कुछ बातें जो संभ्रात इतिहास में दर्ज नहीं की जा सकेंगी

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सोलह की उम्र में दुनिया की सैर

ऑस्ट्रेलिया की एक स्कूली छात्रा रविवार को अकेले ही नाव से दुनिया का चक्कर लगाने निकल पड़ी। 16 साल की जेसिका वाटसन यह कारनामा करने वाली सबसे युवा व्यक्ति होंगी।

भारतीय समयानुसार सुबह के साढ़े तीन बजे अपने प्रशंसकों और शुभचितंकों की शुभकामनाएँ लिए सिडनी के बंदरगाह से जेसिका चमकते गुलाबी रंग की नाव से इस कठिन सफर पर निकल पड़ीं।

पिछले महीने इस अभियान के लिए अभ्यास करते समय उसकी नाव 63 हजार टन के एक कार्गो जहाज से टकरा गई थी। इस दुर्घटना के बाद क्वींसलैंड प्रांत के अधिकारियों ने उनसे अपने इस अभियान के बारे में दोबारा सोचने का आग्रह किया था।

...लेकिन बुलंद हौसलों वाली और धुन की पक्की जेसिका इसके लिए राजी नहीं हुईं। उनका कहना है कि इस अभियान का सपना उन्होंने 11 साल की उम्र से ही देखना शुरू कर दिया था। आठ महीने के इस अभियान में रात में वे केवल 20 मिनट ही सोएँगी।

जेसिका ने कहा कुछ लोग हैं, जिनके मन में संदेह है और जो इस बड़े, कठिन और दुस्साध्य अभियान को देखते हुए जायज भी है, लेकिन मेरा आत्मविश्वास मेरे साथ है।

ऑस्ट्रेलिया की उपप्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड ने जेसिका को सफल अभियान के लिए शुभकामना दी, लेकिन यह भी कहा कि वह और बहुत से ऑस्ट्रेलियाई नागरिक उस किशोरी को लेकर चिंतित हैं।

'मिस रिवोल्यूशन' की क्रांतिकारी दुनिया

17 साल की युलिया खुद को 'मिस रिवोल्यूशन' कहती है। दरअसल यही नाम उसकी सोच और काम को सही तरीके से पेश करता है। वह विश्वभर के नेताओं और बड़ी हस्तियों की कमियाँ तलाशती है और फिर उन्हें स्केच या कार्टून में पेश करती है।

इतना ही नहीं, युलिया अपने बनाए कार्टून उन लोगों को भेजती भी है, जिन्हें ध्यान रखकर उन्हें बनाया गया है। साथ ही वह एक चिट्ठी भी भेजती है। जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल ने तो युलिया की चिट्ठी का जवाब भी दिया और शुक्रिया भी कहा।

भड़ास निकालनी है : युलिया का कहना है कि उसके अंदर जो भी भड़ास है, उसे निकालने के लिए वह दुनिया भर में हो रही घटनाओं या बड़ी हस्तियों की खामियों को एक कार्टून में व्यक्त करती है। साथ ही उत्तेजक पत्र भी लिखती है। अब वह चाहे अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा हो, जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल हो, रूसी प्रधानमंत्री व्लादिमीर पुतिन हो या फिर जर्मनी की टॉप मॉडल हाइडी क्लुंग।

युलिया कहती है, 'सबसे पहले तो मैं कार्टून इसलिए बनाती हूँ, क्योंकि मैं स्वयं को व्यक्त करना चाहती हूँ। मैं एक ऐसी लड़की हूँ जो शायद खुद से या दूसरों से अच्छी तरह बात नहीं कर सकती। इसलिए मुझे लगता है कि एक कार्टून या पेंटिंग शब्दों की तुलना में काफी ज्यादा बयान कर सकती है। दूसरी बात यह कि अपने कार्टूनों के साथ मैं आलोचना भी करना चाहती हूँ। मुझे पता है कि उन लोगों में कुछ बदलाव आने वाला नहीं है, लेकिन शायद वे मेरे कार्टूनों को देखकर कभी सोच-विचार करें और मुझे जवाब दें।'

ऐसा ही जवाब जर्मनी की चांसलर अंगेला मैर्केल ने युलिया को दिया। युलिया ने मैर्केल का कार्टून चे ग्वारा वाले अंदाज में बनाया था। शायद क्यूबा के क्रांतिकारी नेता का लुक मैर्केल को देकर युलिया यह कहना चाहती थी कि जर्मनी में सुधार की जरूरत है, जिससे जर्मनी की सरकार की अब तक हिचकिचाती थी।

सब पर तिरछी नजर : युलिया ने राष्ट्रपति बराक ओबामा को भी उनका एक कार्टून बनाकर भेजा है। ओबामा के बारे में वह कहती है, 'ओबामा को लेकर जो हायतौबा मची है, वह मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है। मुझे भयानक बात यह लगती है कि उनके अश्वेत राष्ट्रपति होने को बड़े सकारात्मक तरीके से पेश किया जा रहा है। आजकल की दुनिया में इस बात की कोई अहमियत ही नहीं होनी चाहिए कि कोई गोरा है या काला। ओबामा को कीचड़ में डूबते हुए दिखाने से मेरा मतलब यह था कि बुश के दौर में इतनी गड़बड़ियाँ हुई हैं कि चाहे जितना भी बढ़िया राष्ट्रपति हो, उसके लिए इनसे पीछा छुड़ाना मुश्किल है।

इसके अलावा 11वीं कक्षा में पढ़ने वाली युलिया ने मॉडलिंग की दुनिया में पतले होने की धुन पर एक कार्टून बनाया। इसमें जर्मनी की टॉप मॉडल हाइडी क्लुंग और उनके गायक पति सील को दिखाया गया है और साथ में मैक डॉनल्ड्स का एक बैनर भी दिख रहा है। मिस रिवोल्यूशन का कहना है कि हाईडी क्लुंग जो कहती हैं, वह करती नहीं है। वह खुद तो पतला बने रहना चाहती हैं, लेकिन बरसों से फास्ट फूड ब्रैंड मैक डॉनल्ड्स के लिए विज्ञापन कर रही हैं।

करना है बहुत कुछ : जर्मन शहर कोलोन में रहने वाली युलिया में कई और भी प्रतिभाएँ हैं। जैसे उसे फोटोग्राफी करना बहुत अच्छा लगता है। अपने खुद के कपड़े डिजाइन करने का भी उसे शौक है। पियानो बजाना और पेंटिंग करना भी उसे बहुत भाता है। एक साल से युलिया मिस रिवोल्यूशन बनी हुई है और अपने पिता की मदद से अपनी खुद की वेबसाइट भी चला रही है।

उसके पिता कहते हैं, 'मैं और मेरी पत्नी कोशिश कर रहे है कि हम युलिया का भरपूर साथ दें। और जितना हो सके, उसके लिए करें। इसलिए मैंने उसके लिए वेबसाइट बनाई है। युलिया मुझे बताती है कि वह कैसी वेबसाइट चाहती है, लेकिन कई बार ना-नुकर भी करती है, क्योंकि कुछ चीजें उसे पसंद नहीं आती। खासकर एक कलाकार के लिए वेबसाइट बनाना बहुत मुश्किल काम है।'

खैर, अपनी कामयाबी से मिस रिवोल्यूशन खुश है और अब वह कई और काम भी करना चाहती है। मसलन वह जूतों और सन ग्लास का एक कलेक्शन तैयार कर रही है। अपने कार्टून और पेटिंगों से युलिया ने अब तक कोई पैसा नहीं कमाया है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी इच्छा है कि स्कूल की पढ़ाई खत्म करने के बाद वह आगे कला की पढ़ाई करे। वह एक दिन किसी फिल्म के लिए संगीत तैयार करके भी पैसा कमाना चाहती है।फ़ॉन्ट का आकार
युलिया के कार्टूनों की एक प्रदर्शनी पिछले दिनों उसी के स्कूल में लगी। बेशक युलिया छोटी-सी उम्र में बड़ा काम कर रही है और इसके लिए उसे सराहना भी खूब मिलती हैं, लेकिन कभी-कभी उसके पिता ही अपनी बेटी के बनाए कार्टूनों से हक्के-बक्के रह जाते हैं।

उसके पिता का कहना है, 'हमें एक कार्टून बिल्कुल अच्छा नहीं लगा जिसमें पोप बेनेडिक्ट 16वें को दिखाया गया था। फिर भी उसने यह कार्टून बनाया है। खैर, कोई इस उम्र में इतने स्पष्ट अंदाज में अपने विचार बताए और वह भी हंसी मजाक वाले अंदाज में, यह बड़ी बात है। हिम्मत का काम है। शायद जब मैं इस उम्र में था, तो मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी।'

वैसे युलिया का सबसे पसंदीदा कार्टून पोप बेनेडिक्ट वाला ही है। इसमें पोप को बहुत ही काला और एक काले मुखौटे के साथ दिखाया गया है।.........

भूखे हैं बच्चे मेरे गाँव के

हमर पापा के कई दिन से काम न मिलल हे। आऊघर में खाए ला कुछोन हे। त भूखे पेट न रहल जा। ई फेदवा [ताड़ का फल] गिरल मिलल हे, त खाईत हिई।' ये करुणा भरी आवाजें सुखाड़ से तस्त्र गया जिले के कोंच प्रखंड के बिझहरा के गरीब बच्चे ओम प्रकाश [5], चन्द्रमुनी कुमारी [12], कलावती कुमारी [10], पिंकी कुमार [14], नीतू कुमारी [9] की हैं।

खेतों में काम नहीं मिलने के कारण इन गरीबों के घर में दो जून की रोटी के लाले पड़ने लगे है। बच्चे गांव के बगीचे में ताड़ के पेड़ के नीचे बैठे फेदा गिरने के इंतजार में दिनभर बिता देते हैं। ताड़ से एक फेदा गिरते ही उसे लेने के लिए नंगे बदन गरीब बच्चों के बीच अपाधापी मचती है। काम के अभाव में गांव के आधा से अधिक गरीब मजदूर दूसरे शहर को पलायन कर गए हैं। जो गांव में रह गए हैं, उनके बच्चे दूसरे का जानवर चरा कर किसी तरह अपना पेट पाल रहे है। जबकि कई बच्चे तो सिर्फ फेदा खा कर दिन काटते है। फेदा खाते बच्चों से पूछा तो उन्होंने बताया कि घर में राशन नहीं है। कई दिनों से चूल्हा नहीं जला।

बच्चों ने कहा- पानी न पड़े से 'बाबू के काम न मिलइत हई। बच्चों की आखों में 'भूख' की पीड़ा स्पष्ट दिखाई दे रही थी। बच्चों ने बताया कि स्कूल जाते थे। लेकिन अब जाना बंद कर दिया है। विद्यालय में तो दोपहर का भोजन मिल जाता है। लेकिन सुबह और शाम का भोजन कहां से मिलेगा।

गांव के संपन्न लोगों की भैंस और गाय दिनभर चराने पर सुबह और शाम के भोजन का जुगाड़ होता है। बच्चों ने कहा- घूमते-घूमते एक-दो गो रोज फेदा मिल जा हे। जेकरा खा के रात में घर चल जा हिअई।

गौरतलब है कि सूबे की सरकार गरीबों के उत्थान के लिए कई योजनाएं चला रही है। वहीं प्रशासनिक उपेक्षा के कारण इन योजनाओं के लाभ से गांव के मजदूर वंचित हैं। गांव पहुंची जागरण टीम ने बिझहरा के लोगों को गरीबी और अन्य कई परेशानियों से जूझते देखा। लोगों के पीले और मुरझाए चेहरे।

बताते हैं कि रोजगार नहीं मिलने के अभाव में भूख से जूझने को विवश हैं। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि पूरे गांव में लोगों को दो वक्त की रोटी के लिए क्या-क्या जतन नहीं करना पड़ता।

बिझहरा के मजदूरों के घरों पर सावन और भादो में प्रतिदिन किसानों का तांता लगा रहता था। इस बार सूखे की स्थिति में किसानों के समक्ष स्वयं के खाद्यान्न का संकट खड़ा हो गया है। सावन के महीने में भी एक बूंद पानी नहीं बरसा। धान के बिचडे़ खेतों में ही पूरी तरह नष्ट हो गए। जिसके कारण एक दिन भी किसान काम देने के लिए घर पर बुलाने नहीं आए। जबकि इस ओर अभी तक जनप्रतिनिधियों या पदाधिकारियों का आगमन नहीं हुआ है, ताकि देख कर महसूस कर सकें कि बारिश न होने पर गरीबों के घरों में चूल्हा जल भी रहा है या नहीं।



१०० रूपये की नवाबी

नवाबों की सल्तनत भले ही खत्म हो गई हों लेकिन उनकी नवाबी आज भी कायम है। भले ही उनके पास शाही महल और खजाना न हो लेकिन भत्ते के रूप में मिल रहे चंद रुपए ही उनकी नवाबी ठाठ को बताने के लिए काफी हैं। अब राजस्थान की मुस्लिम रियासत को ही देख लीजिए। सिर्फ सौ रुपए का मासिक भत्ता तय हुआ है लेकिन खुशी अपार क्योंकि यह उन्हें पुरानी आन-बान-शान की याद दिलाता है।

राजस्थान में मुस्लमान रियासत रहे टॉक के पूर्व नवाब के वारिसों के लिए भत्ते की रकम छोटी हो या बड़ी इसका कोई मोल नहीं है। लेकिन इन वारिसों ने इस रकम में बढ़ोत्तरी के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी है। अब इन नवाबी खानदान के 570 वारिसों में से किसी को भी हर महीने कम से कम सौ रुपए मिलेंगे। टॉक की अंजुमन सोसाइटी खानदान ए अमीरिया के पूर्व सचिव अस्मत अली खान कहते हैं कि ये राशि छोटी हो सकती है लेकिन इसमें समाहित सम्मान बहुत बड़ा है।

इस काूननी जंग का फैसला 13 साल बाद इनके हक में आया है। अब इन्हें बीस साल का बकाया भी मिलेगा। टॉक के जिला प्रशासन ने हिसाब लगाकर बताया कि ये राशि एक करोड़ सोलह लाख नब्बे हजार रुपए तक जा पहुंची है।

एक अनुमान के अनुसार खानदानी भत्तों की यह राशि ब्रिटिश राज के दौरान 1944 में शुरू हुई थी। यह उन रियासतों में शुरू की गई थी जिनके हुक्मरानों के शासन चलाने के अधिकार अंग्रेजों ने छीन लिए थे। तब से ही यह भत्ता मिलता जा रहा है। राज्य के फाइनेंस डिपार्टमेंट ने 1979 में भत्ते की राशि दो रुपए से बढ़ाकर 40 रुपए कर दी थी। बाद में 1987 के दौरान स्टेट गवर्नमेंट ने इसे फिर से घटा दिया था। गवर्नमेंट का यह फैसला अंजुमन को बुरा लगा और उन्होंने इसके खिलाफ हाईकोर्ट में केस दायर कर दिया। कोर्ट ने 2006 में भत्ते की राशि बढ़ाकर कम से कम सौ रुपए कर दी। स्टेट गवर्नमेंट को यह बात गंवारा न हुई और वह इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गई। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस अपील को खारिज कर दिया।

इस पूरे मामले में कानूनी लड़ाई लड़ने वाले अंजुमन के पूर्व सचिव अस्मत अली खान कहते हैं कि इस छोटी सी रकम में इतिहास की यादें समाई हैं। मुट्ठी में जब यह भत्ते की राशि आती है तो लगता है जैसे गुजरे जमाने का गौरव सजीव हो गया हो। वैसे अस्मत अली खान को अब तक महज 13 रुपए 64 पैसे ही भत्ते के रूप में हर माह मिलते थे। उनका कहना है कि अब बढ़ी हुई रकम हमे ईद के त्योहार से पहले मिलने का मौका मिला ह। इसलिए हमारी खुशियां दोगुनी हो गई हैं।

इन्हीं वारिसों में से एक मोहम्मद रफीक कहते हैं कि यूं तो हम नवाबी खानदान के वारिस है लेकिन बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं। उनके लिए बकाया रकम मिलना एक बड़ा सहारा होगा। वह कहते हैं कि ये एक इज्जत से जुड़ा मुद्दा है। वे हमें खानदानी आन-बान-शान की याद दिलाता है। राजस्थान में आजादी से पहले रियासतें तो बहुत थी मगर टॉक राजस्थान में अकेली मुस्लिम रियासत थी। टॉक 1815 से 1947 तक अपनी रियासत की राजधानी रहा है। इसे 1817 में एक मुसलमान शासक ने स्थापित किया था। अब इन पूर्व नवाबी खानदान के वारिसों को जब ये राशि मिलती है तो इसके आइने में वे अपने अतीत की झलक दिखती है

पीर भी तू मुरशद भी तू प्रेमी भी पति भी

- हफीज चाचड़ (कराची से)
पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने किन्नरों को मुफ्त शिक्षा और चिकित्सा की सुविधाएँ प्रदान करने के आदेश दिए हैं। मुख्य न्यायधीश ने मंगलवार को किन्नरों से संबंधी एक याचिका पर फैसला सुनाते हुए चारों प्रांतों और इस्लामाबाद प्रशासन को यह आदेश दिए।

उन्होंने पुलिस को भी आदेश दिया कि वह किन्नरों का शोषण न करें और उन के खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज न करें। जस्टिस इफ्तिखार ने पुलिस को यह भी आदेश दिया कि यदि किन्नरों के खिलाफ कोई मुक्कदमा दर्ज किया जाए तो उसकी सूचना सुप्रीम कोर्ट जरूर दी जाए।

मुख्य न्यायधीश ने कहा कि किन्नरों के खिलाफ इस तरह की कोई भी कार्रवाई समाजिक कल्याण विभाग और किन्नरों की संस्था के प्रतिनिधि की मौजूदगी में हो।

उन्होंने चारों प्रांतों के गृह सचिवों को आदेश दिया कि वह किन्नरों के लिए जिला और तालुका के स्तर पर प्रतिनिधि नियुक्त करें जो किन्नरों के साथ संपर्क रखे और उनकी समस्याएँ हल करने में मदद करे।

मुख्य न्यायधीश ने शिक्षा सचिव को आदेश दिया कि किन्नरों को शिक्षा के अवसर प्रदान किए जाएँ ताकि वे समाज में अपने लिए एक बहतर स्थान प्रदान कर सकें।

उन्होंने स्वास्थ्य विभाग के सचिव को भी आदेश दिए कि किन्नरों को चिकित्सा की सुविधाएँ प्रदान की जाएँ और उन के मेडिकल टेस्टस भी किए जाए।

उन्होंने चारों प्रांतों को किन्नरों के पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी करने के आदेश दिए और कहा कि इस प्रक्रिया को दो महीनों के भीतर पूरा किया जाए।

अदालत में तीनों प्रांतों ने अब तक की रिपोर्ट पेश की। रिपोर्टों के अनुसार पंजाब प्रांत में 2167 किन्नरों को पंजीकृत किया गया है, पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत में 324 और बलूचिस्तान के 14 जिलों में 56 किन्नर का पंजीकरण हुआ है। सिंध प्रांत ने किन्नरों के पंजीकरण की रिपोर्ट अदालत में पेश नहीं की





लिव इन रिलेशन और समलैंगिकता को लेकर छिड़ी बहस के बीच मथुरा के सदर क्षेत्र के एक युवक ने एक किन्नर से विवाह कर लिया। 19 बरस के बंटी उर्फ अनीस ने मंगलवार रात बदायूँ के मौलवी मोहल्ले में जन्में किन्नर सपना उर्फ नाजनीन के साथ विवाह कर लिया। स्त्रियोचित गुणों वाली नाजनीन 18 वर्ष की हैं और पिछले एक वर्ष से मथुरा में रह रही हैं।

कल रात इंद्रलोक मोहल्ले में सादे समारोह में काजी बशीरूद्दीन ने काजल किन्नर के घर में अनीस और नाजनीन के निकाह की रस्में पूरी की। निकाहनामे पर दूल्हा-दुल्हन की अंगूठा निशानी ली गई और गवाहों के नाम भी बाकायदा दर्ज किए गए



किन्नर आपस में भाई, बहन और दोस्ताना संबंध तो बना लेते हैं लेकिन पति पत्नी के रूप में उनका रिश्ता नहीं बन सकता है। इसलिए वे गुरु को ही अपना पति मानते हैं।

भोपाल के मंगलवारा क्षेत्र की किन्नर नंदिनी तिवारी ने चर्चा में एक सवाल के जवाब में यह बात कही। उसने कहा कि लोग समझते हैं कि किन्नर भी समलैंगिकों की तरह जोड़े के रूप में आपसी संबंध बनाते हैं लेकिन हमारे बीच ऐसा कोई संबंध नहीं होता है।

हालाँकि किन्नर समाज में भी पुरुष और स्त्री किन्नर का वर्गीकरण होता है। नंदिनी बताती है कि हम अपने गुरु को ही पति मानते हैं। कई किन्नर इसीलिए माँग में सिंदूर भी भरते हैं और माथे पर बिंदी लगाते हैं।

सुहाग के प्रतीक के रूप में पैरों में बिछिया और पायल भी पहनी जाती है। यानी पूरा सुहागिन वाला रूप धारण किया जाता है।

किन्नर नंदिनी कहती है कि जिस तरह गोपियाँ भगवान कृष्ण को अपना पति मानती थीं उसी तरह किन्नर गुरु को यह दर्जा देते हैं।

उत्सव विशेष पर पति गुरु की पूजा भी होती है और नाच गाकर उन्हें प्रसन्न किया जाता है। इतना ही नहीं गुरु के निधन पर किन्नर किसी विधवा स्त्री की तरह कुछ दिन तक श्वेत साड़ी पहनकर शोक भी जताते हैं।

नए गुरु की नियुक्ति पर उसे पति परमेश्वर का दर्जा दिया जाता है। मूल रूप से वाराणसी की रहने वाली किन्नर नंदिनी ने बताया कि होश संभालने के बाद जब उसे इस बात का एहसास हुआ कि प्रकृति ने उसे क्या रूप दिया है तो वह बहुत दुखी हुई।

जब सात आठ साल की थी तब माता पिता को मजबूर होकर उसे किन्नर समुदाय को सौंपना पड़ा। पिछले करीब तीन दशकों से वह भोपाल के किन्नर समुदाय की सदस्य है।

बचपन की स्मृतियों में जाते हुए नंदिनी की आँखों में आँसू आ जाते हैं। उसका कहना है कि माता-पिता और भाई बहनों की बहुत याद आती है। उनसे मिलने को मन व्याकुल रहता है लेकिन एक बार घर छूटा तो फिर छूट ही गया।


दीपावली और होली जैसे त्यौहारों पर घर के सदस्यों से फोन पर जरूर बात हो जाती है।
सजल आँखों से नंदिनी कहती है कि कुछ महीने पहले पिता का निधन हो गया और यह खबर मिलने पर मन वहाँ जाने के लिए बहुत तड़पा लेकिन जाना संभव नहीं था।

अगर वह जाती तो उसके परिवार का रिश्तेदारों के सामने मजाक बनता। लरजती आवाज में वह कहती है कि पिता अपने जीते जी साल में एक बार भोपाल आते थे और उसे साड़ी भेंट कर दुखी मन से वापस लौट जाते थे लेकिन अब यह सिलसिला भी खत्म हो गया।

उसका कहना था कि किन्नर के विधायक बनने से आस जगी थी लेकिन अब वह भी टूट गई देश की प्रथम किन्नर विधायक के रूप में जब शबनम मौसी की जीत हुई तो हम किन्नरों को उम्मीद बँधी की हमारे दिन भी बहुरेंगे लेकिन बहुत जल्द वह सारी खुशी कपूर की तरह काफूर हो गई।

नंदिनी ने कहा कि 1998 के चुनाव में जब शबनम मौसी जीतीं तो हमे लगा कि अब हमारी आवाज भी सरकार तक पहुँचेगी लेकिन बहुत जल्दी हमें समझ आ गया यह सब कुछ सिर्फ दिल बहलाने की बातें हैं।

उसने कहा कि बाद में कई किन्नर गुरुओं ने भी इस बात की आलोचना की और कहा कि सियासत में आना उनका काम नहीं है।

नंदिनी ने कहा कि यह सच भी है और यही वजह है कि शबनम मौसी के बाद अपवादस्वरूप ही किन्नरों ने राजनीति की तरफ रुख किया

दांपत्य जीवन में खुशियां लाने का अमृत

क्या कोई खास पानी पीने मात्र से दांपत्य जीवन सौहाद्र्रपूर्ण हो सकता है. मध्यप्रदेश मे शिवपुरी के निकट स्थित भदैया कुंड के पानी के बारे में कुछ ऐसी ही मान्यता है. मान्यता यह है कि भदैया कुंड जल प्रपात में बने गोमुख से निकलनेवाला पानी पीने से दांपत्य जीवन में खुशियां बढ़ती हैं और आपसी विवाद छूमंतर हो जाते हैं. यहां आनेवाले पर्यटकों में नव दंपत्ति से लेकर दशकों से वैवाहिक जीवन बिता रहे वृद्ध-वृद्धाएं भी शामिल हैं. जहां नवदंपति सुखी दांपत्य जीवन की शुरुआत करने की तमन्ना से यहां आते हैं, वहीं बुजुर्ग दंपत्ति लंबे समय के वैवाहिक जीवन में कभी-कभी होनेवाली छोटी-मोटी खटपट को भी जड़ से उखाड़ फ़ेंकने की इच्छा से भदैया का सहारा लेते हैं. बिना किसी भय के यहां आनेवाले सैलानियों में नवदंपत्ति ज्यादा होते हैं और वे जलप्रपात से जो पानी एक कुंड में गिरता है, उसमें तैरते और नहाते भी हैं. कुंड के पास ही बने एक गौमुख से गिरनेवाले पानी को पीकर अपना दांपत्य जीवन सफ़ल बनाते हैं.ग्वालियर राज्य के समय में यह स्थान राजाओं एवं शाही मेहमानों का भी पसंदीदा स्थल रहा है. उस समय भी यहां नौका विहार करने की व्यवस्था थी तथा सुरक्षा के लिए चौकियां भी बनायी गयीं थीं.







15-10 साल बाद अंतरिक्ष से आयेगी मुसीबत

वैज्ञानिकों ने चेताया है कि मानव सुविधा के लिए भेजे गये उपग्रह एक दिन स्वयं मानव के लिए खतरा बनेंगे। पृथ्वी के बाहरी वातावरण में कार्यशील उपग्रहों तथा मृत हो चुके उपग्रहों के टुकड़ों की भीड़ जमा हो रही है और इससे मानव पर खतरा मंडरा रहा है. हाल ही में आयोजित हए स्पेस डेब्रिज कांग्रेस के पहले अधिवेशन में इस बाबत चिंता व्यक्त की गयी. इस अधिवेशन में दुनिया भर से वैज्ञानिक, सैटेलाइट कंपनी ऑपरेटर तथा अंतरिक्ष विशेषज्ञ आये हए थे. इस समय पृथ्वी के आसपास 110 किलोमीटर से लेकर 36000 किलोमीटर के बीच करीब 19000 बड़े टुकड़े तैर रहे हैं. ये टुकड़े छोटे कील से लेकर बस के आकार जितने बड़े हैं. यही नहीं, एक सेंटीमीटर से लेकर 10 सेंटीमीटर तक बड़े 30000 टुकड़े भी इनमें जोड़ दें, तो अनुमान लगाया जा सकता है कि पृथ्वी के आसपास कितना कचरा जमा हो चुका है. ये टुकड़े आठ से 10 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से उड़ते हैं. यदि इनमें से कुछ टुकड़े छिटक कर पृथ्वी के वातावरण में सकुशल प्रवेश कर जाये, तो धरती पर प्रलय ला सकते हैं. इंसान अब दूर वातावरण में भी उपग्रह भेज रहा है. इस सम्मेलन में आये वैज्ञानिक राम जाखु के अनुसार असली खतरा उन्ही से होगा. लेकिन इसके लिए आपको अभी 15-20 साल तक का इंतजार तो करना ही पड़ेगा.

जहां नीम की दातून है गुनाह

शीतला भवानी की सवारी मानकर वासंतिक नवरात्र में नीम के पेड़ पर जल चढ़ाने व पूजा करने की परंपरा तो बहुत पुरानी है। लेकिन इस पेड़ की लकड़ी का उपयोग न करने को परंपरा को शायद आपने नहीं सुना होगा। रायबरेली जिले में पांच ऐसे गांव हैं, जहां हर मांगलिक कार्य की शुरुआत में नीम का पौध लगाना आवश्यक है, लेकिन पेड़ काटना या लकड़ी का उपयोग तो दूर, दातून तक तोड़ना वर्जित है।
जिला मुख्यालय से करीब 15 किमी दूर फुरसतगंज के निकट सरवन ग्रामसभा के मजरे हैं रामदयाल का पुरवा, पूरे बाबू, पूरे हिंदू, पूरे सधान सिंह और पूरे गनेश। करीब एक सदी से यहां के लोगों ने नीम के वृक्ष को शीतला देवी की सवारी मानकर उसकी पूजा तो बारहों महीने करते हैं, लेकिन उसकी लकड़ी का किसी भी रूप में इस्तेमाल कतई नहीं करते। गांव वालों का दावा है कि अगर कभी किसी ने इस मान्यता को तोड़ने की गुस्ताखी की तो उसे दुष्परिणाम भी भुगतना पड़ा।
नीम के बिरवों से भरे पूरे सरवन गांव में जूनियर हाई स्कूल के प्रधानाध्यापक श्रीराम बुजुर्गो की जुबानी बताते हैं कि वर्ष 1910 के आसपास यहां पूरन गिरि नाम के एक संत रहते थे। उन्होंने घोषित समाधि लेने से पूर्व पूरे गांव के लोगों को बुलाकर अंतिम संदेश दिया था कि हर मांगलिक कार्य की शुरुआत नीम का पौध लगाकर करना तथा लकड़ी के लालच में पेड़ को कभी भूलकर भी नहीं नुकसान पहुंचाना, नहीं तो अहित हो जाएगा।
संत की सीख
संत की इस सीख को गांव वालों ने गांठ बांध ली। करीब एक दशक पूर्व इसी गांव के प्रधान रामकृष्ण ने घर की नींव पर उगे नीम के वृक्ष को कटवा दिया था, इसके बाद ही परिवार में कई लोग बीमार पड़ गये। उन्होंने उसी स्थल पर देवी मंदिर बनवाया और एक महीने कन्या भोज कराया। गांव वाले ऐसे दर्जनों उदाहरण भी बताते हैं कि नीम का पेड़ कटवाने की गलती पर लोगों को अनिष्ट का सामना करना पड़ा।
बशर्ते लकड़ी नीम की न हो
बीते साल की ही बात है राम दयाल पुरवा के मंशाराम यादव की शादी में नीम की लकड़ी का बेड मिला, जिसे उन्होंने दरवाजे से वापस भेज दिया। इस गांव के लोग मेलों में लकड़ी सामान भी खरीदते हैं तो पहली शर्त होती है कि नीम की लकड़ी नही होनी चाहिए। करीब 500 परिवारों की इस ग्रामसभा में एकाधिक नीम के पेड़ तो हर दरवाजे पर हैं, लेकिन धन्नी या अन्य कार्यो की तो बात दूर कोई खूंटा तक नही गाड़ता। यहां साल भर लोग नीम के पेड़ पर जल चढ़ाते हैं। मौका शादी-विवाह का हो या फिर मुंडन, कर्णछेदन का, शुरुआत नीम का वृक्ष लगाकर ही होती है। वासंतिक नवरात्र में तो घर-घर नीम की विशेष पूजा होती है और नीम के ही वृक्ष के नीचे कन्याभोज की परंपरा है।