कुछ बातें जो संभ्रात इतिहास में दर्ज नहीं की जा सकेंगी

कैद भारत उड़ान भर पायेग?

नाम में ही अर्थ की ध्वनि है. पुस्तक का नाम है ‘द केज्ड फ़ीनिक्स’. कवर पर इस नाम के नीचे लिखा है, कैन इंडिया फ्लाई. लेखक हैं, प्रो दीपांकर गुप्ता. पुस्तक के नाम का िहदी पर्याय होगा, िपजड़े में बंद अमर पंक्षी. इस शीर्षक के नीचे के तीन शब्द, पुस्तक का विषयवस्तु बताते हैं. भारत उड़ सकेगा? लेखक ने माना है कि भारत अमर पंक्षी का पर्याय है, जो िपजड़े में कैद है. यह िपजड़ा खुल पायेगा? यह पंक्षी उड़ पायेगा? यानी भारत जिन सवालों और चुनौतियों से घिरा है, उनसे निकल सकने की क्षमता भारत में है? आज के भारत के लिए इससे बड़ा और प्रासांगिक सवाल दूसरा नहीं है. और इस सवाल पर काफ़ी मंथन के बाद प्रो दीपांकर गुप्ता ने यह पुस्तक लिखी है.

यह पुस्तक लोकसभा चुनावों के आसपास छप कर आयी. पेंग्विन-वाइकिंग ने इसे छापा है. इसकी कीमत है, 550 रुपये. पुस्तक के बारे में भारत समेत दुनिया के सात विशिष्ट लोगों के विचार दर्ज हैं. पुस्तक में कुल चौदह अध्याय हैं. 316 पेजों की पुस्तक है.

प्रो दीपांकर गुप्ता देश के अग्रणी चिंतकों में से हैं. सामाजिक. ओर्थक सवालों पर विचार करनेवाले और लिखनेवाले. दुनिया की कई मशहर संस्थाओं में पढ़ा चुके हैं. मशहर पत्र-पत्रिकाओं में देश के गंभीर सवालों पर लिखते हैं. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फ़ार द स्टडी फ़ार सोशल सिस्टम में वह प्रोफ़ेसर हैं. इस पुस्तक का मूल सवाल है, आजादी और नयी ओर्थक नीतियों के बाद भी भारत पिछड़ेपन के िपजड़े में कैद क्यों है? इस प्रसंग को उन्होंने भिन्न-भिन्न वैचारिक सिद्धांतों और अनुभवजन प्रमाणों की कसौटी पर परखा है. क्यों भारत का तेज ओर्थक विकास भी देश को आगे नहीं ले जा पाता? भारत के मानव संसाधन की दुनिया में चर्चा हो रही है. फ़िर भी भारत एक्सेलेंस (उत्कृष्टता) की ओर नहीं बढ़ पा रहा? कैसे अभाव और संपन्नता साथ-साथ रह सकते हैं? वह सवाल उठाते हैं, इतनी प्रतिभा, मानवसंसाधन और खुले समाज के बावजूद भारत बढ़ (विकास) क्यों नहीं पा रहा?

चाय की दुकान से संसद-विधानसभाओं के गलियारों तक यह बहस होती रही है कि भारत का यह हाल क्यों ? हम तरह-तरह से भारत के पिछड़ेपन की व्याख्या करते हैं. सांस्कृतिक कारण, जाति के कारण, धर्म के कारण. पर प्रो गुप्ता का मूल सवाल है कि स्टेट (राज्य) का जो दायित्व है, उससे राज्य लगातार पीछे हट रहा है. शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, ऊर्जा जैसे क्षेत्र. इन क्षेत्रों में सरकार (स्टेट) ही निर्णायक काम कर सकती है. गरीबी के लिए गरीबों को ही हम दोष देते हैं. क्या यह सच है? बच्चे पैदा होते हैं, तो गरीबों पर तोहमत लगाते हैं. गांववालों को अधंविश्वासी कहते हैं.

प्रो दीपांकर गुप्ता मानते हैं कि ऐसे सारे आरोप गलत हैं. गहराई से समझने की जरूरत है. भारत के गरीब, देश के कोने-कोने में आज रोजगार के लिए भटक रहे हैं. पांच अरब (पांच बिलियन) टिकट हर साल रेलवे स्टेशनों से बिकते हैं. रोजगार की तलाश में गांव से निकले करोड़ों लोग अलग-अलग जाति, धर्म, परिवेश के लोगों के साथ रहते हैं, पर अपने अंधविश्वास को एक दूसरे पर थोपते नहीं. अलग-अलग परिवेश में, अपनी आस्था के साथ जीते हैं. परिवार बड़ा होता है क्योंकि उनकी जीवनशैली ही ऐसी है. वे विकास विरोधी मान्यताओं से भी बंधे नहीं हैं.

निश्चित रूप से इन गंभीर सवालों पर नये ढंग से प्रो गुप्ता ने गौर किया है. यही इस पुस्तक को विशेष बनाता है. वह कहते हैं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था लगातार गैर कृषि आधारित बन रही है. क्योंकि खेती लाभप्रद पेशा नहीं रही. आज ग्रामीण भारत की घरेलू आमद आधे से अधिक गैर कृषि क्षेत्रों से है. गांव के लोग बड़े पैमाने पर शहरों की ओर भागना चाहते हैं और शहर, गांव की इस आबादी को रख और संभाल पाने में सक्षम नहीं हैं. खेती के संबंध में प्रो दीपांकर गुप्त कहते है, जब तक यह उद्योग नहीं बनेगा, इससे लाभ संभव नहीं. जब तक, छोटे-छोटे किसान, छोटे-छोटे टुकड़े जोतते रहेंगे, तब तक खेती में सुधार संभव नहीं. जब बड़े पैमाने पर खेती होगी, तब उत्पादकता बढ़ेगी. इस तरह खेती पर निर्भर जनसंख्या भी कम होगी. लोग अपने छोटे प्लाट, बड़ी खेती करनेवालों को लीज पर देकर शहर जायें, तो वे अपने हालात बदल सकते हैं. पर यह सब करने के लिए प्रो गुप्ता की निगाह में राज्य को एक्िटविस्ट (सक्रिय) बनना होगा. ऐसा राज्य नहीं जो बुनियादी फ़़र्ज न निभाये. एक सक्रिय राज्य ही गरीबों को सामाजिक सुरक्षा देगा. समाज को भी पहल करनी पड़ेगी. अगर सार्वजनिक बहस के मुद्दे जाति, धर्म वगैरह ही रहेंगे, तो राजनीति का चरित्र नहीं बदलेगा. अगर हम सार्वजनिक बहस का एजेंडा तथ्यपरक कर दें, तो हालात बदलेंगे. प्रो गुप्ता मानते हैं कि ग्राम सभा के ऊपर किसी विधानसभा या संसदीय क्षेत्र में सिर्फ़ जाति के समीकरण से लोग सफ़ल नहीं होते. यह तथ्य जनता को समझाना चाहिए. वह कहते हैं कि जो जगह किसी एक खास जाति के वर्चस्व का इलाका है, वहां भी उस दबंग जाति की संख्या बीस फ़ीसदी से ऊपर नहीं है. जो जाति सबसे अधिक चुनाव क्षेत्र में है, तो वह बमुश्किल 12-15 फ़ीसदी हैं. पर आम धारणा बनी हई है कि जाति समीकरण से चुनाव जीता-हारा जाता है. यथार्थ इससे परे है. सार्वजनिक जीवन या राजनीति में जाति को ही मुद्दा बनानेवाले राजनीतिज्ञ या लोग इस मुद्दे के इर्द-गिर्द ही राजनीति करना चाहते हैं क्योंकि इसमें उन्हें लाभ है. लेखक ने बुद्धिजीवियों पर टिप्पणी की है. बुद्धिजीवियों ने देश को निराश किया है. अपनी भूमिका से विरक्त हो कर. सच को सच न बोलकर. यह सभी लोग जानते हैं कि भारत के हालात सुधारने के लिए आधारभूत चीजों को बेहतर करना जरूरी है. बेहतर स्कूल, अस्पताल, सड़क, ऊर्जा, आवास और पेयजल. सबको पता है कि इन क्षेत्रों में मामूली सुधार से भी लोगों के हालात बदल सकते हैं. पर यह भी कहने को, बोलने को कोई तैयार नहीं. प्रो दीपांकर गुप्ता मानते हैं कि मैंने खतरे की घंटी बजायी है, ताकि लोग और देश आगाह हों. वे कहते हैं कि आज दुनिया में चर्चा है कि भारत, विकास के क्षेत्र में नयी जगह बना रहा है. पर इंडियन ग्रोथ स्टोरी (भारत विकास कथा) के नारों से उन्होंने सावधान किया है. वह मानते हैं कि यह भ्रम उत्पन्न करनेवाला है. उनकी दृष्टि में स्टेट को बड़ी भूमिका निभानी होगी. वह याद दिलाते हैं कि यूरोप और अमेरिका में भी सरकारों ने सबको एक स्तर तक संपन्न और बेहतर बना दिया, तब निजीकरण का दौर चला. प्रो गुप्ता के अनुसार हम पश्चिम से यह पाठ सीख सकते हैं. उन्होंने भारत में उभरे मध्य वर्ग के यथार्थ से भी रू-ब-रू कराया है. ढहती ग्रामीण व्यवस्था पर विचार किया है. गांव कैसे टूट रहे हैं? शहरों के सामने क्या चुनौतियां हैं? शहरी गरीब किस हाल में हैं? ऐसी स्थिति में स्टेट का फ़र्ज क्या है? इन सब मुद्दों पर गौर करने के साथ-साथ प्रो गुप्ता ने एक अध्याय इस पर भी लिखा है कि डू वी डिजर्व आवर लीडर्स यानी क्या हमें ऐसे ही नेता चाहिए जो आज हैं?


मुल्क तराशना है तो इसको ज़रूर पढिये !

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