मैं जिस जगह में पैदा हुआ वहां मैं बाहरी था साथियों के साथ खेलते पढ़ते हुए बराबर अहसास रहता की मैं यहाँ का नहीं हूँ और जैसे ही ये बात भूल जाता कोई याद दिला देता! "पठान शैतान लम्बे लम्बे कान" जैसी कवितायेँ कोर्स में तो नहीं थी मगर सबको एक सामान रूप से याद थीं जबतक होश कम रहा खुद भी बड़े लय में गाते रहे और जब पता चला की हम खुद ही पठान हैं तो बदन से खून ही सुख गया जैसे!
अब बड़ा होगया हूँ अब बड़े से देश में बड़े मज़े से रहता हूँ लोग याद दिलाते हैं की तुम बाहरी हो जी चाहता है साथ में जोड़ दूँ जन्मजात बाहरी हूँ! पहले बच्चा था अब बच्चा नहीं रहा मैं जानता हूँ एक बाहरी की क्या सीमाएं हैं सो मैं उससे बाहर नहीं आता अपने विकास और संभावनाओं को को सीमित रखना बचपन से सिखा गया है! मगर आप अगर समझते हैं की मैं अपने बाहरी टैग से परेशां हूँ तो आप ग़लत हैं ये मुझे संतोष देता है की मैं इन में से नहीं हूँ मैं अलग हूँ और अलग होना अपने आप में मज़ेदार हैं!
इमानदारी से कहूँ तो मैं सचमुच देशभक्त नहीं हूँ और ना कभी बन सकूँगा अगर मैं कहूँ की मैं देशभक्त हूँ तो यकीनन झूठ होगा वैसे मैं गद्दार भी नहीं बनसकता क्योकि गद्दार बन्ने के लिए अपना होना ज़रूरी है सो बाहरी का टैग मुझे बेवफा और गद्दार की श्रेणी से अलग कर देता हैं ये मुझे रोमांचित कर देता हैं!
मुझे उन लोगों पर अफ़सोस आता है जो मेरे जन्मस्थान पर पुश्तैनी थे बेचारे जैसे ही बड़े हुए और बड़े स्तर पर बाहरी की श्रेणी में आ खड़े हुए उनकी बिलबिलाहट और गुस्सा कभी मेरी ख़ुशी का कारण बन जाता है तो कभी दुःख का
आखिर बेचारों को वो प्रशिक्षण नहीं मिल पाया जो मुझे मिला था! बचपन में ज़लील हो जाना बुरा नहीं है बुरा तो तिल तिल के जीने में है
अच्छा लोग कहेंगे तुम ऐसा क्यों कह रहे हो अपनी जन्मभूमि के बारे में तुम बेहद घटिया इंसान हो और उसने तुम्हें ये दिया वो दिया! सही बात है दिया तो है मगर इस की ट्रेनिंग भी बचपन में ही मिल गयी थी जब कहा जाता की हमने तुम्हें ज़मीं दी रहने के लिए तो हमारा जवाब होता मुफ्त में दी थी क्या ??? सो ये सब बकवास बात है कोई देता है तो लेता है और व्यापार में प्यार कहाँ
मैं नहीं मानता के देश गाँव मुहल्लों के बाहर होता है! वो एक समन्वय हो सकता है जनसंगठन हो सकता है सामान लोगों जिसमे मेरे तरह के कुछ अजीब लोग भी शामिल हो का समूहीकृत संगठन हो सकता है देश नहीं हो सकता! जब भी मैं देश की सोचता हूँ तो अपने आपको बिहारी पाता हूँ और कुछ भी नहीं ना तो निचे वाली यूनिट में फिट हो पाता हूँ और ना ही ऊपर वाली में! मतलब मुझे गया या मगध के अस्तित्व की चिंता नहीं है और जिस कसबे ने मुझे बाहरी टैग दिया वो तो पक्के तौर पर दुश्मनों की कैटेगरी में नज़र आता है ना हिंदुस्तान के स्तर पर अपने आप को फिट पाता हूँ! रही बात कानूनी फड्डे की तो हर बाहरी की तरह मैं भी बहुत बड़ा डरपोक हूँ कानून मानता हूँ और डर से मानता हूँ स्वेच्छा से मानने का तो प्रश्न ही नहीं उठता
वैसे तो मैं संयुक्त राष्ट्र के भी सभी कानून मानता हूँ मगर उसके पीछे भी डर ही है स्वेच्छा बिलकुल नहीं
(मूड बना तो जारी रहेगा ...................)

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