भूख या दूसरी वजहों से रोते बच्चों को चुप कराने के लिए बने 'रबर निप्पल' को 60 साल पूरे हो गए हैं। इसके अच्छे-बुरे पहलुओं पर कई बहसें भी होती रही हैं, लेकिन अब भी बच्चे अगर चीखकर रोते हैं तो माँ का सहारा यही होते हैं।
आपको ये जानकर हैरानी होगी कि बच्चों के मुँह में डाला जाने वाला 'रबर निप्पल' बुजुर्ग हो गया है, लेकिन दुनियाभर में आज भी ये अपना वही पुराना काम ही कर रहा है, रोते मासूमों को शांत कराने का। भारत में इसे निप्पल कहा जाता है तो ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में इसे 'डमी' कहा जाता है। अमेरिकी बच्चों का ये 'बोबो' लैटिन अमेरिका में 'चुपोन' के नाम से जाना जाता है।
आखिर कैसे बना ये रबर निप्पल। ये किस्सा भी कम दिलचस्प नहीं है। अब तक जुटाई गई जानकारी के मुताबिक जर्मनी में काफी पहले से ही बच्चों को कपड़े में लपेटकर मीठी ब्रेड दी जाती थी। 1506 में बनाई गई एक पेंटिंग में तो बाकायदा यह दिखाया भी गया है।
लेकिन इसके करीब 300 साल बाद यानी 18वीं सदी आते-आते बच्चों की दुनिया के लिए कुछ और नए प्रयोग हुए। उस दौरान चुन्नू-मुन्नू जब भी रोते थे तो उन्हें चाँदी की चम्मच दे दी जाती थी। लेकिन ये सिर्फ धनी परिवार ही करते थे, आम लोग अपने मासूमों के आँसू मूँगे की मदद से थामते थे। माना जाता था कि चाँदी की चम्मच देने से बच्चों की किस्मत बेहतर होती है जबकि मूँगे को बेहतर सेहत से जोड़कर देखा जाता था।
लेकिन 19वीं सदी आते-आते बच्चों को स्तन जैसे आकार वाली मीठी गोली दी जाने लगी। आरंभ में इसका प्रयोग अमेरिका में हुआ फिर धीरे-धीरे यूरोप में भी। लेकिन बच्चे तो बच्चे ही हैं, धीरे-धीरे मीठी गोली से भी बोर होने लगे। बिस्तर, पालने या गोद में सवार बच्चे कभी रोते तो कभी मुँह में अँगूठा डाल देते।
इसी दौरान 1949 में जर्मनी में जबड़े के विशेषज्ञ विल्हेम बाल्टर्स और दाँतों के डॉक्टर आल्डोफ म्युलर ने बच्चों की तकलीफ काफी हद समझ ली। उसी साल इन दोनों ने बच्चों के लिए 'रबर निप्पल' बनाया। फिर क्या था, इसके आते ही बच्चे भी खुश हो गए और माँ-बाप भी।
मुलायम रबर की इस छोटी-सी चीज से बच्चे अपनी ही दुनिया में रहने लगे। उन्हें दूध पीने का एहसास भी होता रहा और दाँत निकलते समय होने वाली खुजली से भी काफी राहत मिली। वक्त बीतने के साथ बच्चों की दूध की बोतल का ढक्कन बनाने में भी इससे फायदा मिला। धीरे-धीरे इसके रबर और आकार में भी बदलाव आए और इसके नुकसान को लेकर बहस भी चलती रही।
अलग-अलग जगहों पर की गई रिसर्च के जरिये इससे होने वाले नुकसान भी सामने आए। अब भी कई डॉक्टरों का कहना है कि अगर बच्चा रबर निप्पल को चबाकर निगल ले तो उसे कान की बीमारी हो सकती है। लगातार कई घंटों तक इसे मुँह में रखने वाले बच्चों को बोलने में मुश्किल भी हो सकती है। कई बार बच्चे रबर निप्पल के चक्कर में अपने होंठ भी काट देते हैं, लेकिन ये समस्याएँ माता-पिता की अच्छी देखरेख से नहीं होतीं।
बहरहाल इसमें कोई शक नहीं कि बच्चों की तरह उम्रदराज होता निप्पल भी बेहतरी की तरफ बढ़ रहा है। ये रबर निप्पल का कमाल ही है कि इसकी रिसर्च पर जुटे वैज्ञानिक मजाक करते हुए कहते हैं कि ये अब तक पता नहीं चल सका है कि इससे किसे ज्यादा राहत मिलती है? बच्चों को, या बड़ों को।
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