कुछ बातें जो संभ्रात इतिहास में दर्ज नहीं की जा सकेंगी

जहां नीम की दातून है गुनाह

शीतला भवानी की सवारी मानकर वासंतिक नवरात्र में नीम के पेड़ पर जल चढ़ाने व पूजा करने की परंपरा तो बहुत पुरानी है। लेकिन इस पेड़ की लकड़ी का उपयोग न करने को परंपरा को शायद आपने नहीं सुना होगा। रायबरेली जिले में पांच ऐसे गांव हैं, जहां हर मांगलिक कार्य की शुरुआत में नीम का पौध लगाना आवश्यक है, लेकिन पेड़ काटना या लकड़ी का उपयोग तो दूर, दातून तक तोड़ना वर्जित है।
जिला मुख्यालय से करीब 15 किमी दूर फुरसतगंज के निकट सरवन ग्रामसभा के मजरे हैं रामदयाल का पुरवा, पूरे बाबू, पूरे हिंदू, पूरे सधान सिंह और पूरे गनेश। करीब एक सदी से यहां के लोगों ने नीम के वृक्ष को शीतला देवी की सवारी मानकर उसकी पूजा तो बारहों महीने करते हैं, लेकिन उसकी लकड़ी का किसी भी रूप में इस्तेमाल कतई नहीं करते। गांव वालों का दावा है कि अगर कभी किसी ने इस मान्यता को तोड़ने की गुस्ताखी की तो उसे दुष्परिणाम भी भुगतना पड़ा।
नीम के बिरवों से भरे पूरे सरवन गांव में जूनियर हाई स्कूल के प्रधानाध्यापक श्रीराम बुजुर्गो की जुबानी बताते हैं कि वर्ष 1910 के आसपास यहां पूरन गिरि नाम के एक संत रहते थे। उन्होंने घोषित समाधि लेने से पूर्व पूरे गांव के लोगों को बुलाकर अंतिम संदेश दिया था कि हर मांगलिक कार्य की शुरुआत नीम का पौध लगाकर करना तथा लकड़ी के लालच में पेड़ को कभी भूलकर भी नहीं नुकसान पहुंचाना, नहीं तो अहित हो जाएगा।
संत की सीख
संत की इस सीख को गांव वालों ने गांठ बांध ली। करीब एक दशक पूर्व इसी गांव के प्रधान रामकृष्ण ने घर की नींव पर उगे नीम के वृक्ष को कटवा दिया था, इसके बाद ही परिवार में कई लोग बीमार पड़ गये। उन्होंने उसी स्थल पर देवी मंदिर बनवाया और एक महीने कन्या भोज कराया। गांव वाले ऐसे दर्जनों उदाहरण भी बताते हैं कि नीम का पेड़ कटवाने की गलती पर लोगों को अनिष्ट का सामना करना पड़ा।
बशर्ते लकड़ी नीम की न हो
बीते साल की ही बात है राम दयाल पुरवा के मंशाराम यादव की शादी में नीम की लकड़ी का बेड मिला, जिसे उन्होंने दरवाजे से वापस भेज दिया। इस गांव के लोग मेलों में लकड़ी सामान भी खरीदते हैं तो पहली शर्त होती है कि नीम की लकड़ी नही होनी चाहिए। करीब 500 परिवारों की इस ग्रामसभा में एकाधिक नीम के पेड़ तो हर दरवाजे पर हैं, लेकिन धन्नी या अन्य कार्यो की तो बात दूर कोई खूंटा तक नही गाड़ता। यहां साल भर लोग नीम के पेड़ पर जल चढ़ाते हैं। मौका शादी-विवाह का हो या फिर मुंडन, कर्णछेदन का, शुरुआत नीम का वृक्ष लगाकर ही होती है। वासंतिक नवरात्र में तो घर-घर नीम की विशेष पूजा होती है और नीम के ही वृक्ष के नीचे कन्याभोज की परंपरा है।

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