कुछ बातें जो संभ्रात इतिहास में दर्ज नहीं की जा सकेंगी

कहाँ है तरक्की बोले तो विकास


पिछला एक पूरा हफ्ता पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलग अलग जिलों में बीता कर लौटा हूँ! मन पहले ही झल्लाया हुआ था रही सही कसर दलालों (सीधे तौर पर कहें तो विदेशी एजेंट) की एक मीटिंग में देश की तरक्की की दास्ताँ सुन ली! 
वैसे सच में आप किसी से बात कीजिये बंदा फटाक से कहेगा की तरक्की हुयी है तो हालात तो बदलेंगे ही समाज में तरक्की आई है और रोजगार बढ़े हैं और की शिक्षा बढ़ी है! उदाहरण इन्टरनेट और गाडी ही होगी! मगर भैय्या जब खुद को देखता हूँ तो लगता है की कोई तरक्की नहीं हुयी हाँ परेशानी ज़रूर बढ़ी है! मगर आप देखे ब्लॉग या और कोई नेट्वोर्किंग साईट पर घूमें पता चलेगा गाली गलौज और कट्टरता हावी है वजह साले सब के सब अपनी निजी जीवन की भड़ास निकल रहे हैं कोई धार्मिक हुआ जा रहा है कोई छायावादी कवि कोई राष्ट्रवादी 
मगर सब हैं परेशान अपने निजी जीवन में लम्बी लम्बी फेक देते हैं फिर सोचते हैं की मैंने तरक्की नहीं की है तो इसमें मेरा ही कसूर है! नौजवानों की पूरी पीढ़ी मिडिया या समाजसेवा में जा रहे हैं हर बंदा सामाजिक कार्यकर्त्ता बना फिर रहा है या पत्रकार जैसा कुछ असल में हैं सब के सब बेरोजगार 
अच्छा एक उदाहरण सुनो शरद चाचू को दिन में तारे दिखने वाला बंदा पहले बोला मंहगाई की वजह से मारा फिर बोला लोकपाल की वजह से (मिडिया वालों (गालियाँ देता मगर क्या है ना की आजकल हर दूसरा आदमी मिडिया या लेखक है सो मै अपने थोबड़े का ख्याल रखता हूँ ) ऐसा खूब दिखाया) मगर जी मामला कुछ और ही है हरविंदर सिंह के बारे में बताया जाता है की वो टैक्सी ड्राइवर है और उसकी दो ऑटो हैं मगर ताज्जुब की बात ये है की उसके पड़ोसियों ने उसे कभी टैक्सी या ऑटो चलते नहीं देखा! वो हमेशा घर पर ही पड़ा रहता था वजह समझ आई लुच्चों 
सनको मत बेरोजगारी और विकल्प की कमी हरविंदर के गुस्से की असली वजह है मगर वो सामाजिक स्थितियों के कारण थप्पड़ की वजह कभी लोकपाल और कभी मंहगाई बता रहा था! मतलब ये की सरकार जिन बातों से अलग करती है हम जैसे बैल उससे सचमुच अलग हो जाते हैं! 

हाल में सुना बिहार बड़ा तरक्की कर रहा है और श्रमिको का पलायन रुक गया है! तुर्रा किस ने कहा आकडे से मैं भी खेल लेता हूँ मगर हालात नहीं बदलते कहाँ बदल रहा है बिहार कहाँ हो रहा है विकास! मुझे तो समझ नहीं आया मेरा एक भी दोस्त आजतक सेटल नहीं हो पाए और जो कम रहे है सब बिहार से बाहर हैं! और हाँ भैय्या उसमे से कोई जाहिल नहीं है (आकड़ें भी हैं जिसको चाहिए दे दूंगा)

ऐसा ही कहते हैं की पश्चिमी उत्तर प्रदेश सोना उगलता है मैं गया और मैंने देखा आम आदमी की रोज़मर्रा की तकलीफें जिन लोगों के पास ज़मीन है वो बेच रहे हैं और जगह जगह गुमटिया खोले बैठे हैं ज़मीन बेच कर आई गाडी को तरक्की कहा जा रहा है! गोबर के गंडों के बजाये गैस तो जल रही है मगर साथ साथ फसल भी और खेत भी ! लड़के पढ़ रहे हैं सो खेती नहीं करेंगे सब एम् बी एय कर रहे हैं कोई कंप्यूटर कोर्स कर रहा है! जिसने कर लिया वो क्या कर रहा है वो तो जी ट्वीशान पढ़ा रहा है या दिल्ली में नौकरी कर रहा है दस हज़ार पर अभी नया है ना 
ऐसे ही बड़े शहरों में भूखे लोग जो कभी बड़े तरक्की याफ्ता लोग कहे जाते थे भूखे मरान्सन्न निकलते हैं! 
बढ़िया है करो तरक्की अपने बाप का क्या जाता है मगर याद रखो जो आसपास भूखे लोग हैं (आपको नज़र नहीं आयेंगे जी आपकी नज़र पर विकास का पर्दा पड़ा है) वो प्रेत बन कर आपका जीना मुश्किल कर देंगे! 


इसको जारी रखने की कोशिश करूँगा पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जिलेवार ब्यौरा दर्ज करूँगा सरोकार.नेट  पर :) 

विकास करो या विनाश तुम्हारी मर्ज़ी मगर बोलो सच बोलो 

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