पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने किन्नरों को मुफ्त शिक्षा और चिकित्सा की सुविधाएँ प्रदान करने के आदेश दिए हैं। मुख्य न्यायधीश ने मंगलवार को किन्नरों से संबंधी एक याचिका पर फैसला सुनाते हुए चारों प्रांतों और इस्लामाबाद प्रशासन को यह आदेश दिए।
मुख्य न्यायधीश ने कहा कि किन्नरों के खिलाफ इस तरह की कोई भी कार्रवाई समाजिक कल्याण विभाग और किन्नरों की संस्था के प्रतिनिधि की मौजूदगी में हो।
उन्होंने चारों प्रांतों के गृह सचिवों को आदेश दिया कि वह किन्नरों के लिए जिला और तालुका के स्तर पर प्रतिनिधि नियुक्त करें जो किन्नरों के साथ संपर्क रखे और उनकी समस्याएँ हल करने में मदद करे।
मुख्य न्यायधीश ने शिक्षा सचिव को आदेश दिया कि किन्नरों को शिक्षा के अवसर प्रदान किए जाएँ ताकि वे समाज में अपने लिए एक बहतर स्थान प्रदान कर सकें।
उन्होंने स्वास्थ्य विभाग के सचिव को भी आदेश दिए कि किन्नरों को चिकित्सा की सुविधाएँ प्रदान की जाएँ और उन के मेडिकल टेस्टस भी किए जाए।
उन्होंने चारों प्रांतों को किन्नरों के पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी करने के आदेश दिए और कहा कि इस प्रक्रिया को दो महीनों के भीतर पूरा किया जाए।
अदालत में तीनों प्रांतों ने अब तक की रिपोर्ट पेश की। रिपोर्टों के अनुसार पंजाब प्रांत में 2167 किन्नरों को पंजीकृत किया गया है, पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत में 324 और बलूचिस्तान के 14 जिलों में 56 किन्नर का पंजीकरण हुआ है। सिंध प्रांत ने किन्नरों के पंजीकरण की रिपोर्ट अदालत में पेश नहीं की
लिव इन रिलेशन और समलैंगिकता को लेकर छिड़ी बहस के बीच मथुरा के सदर क्षेत्र के एक युवक ने एक किन्नर से विवाह कर लिया। 19 बरस के बंटी उर्फ अनीस ने मंगलवार रात बदायूँ के मौलवी मोहल्ले में जन्में किन्नर सपना उर्फ नाजनीन के साथ विवाह कर लिया। स्त्रियोचित गुणों वाली नाजनीन 18 वर्ष की हैं और पिछले एक वर्ष से मथुरा में रह रही हैं।
कल रात इंद्रलोक मोहल्ले में सादे समारोह में काजी बशीरूद्दीन ने काजल किन्नर के घर में अनीस और नाजनीन के निकाह की रस्में पूरी की। निकाहनामे पर दूल्हा-दुल्हन की अंगूठा निशानी ली गई और गवाहों के नाम भी बाकायदा दर्ज किए गए
किन्नर आपस में भाई, बहन और दोस्ताना संबंध तो बना लेते हैं लेकिन पति पत्नी के रूप में उनका रिश्ता नहीं बन सकता है। इसलिए वे गुरु को ही अपना पति मानते हैं।
भोपाल के मंगलवारा क्षेत्र की किन्नर नंदिनी तिवारी ने चर्चा में एक सवाल के जवाब में यह बात कही। उसने कहा कि लोग समझते हैं कि किन्नर भी समलैंगिकों की तरह जोड़े के रूप में आपसी संबंध बनाते हैं लेकिन हमारे बीच ऐसा कोई संबंध नहीं होता है।
हालाँकि किन्नर समाज में भी पुरुष और स्त्री किन्नर का वर्गीकरण होता है। नंदिनी बताती है कि हम अपने गुरु को ही पति मानते हैं। कई किन्नर इसीलिए माँग में सिंदूर भी भरते हैं और माथे पर बिंदी लगाते हैं।
सुहाग के प्रतीक के रूप में पैरों में बिछिया और पायल भी पहनी जाती है। यानी पूरा सुहागिन वाला रूप धारण किया जाता है।
किन्नर नंदिनी कहती है कि जिस तरह गोपियाँ भगवान कृष्ण को अपना पति मानती थीं उसी तरह किन्नर गुरु को यह दर्जा देते हैं।
उत्सव विशेष पर पति गुरु की पूजा भी होती है और नाच गाकर उन्हें प्रसन्न किया जाता है। इतना ही नहीं गुरु के निधन पर किन्नर किसी विधवा स्त्री की तरह कुछ दिन तक श्वेत साड़ी पहनकर शोक भी जताते हैं।
नए गुरु की नियुक्ति पर उसे पति परमेश्वर का दर्जा दिया जाता है। मूल रूप से वाराणसी की रहने वाली किन्नर नंदिनी ने बताया कि होश संभालने के बाद जब उसे इस बात का एहसास हुआ कि प्रकृति ने उसे क्या रूप दिया है तो वह बहुत दुखी हुई।
जब सात आठ साल की थी तब माता पिता को मजबूर होकर उसे किन्नर समुदाय को सौंपना पड़ा। पिछले करीब तीन दशकों से वह भोपाल के किन्नर समुदाय की सदस्य है।
बचपन की स्मृतियों में जाते हुए नंदिनी की आँखों में आँसू आ जाते हैं। उसका कहना है कि माता-पिता और भाई बहनों की बहुत याद आती है। उनसे मिलने को मन व्याकुल रहता है लेकिन एक बार घर छूटा तो फिर छूट ही गया।
दीपावली और होली जैसे त्यौहारों पर घर के सदस्यों से फोन पर जरूर बात हो जाती है।
सजल आँखों से नंदिनी कहती है कि कुछ महीने पहले पिता का निधन हो गया और यह खबर मिलने पर मन वहाँ जाने के लिए बहुत तड़पा लेकिन जाना संभव नहीं था।
अगर वह जाती तो उसके परिवार का रिश्तेदारों के सामने मजाक बनता। लरजती आवाज में वह कहती है कि पिता अपने जीते जी साल में एक बार भोपाल आते थे और उसे साड़ी भेंट कर दुखी मन से वापस लौट जाते थे लेकिन अब यह सिलसिला भी खत्म हो गया।
उसका कहना था कि किन्नर के विधायक बनने से आस जगी थी लेकिन अब वह भी टूट गई देश की प्रथम किन्नर विधायक के रूप में जब शबनम मौसी की जीत हुई तो हम किन्नरों को उम्मीद बँधी की हमारे दिन भी बहुरेंगे लेकिन बहुत जल्द वह सारी खुशी कपूर की तरह काफूर हो गई।
नंदिनी ने कहा कि 1998 के चुनाव में जब शबनम मौसी जीतीं तो हमे लगा कि अब हमारी आवाज भी सरकार तक पहुँचेगी लेकिन बहुत जल्दी हमें समझ आ गया यह सब कुछ सिर्फ दिल बहलाने की बातें हैं।
उसने कहा कि बाद में कई किन्नर गुरुओं ने भी इस बात की आलोचना की और कहा कि सियासत में आना उनका काम नहीं है।
नंदिनी ने कहा कि यह सच भी है और यही वजह है कि शबनम मौसी के बाद अपवादस्वरूप ही किन्नरों ने राजनीति की तरफ रुख किया
कल रात इंद्रलोक मोहल्ले में सादे समारोह में काजी बशीरूद्दीन ने काजल किन्नर के घर में अनीस और नाजनीन के निकाह की रस्में पूरी की। निकाहनामे पर दूल्हा-दुल्हन की अंगूठा निशानी ली गई और गवाहों के नाम भी बाकायदा दर्ज किए गए
किन्नर आपस में भाई, बहन और दोस्ताना संबंध तो बना लेते हैं लेकिन पति पत्नी के रूप में उनका रिश्ता नहीं बन सकता है। इसलिए वे गुरु को ही अपना पति मानते हैं।
भोपाल के मंगलवारा क्षेत्र की किन्नर नंदिनी तिवारी ने चर्चा में एक सवाल के जवाब में यह बात कही। उसने कहा कि लोग समझते हैं कि किन्नर भी समलैंगिकों की तरह जोड़े के रूप में आपसी संबंध बनाते हैं लेकिन हमारे बीच ऐसा कोई संबंध नहीं होता है।
हालाँकि किन्नर समाज में भी पुरुष और स्त्री किन्नर का वर्गीकरण होता है। नंदिनी बताती है कि हम अपने गुरु को ही पति मानते हैं। कई किन्नर इसीलिए माँग में सिंदूर भी भरते हैं और माथे पर बिंदी लगाते हैं।
सुहाग के प्रतीक के रूप में पैरों में बिछिया और पायल भी पहनी जाती है। यानी पूरा सुहागिन वाला रूप धारण किया जाता है।
किन्नर नंदिनी कहती है कि जिस तरह गोपियाँ भगवान कृष्ण को अपना पति मानती थीं उसी तरह किन्नर गुरु को यह दर्जा देते हैं।
उत्सव विशेष पर पति गुरु की पूजा भी होती है और नाच गाकर उन्हें प्रसन्न किया जाता है। इतना ही नहीं गुरु के निधन पर किन्नर किसी विधवा स्त्री की तरह कुछ दिन तक श्वेत साड़ी पहनकर शोक भी जताते हैं।
नए गुरु की नियुक्ति पर उसे पति परमेश्वर का दर्जा दिया जाता है। मूल रूप से वाराणसी की रहने वाली किन्नर नंदिनी ने बताया कि होश संभालने के बाद जब उसे इस बात का एहसास हुआ कि प्रकृति ने उसे क्या रूप दिया है तो वह बहुत दुखी हुई।
जब सात आठ साल की थी तब माता पिता को मजबूर होकर उसे किन्नर समुदाय को सौंपना पड़ा। पिछले करीब तीन दशकों से वह भोपाल के किन्नर समुदाय की सदस्य है।
बचपन की स्मृतियों में जाते हुए नंदिनी की आँखों में आँसू आ जाते हैं। उसका कहना है कि माता-पिता और भाई बहनों की बहुत याद आती है। उनसे मिलने को मन व्याकुल रहता है लेकिन एक बार घर छूटा तो फिर छूट ही गया।
दीपावली और होली जैसे त्यौहारों पर घर के सदस्यों से फोन पर जरूर बात हो जाती है।
सजल आँखों से नंदिनी कहती है कि कुछ महीने पहले पिता का निधन हो गया और यह खबर मिलने पर मन वहाँ जाने के लिए बहुत तड़पा लेकिन जाना संभव नहीं था।
अगर वह जाती तो उसके परिवार का रिश्तेदारों के सामने मजाक बनता। लरजती आवाज में वह कहती है कि पिता अपने जीते जी साल में एक बार भोपाल आते थे और उसे साड़ी भेंट कर दुखी मन से वापस लौट जाते थे लेकिन अब यह सिलसिला भी खत्म हो गया।
उसका कहना था कि किन्नर के विधायक बनने से आस जगी थी लेकिन अब वह भी टूट गई देश की प्रथम किन्नर विधायक के रूप में जब शबनम मौसी की जीत हुई तो हम किन्नरों को उम्मीद बँधी की हमारे दिन भी बहुरेंगे लेकिन बहुत जल्द वह सारी खुशी कपूर की तरह काफूर हो गई।
नंदिनी ने कहा कि 1998 के चुनाव में जब शबनम मौसी जीतीं तो हमे लगा कि अब हमारी आवाज भी सरकार तक पहुँचेगी लेकिन बहुत जल्दी हमें समझ आ गया यह सब कुछ सिर्फ दिल बहलाने की बातें हैं।
उसने कहा कि बाद में कई किन्नर गुरुओं ने भी इस बात की आलोचना की और कहा कि सियासत में आना उनका काम नहीं है।
नंदिनी ने कहा कि यह सच भी है और यही वजह है कि शबनम मौसी के बाद अपवादस्वरूप ही किन्नरों ने राजनीति की तरफ रुख किया
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