अमेरिकी पत्रिका साइंस ने 2009 के 10 सबसे अहम खोजों की सूची तैयार की है। साइंस की इस लिस्ट का हर साल इंतजार रहता है, लेकिन इस बार फीजिक्स, केमिस्ट्री या मेडिकल की खोज को पहला नंबर नहीं मिला।
विज्ञान के नोबेल पुरस्कारों जैसा महत्व रखने वाली इस सूची में इस बार लीक से हट कर पुरातत्व और मानव शास्त्र से जुड़ी ऐसी खोज को पहले नंबर पर रखा गया है, जो चार्ल्स डार्विन के सिद्धांत की पुष्टि करता है। डार्विन को समर्पित 2009 के अंत में उनका इससे बड़ा सम्मान नहीं हो सकता।
44 लाख साल पुराना मानव : यह खोज आर्दीपिथेकस रामीदुस कहलाने वाले और मनुष्य के समान दिखने वाले एक ऐसे आदिमानव के अस्थिपंजरों की है, जो लगभग 44 लाख साल पहले इथोपिया के अफार इलाके में रहता था। इसी इलाके में लूसी कहलाने वाली उस आदिमहिला के अवशेष भी मिले, जिसे मनुष्य जाति का अब तक का सबसे पुराना पूर्वज माना जाता था। आर्दीपिथेकस के कंकाल लूसी से भी 10 लाख साल पुराने हैं।
आर्दी कह कर पुकारे जा रहे आर्दीपिथेकस की खोज साइंस पत्रिका के दो अक्टूबर वाले अंक में प्रकाशित हुई। लूसी की तरह आर्दी भी पुरुष नहीं, महिला है। उसकी खोज का श्रेय अमेरिकी वैज्ञानिक टिम व्हाइट के नेतृत्व में नौ देशों के 47 वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम को जाता है। प्रोफेसर टिम व्हाइट इस बात से दुखी हैं कि स्वयं वैज्ञानिक बिरादरी में उनकी खोज पर विश्वास कम, अविश्वास ज्यादा रहा।
वैज्ञानिक बिरादरी से अलग-अलग टिप्पणियाँ सुनने को मिलीं। कई रिसर्च सामने आए हैं। आज के चिम्पांजी पर शोध करने वाले प्राइमैटोलॉजी ग्रुप के वैज्ञानिक काफी चकित हैं कि आर्दीपिथेकस चिम्पांजियों से कितना मिलता जुलता था और कितना अलग भी।
रिसर्चरों का एक और ग्रुप कहता है कि आप जानते भी हैं कि मिले हुए टुकड़ों में कैसे मेल बैठाना चाहिये? सबसे अजीब प्रतिक्रिया विकासवाद के विरोधियों की रही। उन्होंने आर्दीपिथेकस को साफ अनदेखा कर दिया। वे कहते हैं कि या तो आप सृष्टि की उत्पत्ति की कट्टरपंथी व्याख्या में विश्वास करते हैं या विश्वास नहीं करते। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आर्दीपिथेकस नाम की कोई चीज है या नहीं। -प्रोफेसर टिम व्हाइट
व्हाइट का कहना है कि उनकी टीम 15 सालों से आर्दीपिथेकस के अवशेष जुटा रही थी। उसे 37 अलग-अलग व्यक्तियों की हड्डियों के 130 टुकड़े मिले हैं। सभी व्यक्ति एक ही समय और इथियोपिया की एक ही जगह पर रहा करते थे। वे एक ही आदिकालीन मानव प्रजाति के सदस्य थे। संभव है कि इसी प्रजाति से बाद में ऑस्ट्रालोपिथेकस का विकास हुआ, जिससे कोई 20 लाख साल पहले होमो कहलाने वाली आज के मनुष्य की प्रजाति बनी।
जिस आर्दीपिथेकस महिला के सबसे अधिक अवशेष मिले हैं, वह एक मीटर 20 सेंटीमीटर लंबी और 50 किलोग्राम भारी रही होगी। उसकी शरीर की बनावट से पता चलता है कि इस प्रजाति के सदस्य दोनो पैरों पर खड़े हो कर चल सकते थे, पर पेड़ों पर रहने के भी आदी थे। उनके पैर चपटे और पैरों की अँगुलियाँ काफी फैली होती थीं। वे हमेशा खड़े हो कर ही नहीं चलते थे। चलते समय कुछ भटकते हुए, लड़खड़ाते हुए चलते होंगे।
उनमें आज के मनुष्य वाले कई गुण नहीं थे। पर बंदरों वाले कई ठेठ गुण भी नहीं रह गए थे। वे एक तरह से बंदर से मनुष्य की ओर बढ़ रहे थे। 44 लाख साल पुरानी हाथ, पैर, सिर और मुँह की हड्डियों के आधार पर इस आदिकालीन मनुष्य को पहली बार एक चेहरा भी दिया जा सका है। व्हाइट कहते हैं कि इस खोज से हम उस जगह पहुँच गए, जहाँ मनुष्य और चिम्पांजी बंदर के पूर्वज एक दूसरे से अलग हुए और विकास की अलग अलग राहों पर चल पड़े।
पल्सरों की खोज : साइंस ने अपनी टॉप टेन में अत्यंत शक्तिशाली गामा किरणें पैदा करने वाले पल्सरों की खोज को दूसरे नंबर पर रखा है। यह खोज की है अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के फर्मी गामा रे स्पेस टेलिस्कोप ने। उसने ब्रह्मांड के अरबों-खरबों तारों और तारामंडलों के बीच से ऐसे पिंड को खोज निकाला, जो पृथ्वी पर से देखने पर हर सेकंड में तीन बार प्रचंड शक्ति वाली गामा किरणों की कौंध पैदा करता है। हर कौंध के साथ वह हमारे सूर्य की तुलना में एक हजार गुना अधिक ऊर्जा अंतरिक्ष में बिखेरता है। यह पल्सर करीब 10,000 साल पुराना है और हमारी पृथ्वी से 4,600 प्रकाश वर्ष दूर CTA1 सुपरनोवा में समझा जाता है।
गामा किरणें अत्यंत ऊँची फ्रीक्वेंसी और उतनी ही कम वेवलेंग्थ वाली अदृश्य किरणें हैं। वे पदार्थ और प्रतिपदार्थ (ऐंटी मैटर) के इलेक्ट्रॉन पॉजीट्रॉन जैसे संघटक कणों के एक दूसरे को नष्ट करने, रेडियोधर्मी विघटन, या परमाणु संलयन अथवा विखंडन से पैदा होती हैं।
अंतरिक्ष में कभी-कभी गामा किरणों का फव्वारा फूटता है। अनुमान है कि ऐसा हर विस्फोट केवल 10 सेकंड में जितनी ऊर्जा अंतरिक्ष में उंडेलता है, उतनी ऊर्जा हमारा सूर्य 10 अरब वर्षों के अपने पूरे जीवनकाल में भी शायद नहीं पैदा कर पाएगा।
उम्र बढ़ाने की करिश्माई दवा : एक दवा है रेपामाइसिन, जिसे सिरोलिमस भी कहा जाता है। उसे सबसे पहले ईस्टर द्वीपों की मिट्टी में मिलने वाले स्ट्रेप्टोमाइसेटेन नाम के बैक्टीरिया से पाया गया। अमेरिका में बार हार्बर की एक प्रयोगशाला ने चूहों पर प्रयोगों में पाया कि इस दवा से चूहों का जीवन नौ से 14 प्रतिशत बढ़ सकता है। प्रयोग के शुरू में चूहों की उम्र करीब 20 महीनों की थी, जो मनुष्यों के लिए 60 साल के बराबर है। इसका अर्थ लगाया गया कि रेपामाइसीन उम्र बढ़ाने की दवा है और ज्यादा उम्र में भी उसके प्रयोग से जीवन लंबा हो सकता है। मनुष्यों पर उसका प्रभाव अभी देखना बाकी है, तब भी इस खोज को तीसरे नंबर पर रखा गया।
ग्राफीन से क्रांति संभव : चौथे नंबर पर है ग्राफ्रीन नाम की केवल एक अणु जितनी मोटी कार्बन की एक ऐसी झीनी परत, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि वह एक दिन कंप्यूटर तकनीक में क्रांति ला देगी। ग्राफ्रीन शब्द ग्रेफ्राइट से बना है, जो कोयले और हीरे की तरह ही कार्बन एक रूप है। ग्राफ्रीन की खोज करने वाले नीदरलैंड्स के वैज्ञानिक प्रोफ्रेसर आंद्रे गाइम को 2009 में यूरोपीय संघ का साढ़े सात लाख यूरो का क्यौर्बर पुरस्कार भी मिला।
लिखने वाली पेंसिल के बीच के हिस्से यानी ग्रेफ्राइट को यदि एक अणु की मोटाई में छीला जाए, तो उस छीलन को ग्राफ्रीन कहा जाएगा। उसके अणु छह कोनों वाली लचीली, लेकन बेहद मजबूत जाली की तरह आपस में जुड़े होते हैं। वैज्ञानिकों ने पाया कि इस अवस्था में कार्बन में चमत्कारिक गुण आ जाते हैं। वे बिजली के सुचालक होते हैं, ट्रांजिस्टर की तरह अर्धचालक का काम कर सकते हैं और उनसे सिलिकॉन की जगह कंप्यूटर की और भी छोटी चिपें बन सकती हैं।
एबीए रिसेप्टरः तनाव सूचक हार्मोन : 10 बेहतरीन खोजों में पेड़-पौधों में तनाव सूचक हार्मोन एबीए रिसेप्टर भी है, जिसका श्रेय जर्मनी में म्यूनिख के प्रोफ्रेसर एरविन ग्रिल को जाता है। यह हार्मोन पानी की कमी में पेड़ पौधों को बताता है कि कब उन्हें अपने पत्तों के छेदों को बंद कर देना चाहिए, ताकि बचे हुए पानी को बचाया जा सके।
पैदाइशी नेत्रहीनता पैदा करने वाली मस्तिष्क की एक बीमारी को ठीक करने वाला नया इलाज, स्पिन आइस कहलाने वाले क्रिस्टलों में मैग्नेटिक मोनोपोल यानी चुंबकीय एकध्रुविता, अंतरिक्ष में घूम रहे दूरदर्शी हबल की मई में जोखिम भरी मरम्मत और अक्टूबर में चाँद पर पानी का निशान पाने को अन्य उपलब्धियों के तौर पर गिनाया गया है। भारतीय चंद्रमिशन ने सबसे पहले चाँद पर पानी की बात बताई, जिसकी बाद में नासा ने पुष्टि की।
सौजन्य से - डॉयचे वेले, जर्मन रेडियो
विज्ञान के नोबेल पुरस्कारों जैसा महत्व रखने वाली इस सूची में इस बार लीक से हट कर पुरातत्व और मानव शास्त्र से जुड़ी ऐसी खोज को पहले नंबर पर रखा गया है, जो चार्ल्स डार्विन के सिद्धांत की पुष्टि करता है। डार्विन को समर्पित 2009 के अंत में उनका इससे बड़ा सम्मान नहीं हो सकता।
44 लाख साल पुराना मानव : यह खोज आर्दीपिथेकस रामीदुस कहलाने वाले और मनुष्य के समान दिखने वाले एक ऐसे आदिमानव के अस्थिपंजरों की है, जो लगभग 44 लाख साल पहले इथोपिया के अफार इलाके में रहता था। इसी इलाके में लूसी कहलाने वाली उस आदिमहिला के अवशेष भी मिले, जिसे मनुष्य जाति का अब तक का सबसे पुराना पूर्वज माना जाता था। आर्दीपिथेकस के कंकाल लूसी से भी 10 लाख साल पुराने हैं।
आर्दी कह कर पुकारे जा रहे आर्दीपिथेकस की खोज साइंस पत्रिका के दो अक्टूबर वाले अंक में प्रकाशित हुई। लूसी की तरह आर्दी भी पुरुष नहीं, महिला है। उसकी खोज का श्रेय अमेरिकी वैज्ञानिक टिम व्हाइट के नेतृत्व में नौ देशों के 47 वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम को जाता है। प्रोफेसर टिम व्हाइट इस बात से दुखी हैं कि स्वयं वैज्ञानिक बिरादरी में उनकी खोज पर विश्वास कम, अविश्वास ज्यादा रहा।
वैज्ञानिक बिरादरी से अलग-अलग टिप्पणियाँ सुनने को मिलीं। कई रिसर्च सामने आए हैं। आज के चिम्पांजी पर शोध करने वाले प्राइमैटोलॉजी ग्रुप के वैज्ञानिक काफी चकित हैं कि आर्दीपिथेकस चिम्पांजियों से कितना मिलता जुलता था और कितना अलग भी।
रिसर्चरों का एक और ग्रुप कहता है कि आप जानते भी हैं कि मिले हुए टुकड़ों में कैसे मेल बैठाना चाहिये? सबसे अजीब प्रतिक्रिया विकासवाद के विरोधियों की रही। उन्होंने आर्दीपिथेकस को साफ अनदेखा कर दिया। वे कहते हैं कि या तो आप सृष्टि की उत्पत्ति की कट्टरपंथी व्याख्या में विश्वास करते हैं या विश्वास नहीं करते। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आर्दीपिथेकस नाम की कोई चीज है या नहीं। -प्रोफेसर टिम व्हाइट
व्हाइट का कहना है कि उनकी टीम 15 सालों से आर्दीपिथेकस के अवशेष जुटा रही थी। उसे 37 अलग-अलग व्यक्तियों की हड्डियों के 130 टुकड़े मिले हैं। सभी व्यक्ति एक ही समय और इथियोपिया की एक ही जगह पर रहा करते थे। वे एक ही आदिकालीन मानव प्रजाति के सदस्य थे। संभव है कि इसी प्रजाति से बाद में ऑस्ट्रालोपिथेकस का विकास हुआ, जिससे कोई 20 लाख साल पहले होमो कहलाने वाली आज के मनुष्य की प्रजाति बनी।
जिस आर्दीपिथेकस महिला के सबसे अधिक अवशेष मिले हैं, वह एक मीटर 20 सेंटीमीटर लंबी और 50 किलोग्राम भारी रही होगी। उसकी शरीर की बनावट से पता चलता है कि इस प्रजाति के सदस्य दोनो पैरों पर खड़े हो कर चल सकते थे, पर पेड़ों पर रहने के भी आदी थे। उनके पैर चपटे और पैरों की अँगुलियाँ काफी फैली होती थीं। वे हमेशा खड़े हो कर ही नहीं चलते थे। चलते समय कुछ भटकते हुए, लड़खड़ाते हुए चलते होंगे।
उनमें आज के मनुष्य वाले कई गुण नहीं थे। पर बंदरों वाले कई ठेठ गुण भी नहीं रह गए थे। वे एक तरह से बंदर से मनुष्य की ओर बढ़ रहे थे। 44 लाख साल पुरानी हाथ, पैर, सिर और मुँह की हड्डियों के आधार पर इस आदिकालीन मनुष्य को पहली बार एक चेहरा भी दिया जा सका है। व्हाइट कहते हैं कि इस खोज से हम उस जगह पहुँच गए, जहाँ मनुष्य और चिम्पांजी बंदर के पूर्वज एक दूसरे से अलग हुए और विकास की अलग अलग राहों पर चल पड़े।
पल्सरों की खोज : साइंस ने अपनी टॉप टेन में अत्यंत शक्तिशाली गामा किरणें पैदा करने वाले पल्सरों की खोज को दूसरे नंबर पर रखा है। यह खोज की है अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के फर्मी गामा रे स्पेस टेलिस्कोप ने। उसने ब्रह्मांड के अरबों-खरबों तारों और तारामंडलों के बीच से ऐसे पिंड को खोज निकाला, जो पृथ्वी पर से देखने पर हर सेकंड में तीन बार प्रचंड शक्ति वाली गामा किरणों की कौंध पैदा करता है। हर कौंध के साथ वह हमारे सूर्य की तुलना में एक हजार गुना अधिक ऊर्जा अंतरिक्ष में बिखेरता है। यह पल्सर करीब 10,000 साल पुराना है और हमारी पृथ्वी से 4,600 प्रकाश वर्ष दूर CTA1 सुपरनोवा में समझा जाता है।
गामा किरणें अत्यंत ऊँची फ्रीक्वेंसी और उतनी ही कम वेवलेंग्थ वाली अदृश्य किरणें हैं। वे पदार्थ और प्रतिपदार्थ (ऐंटी मैटर) के इलेक्ट्रॉन पॉजीट्रॉन जैसे संघटक कणों के एक दूसरे को नष्ट करने, रेडियोधर्मी विघटन, या परमाणु संलयन अथवा विखंडन से पैदा होती हैं।
अंतरिक्ष में कभी-कभी गामा किरणों का फव्वारा फूटता है। अनुमान है कि ऐसा हर विस्फोट केवल 10 सेकंड में जितनी ऊर्जा अंतरिक्ष में उंडेलता है, उतनी ऊर्जा हमारा सूर्य 10 अरब वर्षों के अपने पूरे जीवनकाल में भी शायद नहीं पैदा कर पाएगा।
उम्र बढ़ाने की करिश्माई दवा : एक दवा है रेपामाइसिन, जिसे सिरोलिमस भी कहा जाता है। उसे सबसे पहले ईस्टर द्वीपों की मिट्टी में मिलने वाले स्ट्रेप्टोमाइसेटेन नाम के बैक्टीरिया से पाया गया। अमेरिका में बार हार्बर की एक प्रयोगशाला ने चूहों पर प्रयोगों में पाया कि इस दवा से चूहों का जीवन नौ से 14 प्रतिशत बढ़ सकता है। प्रयोग के शुरू में चूहों की उम्र करीब 20 महीनों की थी, जो मनुष्यों के लिए 60 साल के बराबर है। इसका अर्थ लगाया गया कि रेपामाइसीन उम्र बढ़ाने की दवा है और ज्यादा उम्र में भी उसके प्रयोग से जीवन लंबा हो सकता है। मनुष्यों पर उसका प्रभाव अभी देखना बाकी है, तब भी इस खोज को तीसरे नंबर पर रखा गया।
ग्राफीन से क्रांति संभव : चौथे नंबर पर है ग्राफ्रीन नाम की केवल एक अणु जितनी मोटी कार्बन की एक ऐसी झीनी परत, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि वह एक दिन कंप्यूटर तकनीक में क्रांति ला देगी। ग्राफ्रीन शब्द ग्रेफ्राइट से बना है, जो कोयले और हीरे की तरह ही कार्बन एक रूप है। ग्राफ्रीन की खोज करने वाले नीदरलैंड्स के वैज्ञानिक प्रोफ्रेसर आंद्रे गाइम को 2009 में यूरोपीय संघ का साढ़े सात लाख यूरो का क्यौर्बर पुरस्कार भी मिला।
लिखने वाली पेंसिल के बीच के हिस्से यानी ग्रेफ्राइट को यदि एक अणु की मोटाई में छीला जाए, तो उस छीलन को ग्राफ्रीन कहा जाएगा। उसके अणु छह कोनों वाली लचीली, लेकन बेहद मजबूत जाली की तरह आपस में जुड़े होते हैं। वैज्ञानिकों ने पाया कि इस अवस्था में कार्बन में चमत्कारिक गुण आ जाते हैं। वे बिजली के सुचालक होते हैं, ट्रांजिस्टर की तरह अर्धचालक का काम कर सकते हैं और उनसे सिलिकॉन की जगह कंप्यूटर की और भी छोटी चिपें बन सकती हैं।
एबीए रिसेप्टरः तनाव सूचक हार्मोन : 10 बेहतरीन खोजों में पेड़-पौधों में तनाव सूचक हार्मोन एबीए रिसेप्टर भी है, जिसका श्रेय जर्मनी में म्यूनिख के प्रोफ्रेसर एरविन ग्रिल को जाता है। यह हार्मोन पानी की कमी में पेड़ पौधों को बताता है कि कब उन्हें अपने पत्तों के छेदों को बंद कर देना चाहिए, ताकि बचे हुए पानी को बचाया जा सके।
पैदाइशी नेत्रहीनता पैदा करने वाली मस्तिष्क की एक बीमारी को ठीक करने वाला नया इलाज, स्पिन आइस कहलाने वाले क्रिस्टलों में मैग्नेटिक मोनोपोल यानी चुंबकीय एकध्रुविता, अंतरिक्ष में घूम रहे दूरदर्शी हबल की मई में जोखिम भरी मरम्मत और अक्टूबर में चाँद पर पानी का निशान पाने को अन्य उपलब्धियों के तौर पर गिनाया गया है। भारतीय चंद्रमिशन ने सबसे पहले चाँद पर पानी की बात बताई, जिसकी बाद में नासा ने पुष्टि की।
सौजन्य से - डॉयचे वेले, जर्मन रेडियो
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें