बच्ची डेल्ही में जब बेचीं गयी तो देश भर में हंगामा मच गया! मगर गुजरात दंगों के बाद वहां से सैकड़ों लडकियां बेच दी गयी तो शाहबानो मामले में हल्ला मचने वाले नरम गद्दों में पड़े थे! आज भी शादियों के नाम पर नौकरी के नाम पर बड़ी संख्या में लडकियां बेचीं जा रही हैं तो हम सोये हैं! हम सरकार से पूछना भी नहीं चाहते की वो ऐसे मुद्दों पर क्या सोचती है 
पिछले दिनों मै एक मामले की जांच के लिए एक सहायक संगठन "शक्तिशालिनी" की पुराणी फाईल्स देख रहा था! मेरा दिमाग देख कर सरक गया की पारिवारिक प्रताड़ना और घर से भागने वाली औरतों के आधे से ज्यादा मामले मुस्लिम औरतों के थे! ये एक प्रकार का इम्पोवार्मेंट भी है की चीजें बाहर निकली हैं! मगर समाज के भितर काम किये जाने की आवश्यकता को भी दर्शाता है   

चाय ख़तम होगई और जोश भी 
और हाँ चुस्की लेने के लिए कमेन्ट मत करियो ना तो अपना समझिये1 नागिन से बच के निकल सकते हो मेरे से ना 
ऑटो वाले से बात की कथा बाद में कहूँगा काफी होगया आज