कुछ बातें जो संभ्रात इतिहास में दर्ज नहीं की जा सकेंगी

चुप्पी से युध्ध


(सबा अहमद पटना से हैं पटना वेमेंस कॉलेज से स्नातक और tata institute for social sciences टिस से स्नातकोतर हैं वर्तमान में ये चाइल्ड लाइन इंडिया फौन्डेशन में कार्यरत हैं, और चार शहरों (जम्मू, शिमला, और अन्य दो जो मुझे याद नही ) में इसके प्रोजेक्ट के सही सञ्चालन की जिम्मदारी इनकी है, उनसे मेरी मुलाक़ात की वजह भी हमारा काम था, अनेकों वजहों से हमारे संगठनों के बीच समस्याएँ थीं, वो हमारे शहर के प्रोजेक्ट पर शंका रखती थीं, सो उन्होंने मेरे काम के प्रति समर्पण (मजाक नही सच्ची) पर सवाल उठाते हुए एक लंबा चिटठा भेजा था, सो मुझे गुस्से जैसी कोई चीज़ का आना लाजिम था, वो आया भी, खैर जब वो हमारे शहर निरिक्षण पर आई तो मै उबल पड़ा और इतना बोला इतना बोला के सच कहों तो अब भी गले में दर्द है, मगर सबा की चुप्पी और सहजता ने मुझे शर्मिंदा कर दिया मैंने माफ़ी भी मांगी मुझे लगता है उन्होंने मुझे माफ़ भी कर दिया होगा मगर आत्मा पर बोझ बन गया मेरा बोलना मै जानता हूँ की मै जायज़ था मगर मै इतना बदतमीज़ कैसे हो सकता हूँ की सामने एक इंसान चुप चाप सुनता रहे और मै अपना गुस्सा उतारता रहूँ, मगर एक बात सबा जो फ़ैसला करती हैं सो पुरा करती हैं चाहे कुछ भी हो, उन्होंने जो फ़ैसला किया मुझसे करवाया और मै न चाह कर भी करता रहा हाँ साथ में मेरी बकबक भी जरी थी,) मुझे उम्मीद है सबा एक कामयाब सामाजिक कार्य व्यवसायी सिद्ध होंगी,


एक कविता सबा के नाम
तुम्हारी चुप्पी खलती है मुझे
मेरे असंतोष की ज्वाला
पर तुम्हारी चुप्पी की बर्फ़बारी
अक्सर भरी पड़ती है
सो, कुछ बोलो, कुछ तर्क वितर्क करलो
कुछ आक्षेप लगा दो मुझ पर
मै जनता हूँ की मेरा ये रंगीन आवरण
श्वेत नही, पवित्र नही
मगर बीती को बिसर तुम नए भविष्य की बात
कह कह कर मेरे अस्तित्व पर भरी बोझ मत डालो
ये कैसा आचरण है तुम्हारा की
दंभ और दर्प नही
तुम कोई संत नही, सो इतनी सादगी क्यों
अवरोध से भरी डगर को प्रशस्त मार्ग बताना
वो भी उतने विश्वाश से,
सच कहूँ ये तुम्हारी बुद्धिहीनता लगती है
अव्य्वाह्रिकता लगती है
मगर दीप्त चेहरा और ओजस्वी स्वर
जाने क्यूँ एक आस जागते हैं
वो आस जो मेरे संघर्षों की व्यथा में धूमिल हो गए हैं
और मेरे अंधेरे कमरे में रौशनी की ये महीन लकीर किसी
सूर्य के भांति चमक उठती है
और हर बार ना चाह कर भी तुम्हारी बातों पर विश्वाश
हुआ जाता है
क्षमा करो ! मेरी आत्मा मुझे कचोटती है तुम्हारे कारन
हाँ सच है मै डरता हूँ तुम्हारी चुप्पी से
तुम्हारे विश्वाश से, तुम्हारी आस से
सो, हे संयमित व्यक्तित्व! कुछ बोलो तर्क-वितर्क करो
और कुछ आक्षेप लगादो मुझ पर ..........................................

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