कुछ बातें जो संभ्रात इतिहास में दर्ज नहीं की जा सकेंगी

नेता वही, जो धारा बदल दे, देश बदल दे

चार बार अमेरिका के राष्ट्रपति रहनेवाले फ्रैंकलिन डीलेनो रूजवेल्ट. जिनकी मौत पर विंस्टन चर्चिल ने कहा, उनका जीवन मानवीय नियति की अत्यंत प्रभावकारी घटनाओं में से एक है. जब वह अमेरिका के राजनीतिक क्षितिज पर उभरे, तब अमेरिका दयनीय हाल में था. पर रूजवेल्ट ने अमेरिका को शिखर पर पहंचाया. अमेरिका, भयावह मंदी की चपेट में था. रूजवेल्ट ने न सिर्फ़ मंदी का मुकाबला किया, बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था को दुनिया की ताकतवर अर्थव्यवस्था में बदल दिया. जो मुल्क लड़खड़ा रहा था, उसकी सेना द्वितीय विश्वयुद्ध में विश्व मानचित्र पर छा गयी. इस तरह रूजवेल्ट ने अमेरिकी शताब्दी की नींव रखी. दुनिया का सबसे ताकतवर देश बनाया. समृद्ध देश और मुक्त समाज बनाया. रूजवेल्ट, मिलनसार थे, उदार विचारों के थे. अदभुत निजी साहस से संपन्न, धैर्यशील, बेहतर मर्यादित इंसान. पर निर्णयों में बेरहम और निष्ठुर भी. सफ़ल रणनीतिकार. वह देश के अंदर और बाहर लोकतंत्र के महान शिल्पियों में गिने गये.

पहली बार 1932 में वह राष्ट्रपति बने. देश ओर्थक मंदी से तबाह था. तीन करोड़ लोग बेरोजगार थे. पद संभालते ही रूजवेल्ट ने न्यूडील पॉलिसी का क्रियान्वयन शुरू किया. चुनाव प्रचार में उन्होंने जनता से वादा किया था, मैं जीता तो इस नीति को लागू कंगा. मंदी खत्म करूंगा. देश को अत्यंत समृद्ध बनाऊंगा. खेती, व्यापार और उद्योग में उन्होंने बड़े पैमाने पर सरकारी योजनाएं क्रियान्वित कीं. वाल स्ट्रीट क्रैश कर चुका था. इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था तबाह थी. इस तबाही से शिखर तक अमेरिका पहंचा, रूजवेल्ट के नेतृत्व में. बड़े नेता के लिए बड़ा संकट, बहत बड़ा अवसर भी होता है. भारत में आज संकट है, भ्रष्टाचार का, आतंकवाद का, नेताओं के बढ़ते परिवार मोह का, राजनीति में अपराधियों के आने का, देश में एक दूसरे के प्रति बढ़ते विद्वेष का.. मुसीबतों और चुनौतियों से घिरा है, यह मुल्क? क्या इन चुनावों में एक भी नेता है, जो यह झलक देता हो कि देश उसके नेतृत्व में कोई सपना देख सकता है?

रूजवेल्ट प्रशासन ने जनकल्याण के अनगिनत कदम उठाये. पूंजीवाद के पक्षधर और मुक्त बाजार के भाष्यकार, रूजवेल्ट के खिलाफ़ थे. पर रूजवेल्ट ने सामाजिक सुरक्षा का प्रावधान किया. ट्रेड यूनियन संगठित करने के मजदूरों के अधिकार की रक्षा की. कामकाज का समय निर्धारित किया. वेतन का सुस्पष्ट प्रावधान कराया. साथ ही साथ यह भी सुनिश्चित किया कि अमेरिका ओर्थक रूप से सबसे ताकतवर बने. अमरीकियों का खोया विश्वास इस राजनीतिक व्यवस्था में लौटे.

रूजवेल्ट का ख्वाब था कि दुनिया अमेरिका को एक बेहतर, विश्वसनीय और भरोसेमंद देश माने. अमेरिका, दुनिया में आजादी का गारंटर माना जाये. वह शुरू से नाजियों के खिलाफ़ थे. फ्रांस की पराजय के बाद उन्होंने ब्रिटेन को हरसंभव मदद की. वह नाजियों के खिलाफ़ लड़े. 1941 में रूजवेल्ट ने चार मूल्य (फ़ोर फ्रीडम्स) गढ़े. पहला, अभिव्यक्ति की आजादी (फ्रीडम आफ़ एक्सप्रेशन), दूसरा, इबादत की आजादी (फ्रीडम आफ़ वरशिप), भूख से छुटकारा (फ्रीडम फ्राम वांट), भय से मुक्ति (फ्रीडम फ्राम फ़ीयर). 1941 में रूजवेल्ट चर्चिल से मिले. इस तरह अटलांटिक चार्टर बना, जिसमें राष्ट्रों को अपनी सुरक्षा करने और अस्तित्व की रक्षा का नैसर्गिक अधिकार है, यह कहा गया. इस तरह संयुक्त राष्ट्र संघ को गढ़ने वाले सिद्धांत तय किये गये. 1941 में पर्ल हार्बर पर जापान का हमला हआ. इसके बाद रूजवेल्ट जर्मनी और जापान को पराजित करना जरूरी माना. रूजवेल्ट ने कहा भी, जिन मूल्यों के लिए हम लड़ते हैं, अगर वे मूल्य ही हार जायें, तो युद्ध लड़ना और जीतना निर्थक है. इस तरह रूजवेल्ट ने न सिर्फ़ संयुक्त राष्ट्र की नींव डाली, बल्कि पूर्वी यूरोप में स्टालिन की लगभग सभी शर्ते मानी. इसके कारण उनकी कटु आलोचना हई. पर रूजवेल्ट नहीं चाहते थे कि फ़िर कोई दूसरा युद्ध दुनिया में हो. रूजवेल्ट का विश्वास था कि लुटेरों से, पैसेवालों से, ताकतवर लोगों से, कमजोर लोगों की रक्षा ही धर्म है. हालांकि उनकी परवरिश और पैदाइश एक संपन्न परिवार में थी. पर उन्हें जीवन में एक अत्यंत प्रेरक हेडमास्टर मिला, जिसने उनके अंदर सामाजिक दायित्व का गहरा बोध कराया. उनकी पत्नी भी एक संपन्न परिवार से थी. पर प्रगतिशील सामाजिक आदशाब के प्रति प्रतिबद्ध. वंचितों के लिए वह लगातार लड़ती रहीं. 1962 में अपनी मृत्यु तक.

रूजवेल्ट का लोगों से संवाद अद्भत था. इस लोकसंपर्क में वह जीनियस माने गये. अपने घर में आग तापते हए जब वह रेडियो पर अपनी नीतियां या प्राथमिकताएं बताते थे, तब लाखों-करोड़ों अमेरिकी सांस थामें उनकी बातें सुनते थे. जनता को भरोसा था कि यह आदमी झूठ नहीं बोलेगा. छलेगा नहीं. रूजवेल्ट के शब्दों में जादू था. अत्यंत कठिन दिनों में रूजवेल्ट ने अमरीकियों से कहा, हमें नहीं डरना है, बल्कि डर को ही डरना है.

दूसरे विश्वयुद्ध को खत्म कराने के बाद फ़रवरी 1945 में दुनिया के तीन बड़े नेता मिले. माल्टा में. रूजवेल्ट, चर्चिल और स्टालिन. रूजवेल्ट प्रेस से मिले ह्वीलचेयर पर बैठकर. उनका यह रूप अप्रत्याशित था. पर उन्होंने कहा कि इस तरह चेयर पर बैठकर आना ज्यादा अच्छा है बजाय अपने पैरों में दस पौंड स्टील बांध कर खड़ा होकर आने से. पहली बार उन्होंने सार्वजनिक रूप से बताया कि पोलियो के कारण उनके पैर लकवाग्रस्त हो चुके हैं. 39 वर्ष की उम्र में ही. पर उन्होंने इसे छुपाया. पैरों में विभिन्न उपकरण लगाकर, इस अपंगता के खिलाफ़ वह लड़े. बिस्तर पर ही सीमित कर देनेवाला यह रोग, रूजवेल्ट के मनोबल और दृढ़ता को छू तक नहीं पाया. इस व्यक्ति ने अपने समय की सबसे गंभीर चुनौतियां ङोलीं. देश में-विदेश में. 1945 में अचानक उनकी मौत हई. 12 वर्ष के अपने शासनकाल में पोलियो और लकवा से पीड़ित इस इंसान ने अमेरिका को दुनिया में ओर्थक सुपरपावर बनाया. अपने साहस, आस्था और परिश्रम से अमेरिका को महाशक्ति बना दिया. दरअसल नेता वही है, जो धारा बदल दे, देश बदल दे, समाज बदल दे. दुर्भाग्य है कि भारत आज 15वीं लोकसभा का चयन कर रहा है , पर 111 करोड़ की आबादी में एक चेहरा नहीं, जो देश को दुनिया में सर्वÞोष्ठ बनाने का भरोसा दिला सके.


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