जब उसने मेरी ओर ध्यान नही दिया
तो
मैंने भी उससे किनारा कर लिया
क्या यही प्यार हैं ...
उसे मेरी कविताओ से प्रेम था
और
मैं उस पर रोज एक कविता लिखता था
लेकिन
यह बात वह नही जानती थी
फिर
जब मैं उससे मिला
तब तक वह मेरी कविताओ कों पढ़ते पढ़ते
मेरी कविताओ का शब्द बन गयी थी
मुझे मालूम था
वो मेरी आत्मा के अमृत से भर गयी थी
तब मैंने उससे कहा
मुझे आपसे मोहब्बत हैं
मैं आपका नाम लेते हीं -एक कविता लिख लेता हूँ
संसार के सारे फूलो की सुगंध में डूब जाता हूँ
मैं खुद चांदनी सा प्रकाश बन जाता हूँ
पर
उसके भी कुछ सिद्दांत थे
उसे बस ...मेरी कविताओ से मोहब्बत थी
तुम चेतना की अचेतना सी ..
हो गयी हो शांत ,मौन ,निराकार
भूल निज व्यैक्तित्व का भौतिक आधार
फिर भी
तुम्हारा मुझे रहता नित आभास
तुम्हारे मन में सुरक्षित हैं
मेरे लिये अब भी प्यार
मुझ पर यह हैं तुम्हारा आभार
जानता हूँ
ध्यान में तुम तल्लीन
न तुम्हें अपनी सुध हैं
न मुझसे हैं पहले जैसी
गहरी अब जान पहचान
शून्य में चलता तुम्हारा व्यवहार
लेकिन
मुझे भी तो दो ...
अपनी आंच से
या
प्रकाश से ..
बूंद भर ही सही पर
एक चिर परिचित अहसास
शायद जागता जो निरंतर हैं
मेरा चेतन ....
चाहिए उसे भी
अपने जीने के आनंद के लिये
चिंतित एक मधुर रस का लेपन
लग जाती हैं
इसीलिए .....
एक अनचाहे अगन में तपी मेरी लगन
नहीं चाहता मय
इच्छाओं का धन
फिर भी
मानता नही मेरा मन
एक खुश्बू सी
बसी हुवी हो मुझमे
हो वही तुम एक सुमन
जग कों देखना पुण्य हैं
मगर उसे छूकर जीना पाप
समझ में नही आता
जीवन अमृत हैं या अभिशाप
हाँ मै वह महा सिन्धु नही ..
जिसके लिये तुम बह रही हो निरंतर
एक बिंदु हूँ
बिंदु ...बिंदु ,बूंद ...बूंद में
भी पर हैं कयों ....
नदी से सागर तक की दूरी जितना अंतर
हो गयी हो शांत ,मौन ,निराकार
भूल निज व्यैक्तित्व का भौतिक आधार
फिर भी
तुम्हारा मुझे रहता नित आभास
तुम्हारे मन में सुरक्षित हैं
मेरे लिये अब भी प्यार
मुझ पर यह हैं तुम्हारा आभार
जानता हूँ
ध्यान में तुम तल्लीन
न तुम्हें अपनी सुध हैं
न मुझसे हैं पहले जैसी
गहरी अब जान पहचान
शून्य में चलता तुम्हारा व्यवहार
लेकिन
मुझे भी तो दो ...
अपनी आंच से
या
प्रकाश से ..
बूंद भर ही सही पर
एक चिर परिचित अहसास
शायद जागता जो निरंतर हैं
मेरा चेतन ....
चाहिए उसे भी
अपने जीने के आनंद के लिये
चिंतित एक मधुर रस का लेपन
लग जाती हैं
इसीलिए .....
एक अनचाहे अगन में तपी मेरी लगन
नहीं चाहता मय
इच्छाओं का धन
फिर भी
मानता नही मेरा मन
एक खुश्बू सी
बसी हुवी हो मुझमे
हो वही तुम एक सुमन
जग कों देखना पुण्य हैं
मगर उसे छूकर जीना पाप
समझ में नही आता
जीवन अमृत हैं या अभिशाप
हाँ मै वह महा सिन्धु नही ..
जिसके लिये तुम बह रही हो निरंतर
एक बिंदु हूँ
बिंदु ...बिंदु ,बूंद ...बूंद में
भी पर हैं कयों ....
नदी से सागर तक की दूरी जितना अंतर

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