आज की कविता उस लड़की के नाम जो प्यार करती है और इज़हार भी
बहुत प्यार करना चाहता हूँ तुम्हें
जैसे बादल बरसते हैं
धरती पर
मैं क्यों नहीं कर पाता तुम्हें
इतना प्यार।
हवा, जैसे भर देती हैं हँसी
पेड़ की नस-नस में
क्यों नहीं दे पाता स्पर्श तुम्हें
उस प्रकार।
फूल चटख जाते हैं
अपनी खुशबू के साथ
मैं क्यों व्यक्त नहीं कर पाता
ऐसा प्यार।
दरअसल, हमने प्यार करने की
दो जगह चुनी है।
बादल, हवा, फूल, स्पर्श-गंध
अलग से नहीं पहचाने जा सकते
ये सब घुल-मिल गए हैं
हमारे घर में
इसलिए दिखाई नहीं देता
अलग से हमारा प्यार।
.......................................
जब तुम मुझसे करोगे
प्यार की बातें
चाहे कितनी भी अनगढ़ हो तुम्हारी भाषा
मैं थोड़ा अचकचा कर
ठहाके लगाकर हँसूँगा ही
और हो जाऊँगा खुद से बेखबर बावला -सा...
चाहे कितनी भी अनगढ़ हो तुम्हारी भाषा
प्यार उमड़ घुमड़कर इस तरह घेर लेगा मुझे
कि आधी रात जाग पडूँगा मैं हड़बड़ाकर
जैसे एकाकी छूट जाऊँ मैं भरी भीड़ में
मेरे अंदर जुनून में हहराने लगेंगे
तुम्हारी स्मृतियों के ज्वार...
तुम्हें खूब मालूम है हतप्रभ हो जाऊँगा मैं
दुनिया के दागे बस मामूली से ही किसी सवाल पर
फिर प्यार इस तरह से ले लेगा आगोश में अपनी
कि दुनिया को रख लूँगा मैं जूते की नोंक पर
बस एक बार करो तो
मुझसे तुम प्यार की बातें...
चाहे कितनी भी अनगढ़ हो तुम्हारी भाषा
मैं दुत्कार दूँगा दुनिया को
तुम्हारे सामने ही
अब रात में कहाँ मूँदेंगी मेरी आँखें
और भला कैसे हो पाएगा दिन में भी मुझसे कोई
काम
मेरा मन हुआ करेगा एकदम व्यस्त
खींचने में रंगबिरंगे चित्र मनोभावों के
आँखें होने लगेंगी भारी
रोशनी से
महरूम
ये दुनिया लगने लगेगी मझे
जैसे हो ही न कहीं कुछ...
मैं प्यार की वेदी पर
चढ़ा दूँगा ये दुनिया
जब तुम मुझसे करोगे प्यार की बातें
चाहे कितनी भी अनगढ़ हो तुम्हारी भाषा
देखो तो, मैं वो अब रहां ही कहाँ
था जो थोड़ी देर पहले तक...
जैसे बादल बरसते हैं
धरती पर
मैं क्यों नहीं कर पाता तुम्हें
इतना प्यार।
हवा, जैसे भर देती हैं हँसी
पेड़ की नस-नस में
क्यों नहीं दे पाता स्पर्श तुम्हें
उस प्रकार।
फूल चटख जाते हैं
अपनी खुशबू के साथ
मैं क्यों व्यक्त नहीं कर पाता
ऐसा प्यार।
दरअसल, हमने प्यार करने की
दो जगह चुनी है।
बादल, हवा, फूल, स्पर्श-गंध
अलग से नहीं पहचाने जा सकते
ये सब घुल-मिल गए हैं
हमारे घर में
इसलिए दिखाई नहीं देता
अलग से हमारा प्यार।
.......................................
जब तुम मुझसे करोगे
प्यार की बातें
चाहे कितनी भी अनगढ़ हो तुम्हारी भाषा
मैं थोड़ा अचकचा कर
ठहाके लगाकर हँसूँगा ही
और हो जाऊँगा खुद से बेखबर बावला -सा...
चाहे कितनी भी अनगढ़ हो तुम्हारी भाषा
प्यार उमड़ घुमड़कर इस तरह घेर लेगा मुझे
कि आधी रात जाग पडूँगा मैं हड़बड़ाकर
जैसे एकाकी छूट जाऊँ मैं भरी भीड़ में
मेरे अंदर जुनून में हहराने लगेंगे
तुम्हारी स्मृतियों के ज्वार...
तुम्हें खूब मालूम है हतप्रभ हो जाऊँगा मैं
दुनिया के दागे बस मामूली से ही किसी सवाल पर
फिर प्यार इस तरह से ले लेगा आगोश में अपनी
कि दुनिया को रख लूँगा मैं जूते की नोंक पर
बस एक बार करो तो
मुझसे तुम प्यार की बातें...
चाहे कितनी भी अनगढ़ हो तुम्हारी भाषा
मैं दुत्कार दूँगा दुनिया को
तुम्हारे सामने ही
अब रात में कहाँ मूँदेंगी मेरी आँखें
और भला कैसे हो पाएगा दिन में भी मुझसे कोई
काम
मेरा मन हुआ करेगा एकदम व्यस्त
खींचने में रंगबिरंगे चित्र मनोभावों के
आँखें होने लगेंगी भारी
रोशनी से
महरूम
ये दुनिया लगने लगेगी मझे
जैसे हो ही न कहीं कुछ...
मैं प्यार की वेदी पर
चढ़ा दूँगा ये दुनिया
जब तुम मुझसे करोगे प्यार की बातें
चाहे कितनी भी अनगढ़ हो तुम्हारी भाषा
देखो तो, मैं वो अब रहां ही कहाँ
था जो थोड़ी देर पहले तक...
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