कुछ बातें जो संभ्रात इतिहास में दर्ज नहीं की जा सकेंगी

ये दिशा सम्मान आत्महत्या की ऒर जाती है


माफ़ कीजियेगा मगर बहस के इस बौड़म माहौल में बोले बिना रहा नहीं जाता! और खुद की चुप्पी अपराध लगने लगती है! भारतीय मिडिया का जो चेहरा आपको बड़ा क्रांतिकारी लग रहा है वो जाने क्यूँ मुझे विद्रूप दीखता है महसूस करता हूँ की बड़े बड़े मिडिया संस्थान कैसे बचकाने लोगो के ज़रिये अपनी पत्रकारिता चला रहे हैं! ज़ाहिर सी बात है स्कुल से निकल कर कुछेक महीने पत्रकारिता का कोर्स कने वाले युवा सब तो हो सकते हैं मगर समाज शास्त्री कतई नहीं और उनका समाज शास्त्री होना या ना होना कोई मायने भी नहीं रखता अगर वो महज़ यथावत न्यूज़ देते मुश्किल उनका व्यूज़ देना पैदा करता है! कई पत्रकार तो टीवी पर आर या पार की लडाई शुरू कर देते हैं बिना किसी तार्किक आकड़ों के वैसे गलतियां केवल रिपोर्टरों की नहीं गलतियां तो हमेशा ही समाजशास्त्रियों और विचारकों से ही शुरू होती है! आप ध्यान से देखें तो अधिकांश जन सरोकारों वालों मुद्दों पर समाजशास्त्रिय अध्ययन उपलब्ध नहीं कोई आकड़ा नहीं साड़ी बातें हवा में होती आई हैं तो ज़ाहिर है आधुनिकता और प्रगतिशीलता की आड़ में हर कोई खुद की रोटी सकने निकलेगा!
अगर आजके बलात्कारमय टी वी सेट की बात करें तो दो धाराएँ बड़ी स्पष्ट नज़र आ रही हैं एक तो आसाराम-भगवत-अबू आज़मी और जमात इस्लामी की स्टीरियो टाईप तो दूसरी तथाकथित 'अत्याधुनिक नारीवादी'  मैंने तथाकथित शब्द इस लिए लगाया है क्युकी मेरी समझ से दूसरी जमात भी पहले के सामानांतर है और एक भाव से वो उसी विचारधारा को पुष्ट करती है जिसकी पैरोकारी पहले करते रहे हैं 
एक तर्क बड़े जोरशोर से उठाया जा रहा है की हमारे देश में औरतों को माँ का दर्ज दिया गया है (मुझे बताओ की किसी दुसरे देशों में औरतों को बाप का दर्ज दिया गया हो) हमारे देश में औरतों की पूजा होती है (बलात्कार भी उसी संस्कृति का हिस्सा है जिसमे नारी को पूजा जाता है) हमें औरतों की इज्ज़त करनी चाहिए (दुसरे शब्दों में इज्ज़त से खेलना गलत बात है)
ऐसे तमाम खोखले तर्क जो एक या दुसरे अर्थों में बलात्कार को महिमा मंडित करते हैं पर जोर दिया जा रहा है! कुछ लोग अरब देशों के जैसे बेसिर पैर के संकी कानूनों की पैरवी करते चले आ रहे हैं! बलात्कारियों को कैसे मारो इस पर बाकायदा बहस चल रही है! पिछली पोस्ट भी अवश्य पढ़े 
 एक महिला वैज्ञानिक ने कहा की लड़की को आत्म समर्पण कर देना चाहिए था उसका जीवन बच जाता जवाब में मिडिया और तथाकथित अकल्मंदो ने इतना लानत मलामत किया की उनका वास्तविक विचार क्या था वो लुप्त होगया! उस महिला के बयान का अर्थ कुछ भी हो मगर विरोध का अर्थ साफ़ नज़र आया, "आपका कौमार्य आपके जीवन से ज्यादा कीमती है इसलिए आपको कौमार्य बचाना है जान नहीं......क्यों इज्ज़त का सदका जान है " कुल मिला कर हम अपनी लड़कियों को सम्मान और इज्ज़त के लबादे से छिपा देना चाहते हैं! हमने बराबरी की बात भूल कर भी नहीं की हमने समावेशी समाज की बात गलती से भी मुंह से नहीं निकलने दी 
हमने व्यवस्था के प्रश्न नहीं उठाये क्योंकि हमने तय कर लिया है की हम अपनी बेटियों को मारने के नए अस्त्र उपयोग करेंगे हम सम्मान आत्म-हत्याओं को पुनः जागृत करेंगे आखिर हमारी 'वीर' स्त्रियों ने इतिहास में जौहर (स्वय को जलाकर मार डालना) कर के सम्मान आत्महत्याएं की हैं तो हम उस परंपरा को छोड़ कैसे सकते हैं 
हमने बच्चियों को दूध में डूबा कर मारा अब तकनिकी इस्तेमाल से मारते हैं हमने बेटियों का कम उम्र में ब्याह करके उन्हें 'बिगड़ने' से बचाया है (कम उम्र में प्रसव के कारण वो सम्मानजनक मौत मर गयी) हमने उन्हें आजतक अपना यौन साथी चुनने के अधिकार से वंचित रखा है उनकी ससम्मान हत्याएं की है! हम अपनी बेटियों के कौमार्य की मरम्मत करवा कर ब्याह करवाते हैं हम बहुओं के कौमार्य चेक करवाते हैं!
तो बलात्कार (मुंह काला) करवा कर घर कैसे लौटने देंगे उन्हें मर जाना होगा क्यूंकि इज्ज़त लुटवा कर वो घर नहीं आ सकती! इस लिए लड़कियों को हर हाल में अपने कौमार्य सुरक्षित रखना है अपनी जान देकर भी!
और बलात्कारियों को फांसी दे देना होगा क्युकी वो हमारी स्वय की कुंठा को खुलेआम प्रदर्शित कर देते हैं! हमें एक सख्त समाज बना देना होगा जहाँ यौन क्रीड़ायें जानलेवा अपराध साबित हो सकें! लड़कियों को घर से बहार नहीं निकलने दो या लडको को नहीं निकलने दो! लड़के और लड़कियों को दो अलग ग्रहों पर भेज दो
क्योंकि हम एक सामान्य समाज नहीं हम इज्ज़त वाले लोग है

छि घिन नहीं आती ऐसे सम्मान से .....................................................
(अगली बार सम्मान आत्म हत्या(honour suicide) और कौमार्य-मरम्मत (hymen repair) की संकल्पना  पर गंभीरता से लिखूंगा)

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