कुछ बातें जो संभ्रात इतिहास में दर्ज नहीं की जा सकेंगी

परिवार दिवस और छोटे परिवार की अवधारणा

आज अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस है। लेकिन आप कहेंगे कि भारत जैसे देश में अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस मनाने का क्या औचित्य? यहा लोग परिवार में आपसी मेल और सहयोग से रहते हैं। लेकिन सच्चाई ये है कि पश्चिमीकरण के बढ़ते प्रभाव, मंहगाई और जागरूकता ने संयुक्त परिवार की अवधारणा को काफी समय पहले ही खत्म कर दिया है। नतीजा बच्चे, मौसी-मामा, चाचा और बुआ जैसे रिश्तों से भी दूर हो रहे हैं।

भारतीय संस्कृति में दादा-दादी, चाचा-चाची और बुआ जैसे रिश्तों से भरे-पूरे परिवार में बच्चे बड़े होते थे। वहीं मौजूदा दौर में परिवार की अवधारणा धीरे-धीरे खत्म हो रही है। यह हम नहीं बल्कि नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट कह रही है। 1 लाख 24 हजार 3 सौ 85 महिलाओं और 74 हजार 3 सौ 69 पुरुषों से बातचीत में 89 प्रतिशत दंपतियों ने हम दो हमारे दो को आदर्श माना।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा देश के 29 राच्यों में 1 लाख 9 हजार 41 परिवारों पर दिसंबर 2005 से अगस्त 2006 के बीच कराए गए सर्वे के अनुसार देश के 83 प्रतिशत विवाहित दंपति दो बच्चों के साथ अपने परिवार को पूरा मानते हैं। इसमें शहरी क्षेत्र के 89 और ग्रामीण क्षेत्र के 80 प्रतिशत दंपति दो बच्चों के बाद अपना परिवार सीमित कर लेते हैं। उनको इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि ये दो बच्चे लड़के हैं या लड़की। वहीं दो लड़कों वाले 90 प्रतिशत, एक लड़का और एक लड़की वाले 88 प्रतिशत और दो लड़कियों वाले 61 प्रतिशत अभिभावकों ने अपने परिवार को पूरा माना।

बात अगर देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश (उत्तर प्रदेश का सन्दर्भ इस लिए कियोकी ये वो राज्य है जो भारत की वास्तविक तस्वीर पेश करता है जहाँ गौतम बुद्ध नगर जैसा विकसित और देवरिया जैसा अति पिछड़ा जिला आता है!) की करें तो 64।2 प्रतिशत लोग दो बच्चों पर परिवार की संतुष्टि का पैमाना मानते हैं। इनमें 73 प्रतिशत लोग दो बेटों के बाद तो 72 प्रतिशत लोग एक बेटा-एक बेटी और 31 प्रतिशत लोग दो बेटियों के साथ अपने परिवार को संतुष्ट मानते हैं। इस संबंध में समाजशास्त्री मानते हैं कि युवा जिम्मेदारियों से मुक्त रहना चाहते हैं। आर्थिक मंदी और बढ़ती मंहगाई में दो से ज्यादा बच्चे यानि ज्यादा जिम्मेदारिया और आर्थिक बोझ। बड़ी संख्या ऐसे नवविवाहितों की है, जो सिर्फ एक बच्चे पर ही अपना परिवार सीमित कर लेते हैं। लेकिन दो और एक बच्चों पर थम रही परिवार की परिभाषा आने वाले दशकों में बच्चों को रिश्तों से अंजान कर देगी।

क्योंकि तब परिवार में न तो भाई-बहन होंगे और न ही बुआ, चाचा, मौसी, मामा जैसे दूसरे रिश्ते। ऐसे में बच्चे सामाजिक रूप से उतने व्यवाहारिक नहीं होंगे, जितने संयुक्त परिवार में रहने वाले।

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