कुछ बातें जो संभ्रात इतिहास में दर्ज नहीं की जा सकेंगी

तो प्रतिशत में हसियेगा क्या

सुबह के 4 बजे लिख रहा हूँ ऐसा नही की मैं जल्दी जाग गया हूँ, दरअसल हमेशा की तरह सोया ही नही हूँ........ सो कर करूँ भी क्या नींद नही आती अब इसमे मैं कर भी क्या सकता हूँ, इन जागती रातों में कभी कोई महान चिंतन तो नही किया मगर चिंताएँ हमेशा की है आज मेरी चिंता का विषय था "ग्लोबल युग में धंधे का स्वरुप" आज कल अपने संघठन के लिए फंड इकठ्ठा करना मेरी प्राथमिकता है बिना फंड के मेरा सारा संगठन बिखर गया है, हर दरवाज़े जाकर दुम हिला रहा हूँ कटोरे फैला रहा हूँ , और इनके साथ ही सोच रहा हूँ क्या ये वही सपना है जिसे मैंने अपने लिए चुना था, क्या यही जिंदा आदमी होने का अहसास है (कभी अपने पिता श्री से कहा था) जिसके लिए मैंने सीधे रस्ते को अपनाने से इनकार कर दिया था, शायद नही और शायद क्यो कतई नही ये वो सपना नही....... अब आन्दोलन या सामाजिक चिंतन शाश्वत बौद्धिकता नही कोरा धंधा है, यहाँ सब कुछ माप तोल कर किया जाता है, अर्विन्दम चौधरी एक की फ़िल्म आई थी जिसमे हास्य हिंसा सेक्स और तमाम मानवीय व्यव्हार के प्रतिशत तय किए गए थे, और दावा किया गया था की ये हिट होगी फ़िल्म का इतना बुरा हाल हुआ की मुझे भी नाम याद नही ... तब संतोष हुआ था की आदमी प्रतिशत से नही अपने चैतन्य से चलता है....... सच कहूँ तो हर साल हर महीने और हर दिन आदमी बदल रहा है परिवर्तन से मुझे आपत्ति नही परिवर्तन तो हमारा लक्ष्य है निरंतरता तो हमारी आत्मा है मगर मशीनी होते जाना दुखद है "कवि अवतार सिंह पाश के शब्दों में सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनो का मर जाना " मगर ये खरनाक दौर अपने चरम पर है अंध भाग इतनी ज़्यादा है की हर आदमी पिस रहा है पिस्ता जा रहा है मगर उसे ख़ुद को पिसने का अहसास तक .............. अब एक क्रन्तिकारी तेवर के लिए मुझे तैयार करना होगा ..................अब मुड नही...................नींद आ रही है सोता हूँ..................... सुबह खैर

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