कुछ बातें जो संभ्रात इतिहास में दर्ज नहीं की जा सकेंगी

प्याज से बड़ा है देश


गणतंत्र दिवस मना लिया गया!
खुश होने की हजारो वजहें हैं तो दुखी होने की लाखो ! आप खुश होंगे तो आपको सकारात्मक और दुखी होंगे तो नकारात्मक इंसान समझा जाएगा! इस लिए मई ख़ुशी और दुःख का प्रदर्शन नहीं करने जा रहा 
दिन भर सोया जम के सोया! ये प्रतिक है हमारी चेतना का की हर गणतंत्र दिवस के बाद हमारा लोकतंत्र अधिनायकवाद की तरफ बढ़ता ही जाता है! मानवाधिकार कुचलने के लिए आम जनता तैयार होती जाती है! चापलूसी के लबादे में थोडा और मलमल लग जाता है लोकतंत्र के कुरते से कुछ और पैवंद नोच लिए जाते हैं! हमारा लोकतंत्र सोने लगता है! लोगों के दिमाग में अधिनायक वादी सुगबुगाने लगते हैं!  जनता के भीतर ही कुछ लोग समाज के दुश्मन के बतौर खड़े कर दिए जाते हैं! जाति-धरम और क्षेत्र की राजनीति जोर पकड़ लेती है!तो बेहतर है के इस दिन को सोया जाए कम से कम अपना दिमाग इस मुगालते में तो रहे की अभी लोकतंत्र परिपक्व्य नहीं हुआ है सो हो जाएगा!  वैसे ये मुगालता है बड़ी काम की चीज़ जब जैसी स्थिति पैदा करना चाहो कर लो अपने देश के लोग इसमें माहिर हैं! अभी हमारा देश अमरीके की बराबरी किये जारहा है दो साल पहले अस्सी प्रतिशत लोग बीस रूपये से भी कम पर जीवन गुज़र रहे थे! अब दोनों बात सरकार खुदे कहती है किस को  माने किसको नहीं का सवाल ही नहीं उठता जितना मानने को कहा जाए मान लिए आपका भी भला है और देश का भी 
हमारे देश में सबसे बेहतर यही बात है की व्यवस्था जैसा तय करती है सब वैसा ही होता है! अब देखिये जब मुस्लिम आतंकवाद की बात थी तो लगता था की मुसलमान मतलब आतंकवादी किसी घर में दाल जली की दादी अम्मा निकल आई गरियाते की हरामी आतंकवादियों ने में आर डी एक्स डाल दिया! हमने माना हाँ भाई ऐसा होगा फिर दौर आया आतंकी लड़कों के बरी होने का सिलसिला तमाम गैर कश्मीरी आतंकवादी बरी भी हो लिए! और फिर दौर आया हिन्दू आतंकवाद का लो जी सब में हिन्दू आतंकवादी शामिल  साथ में ताल देते हुए चल रहा है भारश्त्राचार का मुद्दा घोटाले पर घोटाला (विपक्ष चिल्लाता रहा अब उस का ज़माना कितना पाक साफ़ था यभी कोई याद करने की चीज़ है क्या) यद्दुराप्पा जी उधर आई कैन सोल्ड एवेरी थिंग का राग अलाप रहे हैं पूछो तो कहत्ते हैं हनुमान चालीसा है बढ़िया है जी कोई सवाल करने की ज़रूरत नहीं! राजा जी ने मोबाइल का कुछ बेच दिया लोग पढ़ गए पीछे क्यों बेचा क्यों बेचा! हद हो गयी बताओ भाई बेचारे ने ख़रीदा नहीं बेचा है गरीबी आई तो बेच दिया! मिडिया बहुत दिन चुप रही क्योकि राजा बाबु की हालत को वो जानते थे की बेचारे के घर की हांड़ी में जाले लग गए थे सो मोबाइल बेच के बन्दे ने चूल्हा जलवाया है 
कोम्मान वेल्थ के लिए शिला आंटी ने ज़रूर हवा पानी बंधा था वरना बनाना रिपब्लिक की इमेज बननी तय थी! अब जी भगवन शिला जी के साथ है तो हल्लाहा मचाने से क्या होगा! कलमाड़ी चाचा की भी खुबे छिछलेदारी हुयी ---मगर अब सब सो गए! जे पी सी या एस पी सी का हल्ला मचा रहे लोग अकल्मन्द हैं सांप निकल जाने पर लकीर नहीं पिटते आखिर गेम ख़तम हो गया तो इन्होने ने भी अपनी मांग ख़तम कर दी! मतलब जो ऐतिकता नैतिकता अधिकार वाधिकार की बातें थी उनको गेम के समापन में संपूर्ण कर दिया 
देश में मंहगाई बढ़ गयी है तो इसमें नया क्या है! मंदिर दरगाहों का चढ़ावा कम कर दो भगवन को कम मिलेगा  तो अपने आप मंहगाई में कमी आएगी! शरद काका के पीछे क्यों पड़े हो भाई! मारना है तो किसानो को मारो साले देस-द्रोही अनाज पैदा ही नहीं करते तो मंहगाई तो बढ़नी ही है!   
खैर जी सत्ता पक्ष और विपक्ष को नया मुद्दा चाहिए था गणतंत्र दिवस आया तो लाल चोंक याद आया 
सवाल देश की इज्जत का था सो अपने घर पर कभी तिरंगा देख कर गुटखे की पाउच समझने वाले भी झंडा वहीँ फहराएंगे की रत लागाये बैठ गए! सारा मुद्दा गया पानी में 
अब टी वी पर बीवी से एक ही बात हो रही थी की तिरंगा और लाल चौक बीबी बोली रे निगोड़े प्याज़ महोदय बोले प्याज़ से बड़ा है देश! पहले लाल चौक तब कडाही 
अब जहाँ बात देश की हो तो कौन बिच में प्याज की बात करे नमक रोटी गयी तेल लेने! अगर ऐसी बात करी तो देश द्रोही कहे जाने से बेहतर है छुपे रहो सो जी बेचारी पत्नियों चुप और महोदय का कामो बन गया

अब मेरे पास बीबी है नहीं जो प्याज की बात करे और न ही अपन इत्ता बड़ा देश भक्त है जो लाल चौक जाने की हिम्मत  करे तो भाई मई सोता हूँ आप को मन में आये कीजिये अपने पिता श्री का कुछ जाने से रहा !
जय गणतंत्र 

1 टिप्पणी:

anjule shyam ने कहा…

तमाम मुद्दों ने दिमाग को हेंग कर रखा है...
हर तरफ अँधेरा...किस मुंह से बोलेन....
- की बोलो की लैब आज़ाद हैई
लाल चौक पर आज वही संस्था झंडा फहराने के लिए हंगामा कर कर रही है जिसने आने मुख्यालय पर..कभी...खुद तिरंगा नहीं फहराया...
दिल बच्चा बन के सवाल करता है - हम लाल चौक पर तिरंगा क्यों नहीं फहरा सकते..?
मेरे पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है....
उसे समझाने के लिए हिस्ट्री की चाटी हुई तमाम किताबें नाकाफी हैं....
बहुत गड़बड़ झाला है///
बेहतर है के इस दिन को सोया जाए कम से कम अपना दिमाग इस मुगालते में तो रहे की अभी लोकतंत्र परिपक्व्य नहीं हुआ है सो हो जाएगा!