
जब शब्द
अधिक महत्वपूर्ण होने लगें
और भावनाएं गौण
तो कोलाहल में भी
बोलने लगता है मौन
ऐसे में
शब्दों के अर्थ बदल लेना ही उचित है
अधिक महत्वपूर्ण होने लगें
और भावनाएं गौण
तो कोलाहल में भी
बोलने लगता है मौन
ऐसे में
शब्दों के अर्थ बदल लेना ही उचित है
किसी भी व्यक्ति के जीवन में कई बार ऐसी घटनाएँ घटती हैं जब वो अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को फिर से टटोलने लगता है, सीधी सी बात कुछ यूँ होती है की यही घटनाएँ जब किस सामाजिक लबादे वाले इंसान के साथ घटती हैं तो वो कुछ ज़्यादा ही विचारशील हो जाता है, इन घटनाओं में सबसे महत्वपूर्ण वो होती हैं जिनमे एक व्यक्ति अपने व्यकितिवाद और वैचारिक स्थितियों से संघर्ष कर रहा होता है, चीजें जो बदली जानी चाहियें उनपर व्यैक्तिक वाद का हावी हो जाना सामाजिक आन्दोलन को कमज़ोर करता है तब उस इंसान को अपना रास्ता पुनः बदलना होता है, मेरे मित्र मुझसे पूछते हैं की आख़िर ऐसा क्यों होता है क्या ये वैचारिक दंद्द का प्रतिक है अथवा मानवीय भूल
दरअसल ये दोनों से अलग है "एक वैचारिक यात्रा है ये ............. अगर आप कहें की आप लालच नही करते तो आप सच नही बोल रहे हैं मगर आप कहें की आप लालच करते है मगर आप उस पर नियंत्रण रखना जानते है तो आप सही हैं और बेहतर भी" हर इंसान अपनी स्थितियों के साथ अपने साथ न्याय करता है, वो कभी कभी स्वय को दर्द देता है कभी दिलासा सामाजिक आन्दोलनों और बदलाव के पैरोकार लालची तो होते हैं मगर उनका अपने आत्म पर भारी नियंत्रण होता है जिसके कारण कहीं न कहीं उनका शाश्वत आत्म समाप्त हो जाता है! मै अगर स्वय की बात करूँ तो मेरा शाश्वत आत्म आज भी जीवित है यही कारण है की मै स्वय से संतुष्ट नही हो पाता
दूसरी बात वाद विवादों में जब दो पक्ष आमने सामने आते है तो स्वभावतः वो एक दुसरे से सहमत नही होते ठीक उसी तरह जब दो व्यक्ति सम्मुख हों तो एक दुसरे से सहमत होने का प्रश्न ही नही उठता............ फिर काहे की चिंता काहे का द्वेष..............
मै क्या कह रहा हूँ नही समझ पाए अब मै भी कौन सा समझ पाया हूँ........ आप शब्द नही समझ पाए मै ख़ुद को............... ये अपनी अपनी नज़र है जो दिखती है दिखाती है................ दुनिया समझनी है तो दुनिया में रहिये किताबों से दूर............. खोज कीजिये स्वय की आप कहाँ है............क्यों है.............कैसे हैं.......... ढोल मत पीटिये...... जो कर सकते है कीजिये या फिर कम से कम चैन से ख़ुद पसारिये और दूसरो को भी खर्राटा लेने दीजिये..............आप ढोल पिटते हुए ख़ुद सो रहे हैं तो औरों को जगाने का क्या फायदा........ काहे का सामाजिक आन्दोलन............. जब ख़ुद को ही नही पहचान पाए तो छाती पीट पीट कर दूसरो को क्यों कोसना अपना रास्ता तय कीजिये कहाँ जाना है वही को प्रस्थान कीजिये..... हर जगह ताक़ झांक करते रहना या हर इच्छा के सामने बिछते रहने से बेहतर है की अपने आप को बदलिए आप में कोई विशेषता नही.......... भावः कुचलिये और निकालिए लक्ष्य की ओर या फिर यहीं बैठिये............यहाँ कोई मध्य मार्ग नही होता आपको तय करना होगा............ रोज रोज की किचकिच से बेहतर है की स्वय को होम दीजिये............ इतना कर्म कीजिये की फल पाने का समय मात्र न हो आपके पास...........या फिर कमाते खाते चलिए.......................
शब्दों और तर्कों से ज़िन्दगी नही........... आन्दोलन चला करते हैं .................. बदलाव हुआ करते हैं .............. विश्व बदला करते हैं..................खुदाओ का इम्तेहान हुआ करता है............ बस चूल्हा नही जला करता........... रोटी नही पकती.............
इच्छाये आपको कमज़ोर बनाती हैं.............मज़बूत नही ...................इंसान बनाती है............विद्रोही नही
आप तय कीजिये आप को क्या चाहिए..................शब्द न बदल सकते तो शब्दों के अर्थ बदल लेना ही उचित है ..............
यहाँ कोई मध्य मार्ग नही......................................
दरअसल ये दोनों से अलग है "एक वैचारिक यात्रा है ये ............. अगर आप कहें की आप लालच नही करते तो आप सच नही बोल रहे हैं मगर आप कहें की आप लालच करते है मगर आप उस पर नियंत्रण रखना जानते है तो आप सही हैं और बेहतर भी" हर इंसान अपनी स्थितियों के साथ अपने साथ न्याय करता है, वो कभी कभी स्वय को दर्द देता है कभी दिलासा सामाजिक आन्दोलनों और बदलाव के पैरोकार लालची तो होते हैं मगर उनका अपने आत्म पर भारी नियंत्रण होता है जिसके कारण कहीं न कहीं उनका शाश्वत आत्म समाप्त हो जाता है! मै अगर स्वय की बात करूँ तो मेरा शाश्वत आत्म आज भी जीवित है यही कारण है की मै स्वय से संतुष्ट नही हो पाता
दूसरी बात वाद विवादों में जब दो पक्ष आमने सामने आते है तो स्वभावतः वो एक दुसरे से सहमत नही होते ठीक उसी तरह जब दो व्यक्ति सम्मुख हों तो एक दुसरे से सहमत होने का प्रश्न ही नही उठता............ फिर काहे की चिंता काहे का द्वेष..............
मै क्या कह रहा हूँ नही समझ पाए अब मै भी कौन सा समझ पाया हूँ........ आप शब्द नही समझ पाए मै ख़ुद को............... ये अपनी अपनी नज़र है जो दिखती है दिखाती है................ दुनिया समझनी है तो दुनिया में रहिये किताबों से दूर............. खोज कीजिये स्वय की आप कहाँ है............क्यों है.............कैसे हैं.......... ढोल मत पीटिये...... जो कर सकते है कीजिये या फिर कम से कम चैन से ख़ुद पसारिये और दूसरो को भी खर्राटा लेने दीजिये..............आप ढोल पिटते हुए ख़ुद सो रहे हैं तो औरों को जगाने का क्या फायदा........ काहे का सामाजिक आन्दोलन............. जब ख़ुद को ही नही पहचान पाए तो छाती पीट पीट कर दूसरो को क्यों कोसना अपना रास्ता तय कीजिये कहाँ जाना है वही को प्रस्थान कीजिये..... हर जगह ताक़ झांक करते रहना या हर इच्छा के सामने बिछते रहने से बेहतर है की अपने आप को बदलिए आप में कोई विशेषता नही.......... भावः कुचलिये और निकालिए लक्ष्य की ओर या फिर यहीं बैठिये............यहाँ कोई मध्य मार्ग नही होता आपको तय करना होगा............ रोज रोज की किचकिच से बेहतर है की स्वय को होम दीजिये............ इतना कर्म कीजिये की फल पाने का समय मात्र न हो आपके पास...........या फिर कमाते खाते चलिए.......................
शब्दों और तर्कों से ज़िन्दगी नही........... आन्दोलन चला करते हैं .................. बदलाव हुआ करते हैं .............. विश्व बदला करते हैं..................खुदाओ का इम्तेहान हुआ करता है............ बस चूल्हा नही जला करता........... रोटी नही पकती.............
इच्छाये आपको कमज़ोर बनाती हैं.............मज़बूत नही ...................इंसान बनाती है............विद्रोही नही
आप तय कीजिये आप को क्या चाहिए..................शब्द न बदल सकते तो शब्दों के अर्थ बदल लेना ही उचित है ..............
यहाँ कोई मध्य मार्ग नही......................................
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें