दो जाम उनके नाम भी ऐ-पीरे-मैकदा
जिन रफ़्तगाँ के साथ हमेशा शराब पी
नमी दानं चे मंज़िल बुद
शब् जाये की मन बुदम
क़दम क़दम लार्ज़िदा लार्ज़िदा
नज़र तर्सिदा तर्सिदा
किसी से मेरी मंजिल का पाता पाया नहीं जाता
जहाँ मै वहां फरिश्तों से भी आया नहीं जाता
हक-ए-कुल फाकां से गुज़र गया
हक-ए-ला-मकां से गुज़र गया
तेरी जुस्तजू में ठहर गया
मै कहाँ कहाँ से गुज़र गया
नमी दानं चे मंजिल
कभी मिसाल-ए-मौजे हवा-ए-गुल
कभी बन के दर्द-ओ-फुगाये दिल
तेरी शौक़-ए-दीद में बारहां
तेरे आस्तां से गुज़र गया
ये तो अपना अपना है हौसला
ये तो अपनी अपनी उडान है
कोई उड़ के रह गया बाम तक
कोई कहकशां से गुज़र गया
शब्-ए-हिज्र हँस के गुजार ली
ग़म-ए-इश्क दिल से लगा लिया
मेरे जज़्ब-ए-शौक़ की दाद दे मै
हर इम्तेहान से गुज़र गया
नमी दानं चे मंज़िल बुद
शब् जाये के मन बुदम
बहर्सू रक्स-ए-बिस्मिल बुद
शब् जाये के मन बुदम
नमी दानम
बयां जाना तमाशा
उनके दर हमको हिजबाना
कसद सामान-ए-रुसवाई
सरे बाज़ार रक्सम
बहर्सू रक्स-ए-बिस्मिल
दुआ कातिल
के अज बहर-ए-तमाशा
खून-ए-मन रेज़ी
अना बिस्मिल के जेरे
खंजरे खूंखार रक्सम
कदे शबनम का कतरा
लोक कहेंदे ना ईद किया
ये जो शबनम का कतरा है
उससे खार अच्छा
बुलंद कूचा-ए-जाना की थी ज़मीं
हमने नाच नाच के हमवार कर दिया
तेरी ज़ुल्फ़ गर शब्-ए-क़दर है
तेरा चेहरा बद्र-ए-मुनीर है
,..............................
..............................
........................
जि
नमी दानं चे मंज़िल बुद
शब् जाये की मन बुदम
क़दम क़दम लार्ज़िदा लार्ज़िदा
नज़र तर्सिदा तर्सिदा
किसी से मेरी मंजिल का पाता पाया नहीं जाता
जहाँ मै वहां फरिश्तों से भी आया नहीं जाता
हक-ए-कुल फाकां से गुज़र गया
हक-ए-ला-मकां से गुज़र गया
तेरी जुस्तजू में ठहर गया
मै कहाँ कहाँ से गुज़र गया
नमी दानं चे मंजिल
कभी मिसाल-ए-मौजे हवा-ए-गुल
कभी बन के दर्द-ओ-फुगाये दिल
तेरी शौक़-ए-दीद में बारहां
तेरे आस्तां से गुज़र गया
ये तो अपना अपना है हौसला
ये तो अपनी अपनी उडान है
कोई उड़ के रह गया बाम तक
कोई कहकशां से गुज़र गया
शब्-ए-हिज्र हँस के गुजार ली
ग़म-ए-इश्क दिल से लगा लिया
मेरे जज़्ब-ए-शौक़ की दाद दे मै
हर इम्तेहान से गुज़र गया
नमी दानं चे मंज़िल बुद
शब् जाये के मन बुदम
बहर्सू रक्स-ए-बिस्मिल बुद
शब् जाये के मन बुदम
नमी दानम
बयां जाना तमाशा
उनके दर हमको हिजबाना
कसद सामान-ए-रुसवाई
सरे बाज़ार रक्सम
बहर्सू रक्स-ए-बिस्मिल
दुआ कातिल
के अज बहर-ए-तमाशा
खून-ए-मन रेज़ी
अना बिस्मिल के जेरे
खंजरे खूंखार रक्सम
कदे शबनम का कतरा
लोक कहेंदे ना ईद किया
ये जो शबनम का कतरा है
उससे खार अच्छा
बुलंद कूचा-ए-जाना की थी ज़मीं
हमने नाच नाच के हमवार कर दिया
तेरी ज़ुल्फ़ गर शब्-ए-क़दर है
तेरा चेहरा बद्र-ए-मुनीर है
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