पहला तीखा बहुत खाता था इसलिए मर गया
दूसरा मर गया भात खाते-खाते
तीसरा मरा कि दारू की थी उसे लत
चौथा नौकरी की तलाश में मारा गया
पाँचवें को मारा प्रेमिका की बेवफाई ने
छठा मरा इसलिए कि वह बनाना चाहता था घर
सातवाँ सवाल करने के फेर में मरा
आठवाँ प्यासा मर गया भरे समुद्र में
नौंवा नंगा था इसलिए शर्म से मरा खुद-ब-खुद
दसवाँ मरा इसलिए कि कोई वजह नहीं थी उसके जीने की।
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मैं सोचता था
पानी उतना ही साफ पिलाया जाएगा
जितना होता है झरनों का
चिकित्सक बिलकुल ऐसी दवा देंगे
जैसे माँ के दूध में तुलसी का रस
मैं जहर खाने जाऊँगा
तो रोक लेगा कोई
ड्रायवर मंजिल तक पहुँचा देगा
और मैं मार लूँगा एक नींद
घर पहुँचूँगा तो बाल-बच्चे मिलेंगे सही-सलामत
ट्रेन के सामने आ जाने पर
लगा दिया जाएगा ब्रेक ऐन मौके पर
और लोग डाँट पिलाएँगे-
'यह क्या नादानी है, दुनिया अभी जीने लायक है।'
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दसों दिशाओं को रहना है अभी यथावत
खनिज और तेल भरी धरती
घूमती रहनी है बहुत दिनों तक
वनस्पतियों में बची रहनी हैं औषधियाँ
चिरई-चुनगुन लौटते रहने हैं घोंसलों में हर शाम
परियाँ आती रहनी हैं हमारे सपनों में बेखौफ
बहुत हुआ तो किस्से-कहानियों में घुसे रहेंगे सम्राट
पर उनका रक्तपात रहना है सनद
और वक्त पर हमारे काम आना है
बहुत गुजरना है समय।
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मुझे आने दो
हँसते हुए अपने घर
एक बार मैं पहुँचना चाहता हूँ
तुम्हारी खिलखिलाहट के ठीक-ठीक करीब
जहाँ तुम मौजूद हो पूरे घरेलूपन के साथ
बिना परतदार हुए कैसे जी लेती हो इस तरह?
सिर्फ एक बार मुझे बुलाओ
खिलखिलाकर तहें खोलो मेरी
जान लेने दो मुझे
घर को घर की तरह
सिर्फ एक बार।
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झाँझ बजती है तो बजे
मँजीरे खड़कते हैं तो खड़कते रहें
लोग करते रहें रामधुन
पंडित करता रहे गीता पाठ मेरे सिरहाने
नहीं, मैं ऐसे नहीं जाऊँगा।
आखिर तक बनाए रखूँगा भरम
कि किसके नाम है वसीयत
किस कोठरी में गड़ी हैं मुहरें।
कसकर पकड़े रहूँगा
कमर में बँधी चाबी का गुच्छा
बाँसों में बँधकर ऐसे ही नहीं निकल जाऊँगा
कि मुँहबाए देखता रह जाए आँगन
ताकती रह जाए अलगनी
दरवाजा बिसूरता रह जाए।
मेरी देह ने किया है अभ्यास इस घर में रहने का
कैसे निकाल दूँ कदम दुनिया से बाहर
चाहे बंद हो जाए सिर पर टिकटिकाती घड़ी
पाए हो जाएँ पेड़
मैं नहीं उतरूँगा चारपायी से।
चाहे आखिरी साबित हो जाए गोधूलिवेला
सूरज सागर में छिप जाए
रात चिपचिपा जाए पृथ्वी के आरपार
कृमि-कीट करने लगें मेरा इंतजार
धर्मराज कर दें मेरा खाता-बही बंद
मैं डुलूँगा नहीं
खफा होते हैं तो हो जाएँ मित्र
शोकाकुल परिजन ले जाएँ तो ले जाएँ
मैं जलूँगा नहीं।
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बहुत दिनों से देवता हैं तैंतीस करोड़
उनके हिस्से का खाना-पीना नहीं घटता
वे नहीं उलझते किसी अक्षांश-देशांतर में
वे बुद्घि के ढेर
इंद्रियाँ झकाझक उनकी
सर्दी-खाँसी से परे
ट्रेन से कटकर नहीं मरते
रहते हैं पत्थर में बनकर प्राण
कभी नहीं उठती उनके पेट में मरोड़
देवता हैं तैंतीस करोड़
हम ढूँढते हैं उन्हें
सूर्य के घोड़ों में
गंधाते दुःखों में
क्रोध में
शोक में
जीवन में
मृत्यु में
मक्खी में
खटमल में
देश में
प्रदेश में
धरती में
आकाश में
मंदिर में
मस्जिद में
दंगे में
फसाद में
शुरू में
बाद में
घास में
काई में
ब्राह्मण में
नाई में
बहेलिए के जाल में
पुजारी की खाल में
वे छिप जाते हैं
सल्फास की गोली में
देवता कंधे पर बैठकर चलते हैं साथ
परछाई में रहते हैं पैवस्त
सोते हैं खुले में
धूप में
बारिश में
गाँजे की चिलम में छिप जाते हैं हर वक्त
नारियल हैं वे
चंदन हैं
अक्षत हैं
धूप-गुग्गुल हैं देवता
कुछ अंधे
कुछ बहरे
कुछ लूले
कुछ लंगड़े
कुछ ऐंचे
कुछ तगड़े
बड़े अजायबघर हैं
युगों-युगों के ठग
जन्मांतरों के निष्ठुर
नहीं सुनते हाहाकार
प्राणियों की करुण पुकार
हम तमाम उम्र अधीर
माँगते वर गंभीर
इतनी साधना
इतना योग
इतना त्याग
इतना जप
इतना तप
इतना ज्ञान
इतना दान
जाता है निष्फल
वे छिपे रहते हैं मोतियाबिंद में
फेफड़ों के कफ में
मन के मैल में
बालों के तेल में
हमारी पीड़ाएँ नुकीले तीर
छूटती रहती हैं धरती से आकाश
और बच-बच निकल जाते हैं तैंतीस करोड़ देवता
हमारा घोर एकांत
घनी रात
भूख-प्यास
घर न द्वार
राह में बैठे खूँखार
तड़कता है दिल-दिमाग
लौटती हैं पितरों की स्मृतियाँ
राह लौटती है
लौटते हैं युग
वह सब कुछ लौटता है
जो चला गया चौरासी करोड़ योनियों का
और तिलमिला उठते हैं
तैंतीस करोड़ देवता।
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