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मत हिचको, ओ, शब्दों के जादूगर !

जीवन का बुत बनाना 
काम नहीं है शिल्पकार का 
उसका काम है पत्थर को जीवन देना
मत हिचको, ओ, शब्दों के जादूगर ! 
जो जैसा है, वैसा कह दो 
ताकि वह दिल को छू ले 
आक्रोश भरे गीतों की धुन
वेदना के स्वर में सम्भव नहीं
ख़ून से रंगे हाथों की बातें 
ज़ोर-ज़ोर से चीख़-चीख़ कर 
छाती पीटकर कही जाती हैं 
कह दो वह बात जिससे धड़के 
सब का दिल 
सुगंधों से भी जब ख़ून टपक रहा हो 
छिपाया नहीं जा सकता 
उसे शब्दों की ओट में ।

तेरे लिए लिखा करता हूँ


मैंने तो गढ़ा
एक नया जन्म
एक नई पुकार
और-
सच मानो,
खुद एक_मैं_फकत मैं/

तुम्हारे लिए
फिर से
भटका खयालों में
तड़फा विचारों में- और
ढूँढा तुम्हें उसी शहर में
जहाँ छोड़ चली थी तुम
अपनी साँसे, कुछ यादें
और- सच मानो
मेरी बेवफाई भी।

तुम्हारे लिए
मरा था मैं,
जन्मा था मैं
लेकिन,
तुम जब मिली तो
सच मानो,
इस बार तुमने
की बेवफाई...।

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तुम चाहे
कभी न आओ लौटकर
मेरे द्वार तक
लेकिन मुझमें
तुम्हारा इंतजार हमेशा बना रहने देना
क्यों‍कि जब किसी अनजानी आहट से
मैं द्वार तक दौड़कर जाता हूँ
मेरे आँगन के पंछियों को लगता है
मैं उनके लिए दाने लेकर आया हूँ
मेरे आँगन के पंछियों के लिए ही सही
पर मुझमें यह इंतजार बना रहने देना
क्योंकि पंछियों के मूक
आशीर्वाद की जरूरत मुझे है
तुम्हें नहीं

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जब पास तुम्हारे होता हूँ, सब कुछ भूलकर खो जाता हूँ तुममें,
चन्द लम्हों में सिमट जाता है जीवन सारा,
तुम्हारी मुस्कुराहट से महकती है हर साँस मेरी,
तुम्हारी आँखों की गहराई में झाँक लेता हूँ
और चुरा लेता हूँ थोड़ा सा काजल,
एक हलचल सी मच जाती है जब हौले से पास आकर
तुम समा जाती हो मेरे ज़ेहन में.......
एहसास बन रोम रोम में उतर जाती हो,

जब तुम नहीं होती तब भी तुम होती हो आस पास,
तुम्हारी वही खुशबू जो मेरी साँसों में बसी है,
तुम्हारी आँखों का काजल, तुम्हारी कोमल हँसी....
भीगे हुए बालों की छुअन, तुम्हारे कदमों की आहट,
तुम्हारी खामोश निगाहें, उठकर झुक जाती पलकें,
एक उम्मीद, एक बेकरारी और फिर मिलने का इंतज़ार.......

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तू है मेरी ताकत
तू है मेरा विश्वास
तूने जगाई मुझमें
जीने की नई आस
जीवन की कठिन डगर
और तेरा साथ
नहीं लगता डर मुझे
जब तू है मेरा हमराज
फिसलन में भी नहीं
लगता अब
गिरने का डर
थामा है तूने जो हाथ
डर ने छोड़ दिया है साथ
अब मुश्किलों से लड़ने को
जी चाहता है
अब कुछ कर गुजरने को
जी चाहता है।

तेरी हर हिदायत
करती है मुझे हर
खतरे से आगाह
तेरी हर डाँट-फटकार
भरती है मुझमें आत्मविश्वास
चलता हूँ अकेला
पर साथ है तू
हौसलों में ऊर्जा भरता
विश्वास होता है तू

दोस्त जीतूँगा हर बाजी
गर साथ होगा तू
छा जाएँगे दुनिया पर
गर हौंसला बनेगा तू
अब नहीं दुनिया से डर
अब किसी की नहीं फिक्र
छू लेंगे हम आसमाँ
हमारी मुट्ठी में होगा जहां।
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आज मंदिर में एक दीया
जलाया है तेरे लिए

भावनाओं के पुष्प को
प्रेम के धागे में

पिरोया है तेरे लिए
आज मंदिर में ...

जिंदगी का क्या भरोसा
ये साथ बन जाए न धोखा
खुशियों के कोमल गुलाब को
बैर रूपी धतूरे पर
सजाया है तेरे लिए
आज मंदिर में ...

रिश्तों में सदा बनी रहे ऊर्जा
तुझ जैसा कोई है न दूजा
श्रद्धा की बाती को
विश्वास के दीये में
आज सजाया है तेरे लिए
आज मंदिर में ...

कहीं तो मिलेंगे किसी मोड़ पर
अजनबी ही सही कोई बात नहीं
तू रहे सदा दिल के किसी कोने में
इन यादों की स्मृति कुमकुम
आज मंदिर में ...
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हर सुबह, हर शाम
जब खोलता हूँ आँखे
तो तू ही नजर आती है

शरमाकर चुपचाप
मेरे आगोश में छुप जाती है।

तुझे धूप कहूँ या छाँव
तुझे गीत कहूँ या राग

छुईमुई सी है तू
जो छूते ही सिमट जाती है
हर रात सपनों में
तू मेरी बनकर आती है।

जब देखता हूँ आइने में
तो तेरी ही सूरत
हर लड़की में दिखती है मुझे
तेरी ही मूरत
तू जादू है या हकीकत
कुछ समझ नहीं आता है
हर रात मुझे नींद से
कोई आकर जगाता है।
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ऐसा लगता है
दिल की दुनिया
उजड़ रही है।
जिसे बसाया था
किसी ने मेरे ख्वाबों में
अचानक आकर
मेरे मन के मंदिर में
दी थी किसी ने दस्तक
वो सिर्फ एहसास ही
नहीं सचमुच दिल
की लगी थी
जिसे झुठलाना
या ठुकराना मुमकिन ही
नहीं था।
दिल की दुनिया में बसे
ऐ मेरे हमसफर
कुछ तो वफ़ा कर
अपने प्यारे मीत के साथ।
किसी के दिल की लगी को
इस तरह ना ठुकराओ
कि वह ना ही जी पाए
और ना ही मर पाए।
यह बहुत बड़ी
लगी है दिल की
जिसको समय ने एक
मजाक बनाकर पेश किया है।
ऐ दोस्त ! क्या करें
क्या न करें
यही कशमकश में उलझा हूँ।
ना जी पा रहा हूँ
और ना ही मर पा रहा हूँ,
ऐ मेरे प्यार
कुछ तो इंसाफ कर
मेरे उस प्यार के साथ
जो मैंने तुमसे किया है।
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जाने क्या होता है ?




सोचता हूँ
जिन लम्हों को
हमने एक दूसरे के नाम किया है
शायद वही जिंदगी थी।

भले ही वो ख्‍यालों में हो
या फिर अनजान ख्‍वाबों में
या यूँ ही कभी बातें करते हुए
या फिर अपने अपने अक्स को
एक दूजे में देखते हुए हो

पर कुछ पल जो तूने मेरे नाम किए थे
उनके लिए मैं तेरा शुक्रगुजार हूँ ।।

उन्हीं लम्हों को
मैं अपने वीरान सीने में रख
मैं
तुझसे,
अलविदा कहता हूँ।।।
अलविदा ।।
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आज का यह दिन
तुम्हें दे दिया मैंने
आज दिनभर तुम्हारे ही ख्‍यालों का लगा मेला
मन किसी मासूम-बच्चे सा फिरा भटका अकेला
आज भी तुम पर
भरोसा किया मैंने।
आज मेरी पोथियों में शब्द बनकर तुम्हीं दिखे
चेतना में उग रहे हैं अर्थ कितने मधुर-तीखे
आज अपनी ज़िंदगी को
जिया मैंने।
आज सारे दिन बिना मौसम घनी बदली रही है
सहन-आँगन में उमस की, प्यास की धारा बही है
सुबह उठकर नाम जो
ले लिया मैंने
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सिर्फ दो प्रश्न हैं मेरे जीवन में
एक तुम, दूसरा तुमसे जुड़ा हुआ
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भीगी चाँदनी में
ओस की
हर बूँद
तुम्हारी याद लगती है
जिसे छुआ नहीं जा सकता
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रात्रि में,
प्रश्नाकुल मन,
बहुत उदास,
कहता है मुझसे,
उठो, चाँद से बातें करो
और मैं,
बहने लगता हूँ
श्वेत चाँदनी में, तब,
तुम बहुत याद आते हो।
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जाने क्या होता इन
प्यार भरी बातों में
रिश्ते बन जाते हैं
चंद मुलाकातों में
मौसम कोई हो
हम अनायास गाते हैं
बंजारे होंठ मधुर
बाँसुरी बजाते हैं
मेहँदी के रंग
उभर आते हैं हाथों में।
खुली-खुली आँखों में
स्वप्न सगुन होते हैं
हम मन के क्षितिजों पर
इंद्रधनुष बोते हैं
चंद्रमा उगाते हम
अँधियारी रातों में।
सुधियों में हम तेरे
भूख-प्यास भूले हैं
पतझर में भी
जाने क्यों पलाश फूले हैं
शहनाई गूँज रही
मंडपों कनातों में।
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फिर मै और उदास हो गया

उदासी में
मैं उदास आकाश देखता रहा
उदास मौसम में उदास पेड़ को।

फिर एक उदास रूपक में ढलकर
मैं और उदास हो गया।

उदास सी पत्ती
उदास पेड़ से झड़ रही थी
वह पत्ती,
वह पेड़,
वह मौसम
और वह आकाश,
मुझे और गहरी उदासी में ले गए।

मैंने उस शहर को याद किया।
फिर उन सड़कों को जिनसे हम गुज़रे।
शहर को याद किया तो मौसम याद आया।
याद आए वे शब्द जो कहे गए
उनसे ज्यादा याद आए वे शब्द
जो कहे ही नहीं जा सके।

याद किया उन कामनाओं को
जो पनपती रही उम्मीदों में।

जिन लम्हों में छूट रहा था शहर,
मैंने उन लम्हों को याद किया
यादें सफर कर रही थी-उस छूटे शहर की
मैंने यादों में जाकर उन यादों को याद किया।

-कि अब वह उठ गई होगी।
दोपहर की चाय के स्वाद में
लग रही होगी वह कुछ अलग।

उसके खालीपन में भर गया होगा,
भरने लायक कुछ
वही भरापन ले गया होगा उसे
सुकून के इलाके में
भूलने लगी होगी
इसी भरेपन में भूलने लायक
और याद कर रही होगी वह सब,
जो है याद करने लायक अब भी।

लगा होगा उस चाय के स्वाद के बीच
बेहतर है यह दोपहर, कल की दोपहर से
और बहुत दिनों बाद उसने
अपने दिल की आवाज़ सुनी होगी।

यहाँ इस वक्त
दोपहर की चाय पीते हुए उसने
उसके बारे में यही सब सोचा।

शाम थी और मैं भटक रहा था
शाम थी और मैं शाम से बाहर था-कहीं और।

एक सपना उतर रहा था शाम में
और वही उतर रहा था मुझमें।

सपने तकलीफ ही देते हैं
इस तकलीफ में
एक गीत मेरे ज़ेहन में आया
आया फिर होंठों पर,
उस शाम में मैंने वही गीत गुनगुनाया।

गहरी चुप्पी है और सन्नाटा उतर रहा है
न हवा, न रोशनी,
कुछ भी नहीं।

मैं इसी सन्नाटे में बिखर रहा हूँ।
न कोई आहट, न कोई अनुगूँज।
बस, निस्सीम गहरी रिक्तता।
समा रहा है इसमें सब कुछ
अपनी ही धक् उतरती है
गहरी चुप्पी में चुपचाप।
मैं अपनी इसी धक् में समा रहा हूँ।

उसने अपना नाम लिखा,
फिर वह लिखता गया अपना ही नाम।
उसने कविता के शिल्प में अपना नाम लिखा
इसमें उसे सचमुच कविता नज़र आई।
उसने सचमुच कविता ही लिखी।

एक चींटा
एक और चींटे के साथ
दुनिया भर की खबरों से बेखबर
चढ़ रहा है पेड़ पर।
साधे हुए है आकाश-अपनी आँखों में
साधे हुए है अपने को-प्रेम में
किसी सपने में पहुँचने के लिए
चढ़ रहे हैं दोनों - चुपचाप