अक्सर बड़े बड़े लोगों की चर्चो में छोटे छोटे लोगों के बड़े बड़े मुद्दे हाशिये पर चले जाते है! महिला आरक्षण बिल के राज्यसभा में पास होने के बाद जहाँ एक तरफ खुशियों का माहोल है तो दूसरी तरफ बहस जारी है की आखिर इस आरक्षण का परिणाम क्या होगा! मगर चाहे जो हो इस आपाधापी में हम कृषकों और कृषि मजदूरों को भूल चुके हैं। थोडा पीछे जाएँ तो पिछले संसदिये चुनाव में उत्तर प्रदेश के संसदीय क्षेत्र रायबरेली के दो प्रखण्डों क्रमश: हरचन्दपुर और महाराजगंज के गांवों की दिवारों पर उकेरे गये नारों को याद कर आश्चर्य ही होता है।
इन नारों की बानगी देखें ''महिलाओं को किसान का दर्जा जो दिलायेगा, वोट हमारा पायेगा'' और ''जितनी होगी भागीदारी, उतनी होगी हिस्सेदारी''। वास्तव में नारी सशक्तिकरण और महिला आरक्षण् के झूंनझूनों के बीच ये जन-नगाडा हमारी आजादी और लोकतांत्रिक परिपक्वता की स्पष्ट पहचान है। ये सही है कि हमने अपनी आजादी के साथ साथ महिलाओं के अधिकार आंदोलन को गंभीरता से लिया है और जुझारू नारीवादियों के संघर्षों ने अपना रंग दिखाया है। जिसके फलस्वरूप कई कानून अमल में आये। मगर आज जब समाज महिलाओं को सशक्त स्थिति में पाता है तो उसकी शिकायत होती है कि पुरूषों को नारियों की प्रताड़ना से कौन बचाये शायद यही वजह है कि पुरूषों को नारियों के शोषण से बचाने के लिये तथाकथित आंदोलन सुगबुगा रहा है और अब तो कई संस्थाएं इस पर कार्य करने लगी हैं।
मगर सवाल उठता है कि क्या वास्तव में महिलायें स्वछंद या स्वतंत्र हैं। अगर हां तो क्या परिसम्पित्तयों पर उनका अधिकार है या क्या वो स्वयं की अर्जित आय को व्यय करने का अधिकार रखती हैं और क्या उनके श्रम का अनुदान उन्हें मिल पाता है।
कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमति सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र से महिलाओं ने जो किसान होने की मान्यता मांगी है उसका अपना कारण भी है और आंदोलनों का इतिहास भी। शायद आपको ताज्जुब लगे मगर सच तो ये है कि जब भी जमीन और पट्टे की बात होती है तो महिलाओं को परिवार का मुखिया माना जाता है। दिल्ली की सल्तनत में रजिया सुल्ताना को जिस संकीर्णता का शिकार होना पड़ा था वो आज भी जारी है और लैंगिक असमानता का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है कि महिलाओं को किसान क्रेडिट कार्ड जैसी योजना का कोई लाभ नहीं मिलता सीधे सीधे कहें तो औरतों को किसान नहीं माना जाता। मार्था चैन के 1991 सर्वेक्षण परिणाम में साफ है कि महिलाओं की मालिकाना भूमि भागीदारी लगभग नगन्य है। यही अध्ययन स्पष्ट करता है कि महिलाओं का भूमि उत्तराधिकार मात्र 13 प्रतिशत है।
दुखद ये है कि भूमि पर महिलाओं की भागीदारी का प्रश्न 1946-47 के बंगाल के तेभागा आंदोलन से ही उठ खड़ा हुआ था और अपने परिवार के पुरूषों के साथ भूमिपतियों से लड़ती हुई महिलाओं ने घरेलु हिंसा और भूमि अधिकार की बात छेड़ी थी। इस आंदोलन में चुल्हे चौके छोड़ दरातों और झाडु लेकर बाहर निकली महिलाओं ने अधिकार और सम्मान का दर्शन तो समझा मगर परिवार के भीतर की स्थितियों के परिर्वतन नहीं समझ सकीं फलस्वरूप आंदोलन की समाप्ति के बाद पुन: अपने परिवार के पुरूषों के अधीन हो गई। कुछ ऐसा ही तेंलंगाना आंदोलन के बाद हुआ भूमि अधिकार के संघर्षों में महिलाओं ने बढ़ चढ़ कर अपनी भूमिकाओं का निर्वाह किया मगर घरेलु मोर्चे पर पुन: मात खा गई। मगर जब 1978 में छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के नेतृत्व में मठ के विरूध्द बोधगया भूमि आंदोलन में जब महिलाओं ने अपने सरोकार की बातें की तो कई प्रकार के विरोध हुए मगर बातचीत और आंदोलनात्मक आवश्यकताओं ने आखिर मार्ग प्रशस्त किया। घर के पुरूषों ने जब कहा कि जमीन किसी के नाम हो इससे क्या फर्क पड़ता है तब औरतों ने पूछा कि तुम विरोध क्यों करते हो। जमीन हमारे नाम होने दो।लेकिन तब जिला अधिकारी ने पट्टे महिलाओं को देने से इंकार कर दिया उन्हें महिलाओं के परिवार प्रमुख की भूमिका पर आपत्ति थी। वो पट्टे किसी नाबालिग पुरूष के नाम करने को तैयार थे। मगर महिलाओं के नाम कतई नहीं। अब महिलाओं को वाहिनी के कार्यकर्ताओं का पूरा समर्थन था और आखिर में सरकार की अधिसूचना के माध्यम से 1983 में जमीन के पट्टे महिलाओं के नाम भी किये गये। भूमि अधिकार के मामले मे महिलाओं की विश्व में पहली जीत थी। बोधगया आंदोलन न केवल भूमि अधिकार के लिये महत्वपूर्ण है बल्कि कार्य बंटवारे और वित्तरहित श्रम का प्रश्न सामाजिक समानता के समक्ष लाने का संघर्ष भी है। यहां उल्लेखनीय है कि इस इस भूमि आंदोलन का प्रमुख नारे ''जमीन किसकी जोते उसकी'' पर प्रश्न उठाया कि जमीन जो बोये या काटे उसकी क्यों नहीं। वास्तव में इसके पीछे भी वजह थी कि आंदोलन के पुरूष साथियों ने महिलाओं से पूछा था कि अगर जमीन वो लेंगीं तो जोतेगा कौन जवाब में महिलाओं ने कहा था कि अगर जमीन पुरूष लेंगें तो उन्हें बोयेगा या काटेगा कौन ? तो फिर काम का परितोषिक अथवा मालिकाना हक क्यों नहीं। महिलायों के भूमि अधिकार पर बिल का एक ड्रामा पहले भी हो चूका है मगर अफ़सोस ये महज़ ड्रामा ही रहा वास्तव में आज भी महिलाएं कृषि भूमि उतराधिकार प्राप्त नहीं कर सकती क्योकि ये अभी तक विधिसम्मत हुआ ही नहीं! शाहबानो मामले में इस्लाम को खतरे में बता रहे मुस्लिम पहरुआ शरियत की इस अनदेखी (इस्लाम महिलायों के भूमि अधिकार को अनिवार्य करता है) कर रहे हैं और २००५ में मुस्लिम परसनल ला बोर्ड ने प्रधान मंत्री को मात्र एक ज्ञापन देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली! ज़ाहिर खेत और किसान जब अप्रासंगिक हुए जारहे हैं तब इन अधिकारों का क्या फायदा! खेत और ज़मीन आज पिछड़ेपन की निशानी बनते जारहे हैं तब इन पर बात कौन करे मगर सच तो यही है की देश की बहुसंख्यक महिला आबादी अपने भूमि अधिकार की बाट जोह रही है और दुखद ये है की उनकी आवाज़ संसद तक पहुचने वाला कोई नहीं!
तो क्या महिला आरक्षण महज़ ड्राइंग रूम तक ही सीमित रहेगा और आँगन वाले घर अछूते रह जायेंगे अन्तरिक्ष तक की उड़न वाली लड़कियां(भले वो अमरीकी नागरिक हों) हिंदुस्तान की असली पहचान है और क्या हिंदुस्तान की राजनीति पर अब इलीट पूरी तरह हावी हो गए और क्या खेत ज़मीन बैल हल जैसे शब्दों को भूल जाना बेहतर है या सोनिया गाँधी ज़मीन पर औरतों के अधिकार पर ध्यान देंगी
मगर सवाल उठता है कि क्या वास्तव में महिलायें स्वछंद या स्वतंत्र हैं। अगर हां तो क्या परिसम्पित्तयों पर उनका अधिकार है या क्या वो स्वयं की अर्जित आय को व्यय करने का अधिकार रखती हैं और क्या उनके श्रम का अनुदान उन्हें मिल पाता है।
कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमति सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र से महिलाओं ने जो किसान होने की मान्यता मांगी है उसका अपना कारण भी है और आंदोलनों का इतिहास भी। शायद आपको ताज्जुब लगे मगर सच तो ये है कि जब भी जमीन और पट्टे की बात होती है तो महिलाओं को परिवार का मुखिया माना जाता है। दिल्ली की सल्तनत में रजिया सुल्ताना को जिस संकीर्णता का शिकार होना पड़ा था वो आज भी जारी है और लैंगिक असमानता का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है कि महिलाओं को किसान क्रेडिट कार्ड जैसी योजना का कोई लाभ नहीं मिलता सीधे सीधे कहें तो औरतों को किसान नहीं माना जाता। मार्था चैन के 1991 सर्वेक्षण परिणाम में साफ है कि महिलाओं की मालिकाना भूमि भागीदारी लगभग नगन्य है। यही अध्ययन स्पष्ट करता है कि महिलाओं का भूमि उत्तराधिकार मात्र 13 प्रतिशत है।
दुखद ये है कि भूमि पर महिलाओं की भागीदारी का प्रश्न 1946-47 के बंगाल के तेभागा आंदोलन से ही उठ खड़ा हुआ था और अपने परिवार के पुरूषों के साथ भूमिपतियों से लड़ती हुई महिलाओं ने घरेलु हिंसा और भूमि अधिकार की बात छेड़ी थी। इस आंदोलन में चुल्हे चौके छोड़ दरातों और झाडु लेकर बाहर निकली महिलाओं ने अधिकार और सम्मान का दर्शन तो समझा मगर परिवार के भीतर की स्थितियों के परिर्वतन नहीं समझ सकीं फलस्वरूप आंदोलन की समाप्ति के बाद पुन: अपने परिवार के पुरूषों के अधीन हो गई। कुछ ऐसा ही तेंलंगाना आंदोलन के बाद हुआ भूमि अधिकार के संघर्षों में महिलाओं ने बढ़ चढ़ कर अपनी भूमिकाओं का निर्वाह किया मगर घरेलु मोर्चे पर पुन: मात खा गई। मगर जब 1978 में छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के नेतृत्व में मठ के विरूध्द बोधगया भूमि आंदोलन में जब महिलाओं ने अपने सरोकार की बातें की तो कई प्रकार के विरोध हुए मगर बातचीत और आंदोलनात्मक आवश्यकताओं ने आखिर मार्ग प्रशस्त किया। घर के पुरूषों ने जब कहा कि जमीन किसी के नाम हो इससे क्या फर्क पड़ता है तब औरतों ने पूछा कि तुम विरोध क्यों करते हो। जमीन हमारे नाम होने दो।लेकिन तब जिला अधिकारी ने पट्टे महिलाओं को देने से इंकार कर दिया उन्हें महिलाओं के परिवार प्रमुख की भूमिका पर आपत्ति थी। वो पट्टे किसी नाबालिग पुरूष के नाम करने को तैयार थे। मगर महिलाओं के नाम कतई नहीं। अब महिलाओं को वाहिनी के कार्यकर्ताओं का पूरा समर्थन था और आखिर में सरकार की अधिसूचना के माध्यम से 1983 में जमीन के पट्टे महिलाओं के नाम भी किये गये। भूमि अधिकार के मामले मे महिलाओं की विश्व में पहली जीत थी। बोधगया आंदोलन न केवल भूमि अधिकार के लिये महत्वपूर्ण है बल्कि कार्य बंटवारे और वित्तरहित श्रम का प्रश्न सामाजिक समानता के समक्ष लाने का संघर्ष भी है। यहां उल्लेखनीय है कि इस इस भूमि आंदोलन का प्रमुख नारे ''जमीन किसकी जोते उसकी'' पर प्रश्न उठाया कि जमीन जो बोये या काटे उसकी क्यों नहीं। वास्तव में इसके पीछे भी वजह थी कि आंदोलन के पुरूष साथियों ने महिलाओं से पूछा था कि अगर जमीन वो लेंगीं तो जोतेगा कौन जवाब में महिलाओं ने कहा था कि अगर जमीन पुरूष लेंगें तो उन्हें बोयेगा या काटेगा कौन ? तो फिर काम का परितोषिक अथवा मालिकाना हक क्यों नहीं। महिलायों के भूमि अधिकार पर बिल का एक ड्रामा पहले भी हो चूका है मगर अफ़सोस ये महज़ ड्रामा ही रहा वास्तव में आज भी महिलाएं कृषि भूमि उतराधिकार प्राप्त नहीं कर सकती क्योकि ये अभी तक विधिसम्मत हुआ ही नहीं! शाहबानो मामले में इस्लाम को खतरे में बता रहे मुस्लिम पहरुआ शरियत की इस अनदेखी (इस्लाम महिलायों के भूमि अधिकार को अनिवार्य करता है) कर रहे हैं और २००५ में मुस्लिम परसनल ला बोर्ड ने प्रधान मंत्री को मात्र एक ज्ञापन देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली! ज़ाहिर खेत और किसान जब अप्रासंगिक हुए जारहे हैं तब इन अधिकारों का क्या फायदा! खेत और ज़मीन आज पिछड़ेपन की निशानी बनते जारहे हैं तब इन पर बात कौन करे मगर सच तो यही है की देश की बहुसंख्यक महिला आबादी अपने भूमि अधिकार की बाट जोह रही है और दुखद ये है की उनकी आवाज़ संसद तक पहुचने वाला कोई नहीं!
तो क्या महिला आरक्षण महज़ ड्राइंग रूम तक ही सीमित रहेगा और आँगन वाले घर अछूते रह जायेंगे अन्तरिक्ष तक की उड़न वाली लड़कियां(भले वो अमरीकी नागरिक हों) हिंदुस्तान की असली पहचान है और क्या हिंदुस्तान की राजनीति पर अब इलीट पूरी तरह हावी हो गए और क्या खेत ज़मीन बैल हल जैसे शब्दों को भूल जाना बेहतर है या सोनिया गाँधी ज़मीन पर औरतों के अधिकार पर ध्यान देंगी

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