कुछ बातें जो संभ्रात इतिहास में दर्ज नहीं की जा सकेंगी

फिर मै और उदास हो गया

उदासी में
मैं उदास आकाश देखता रहा
उदास मौसम में उदास पेड़ को।

फिर एक उदास रूपक में ढलकर
मैं और उदास हो गया।

उदास सी पत्ती
उदास पेड़ से झड़ रही थी
वह पत्ती,
वह पेड़,
वह मौसम
और वह आकाश,
मुझे और गहरी उदासी में ले गए।

मैंने उस शहर को याद किया।
फिर उन सड़कों को जिनसे हम गुज़रे।
शहर को याद किया तो मौसम याद आया।
याद आए वे शब्द जो कहे गए
उनसे ज्यादा याद आए वे शब्द
जो कहे ही नहीं जा सके।

याद किया उन कामनाओं को
जो पनपती रही उम्मीदों में।

जिन लम्हों में छूट रहा था शहर,
मैंने उन लम्हों को याद किया
यादें सफर कर रही थी-उस छूटे शहर की
मैंने यादों में जाकर उन यादों को याद किया।

-कि अब वह उठ गई होगी।
दोपहर की चाय के स्वाद में
लग रही होगी वह कुछ अलग।

उसके खालीपन में भर गया होगा,
भरने लायक कुछ
वही भरापन ले गया होगा उसे
सुकून के इलाके में
भूलने लगी होगी
इसी भरेपन में भूलने लायक
और याद कर रही होगी वह सब,
जो है याद करने लायक अब भी।

लगा होगा उस चाय के स्वाद के बीच
बेहतर है यह दोपहर, कल की दोपहर से
और बहुत दिनों बाद उसने
अपने दिल की आवाज़ सुनी होगी।

यहाँ इस वक्त
दोपहर की चाय पीते हुए उसने
उसके बारे में यही सब सोचा।

शाम थी और मैं भटक रहा था
शाम थी और मैं शाम से बाहर था-कहीं और।

एक सपना उतर रहा था शाम में
और वही उतर रहा था मुझमें।

सपने तकलीफ ही देते हैं
इस तकलीफ में
एक गीत मेरे ज़ेहन में आया
आया फिर होंठों पर,
उस शाम में मैंने वही गीत गुनगुनाया।

गहरी चुप्पी है और सन्नाटा उतर रहा है
न हवा, न रोशनी,
कुछ भी नहीं।

मैं इसी सन्नाटे में बिखर रहा हूँ।
न कोई आहट, न कोई अनुगूँज।
बस, निस्सीम गहरी रिक्तता।
समा रहा है इसमें सब कुछ
अपनी ही धक् उतरती है
गहरी चुप्पी में चुपचाप।
मैं अपनी इसी धक् में समा रहा हूँ।

उसने अपना नाम लिखा,
फिर वह लिखता गया अपना ही नाम।
उसने कविता के शिल्प में अपना नाम लिखा
इसमें उसे सचमुच कविता नज़र आई।
उसने सचमुच कविता ही लिखी।

एक चींटा
एक और चींटे के साथ
दुनिया भर की खबरों से बेखबर
चढ़ रहा है पेड़ पर।
साधे हुए है आकाश-अपनी आँखों में
साधे हुए है अपने को-प्रेम में
किसी सपने में पहुँचने के लिए
चढ़ रहे हैं दोनों - चुपचाप

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