ख्वाब और लक्ष्य के फर्क को एक छोटे से सूत्र वाक्य के जरिये कई तरीके से समझाया जाता रहा है. सूत्र वाक्य यह कि- ख्वाब देखने के लिए अच्छी नींद की जरत होती है और लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बिना नींद लिये लगातार कोशिश की. इस सूत्र वाक्य को पकड़ कर कइयों ने दुनिया में मिसाल पेश की. बिहार के एक छोटे-से गांव से निकले संजय झा ने भी नायाब मिसाल पेश की है. दुनिया भर में उनकी चर्चा है.
दुनिया भर में मशहूर और अमीर लेखिका जेके रॉलिंग को अपना पहला उपन्यास पैसे की कमी के कारण रद्दी कागजों पर लिखना पड़ा था. ि स्लमडॉग मिलियनेयर से दुनिया भर में चर्चित हुए साउंड इंजीनियर रेसुल पुकुट्टी को कभी खाने के लिए छह-छह किलोमीटर तक पैदल जाना पड़ता था. जब साउंड इंजीनियर भी बन गये, तो दोस्तों से माइक उधार लेकर काम चलाते थे. आज दुनिया की मशहूर कंपनियां रेसुल से अपना साउंड उपकरण टेस्ट करवाने के लिए इंतजार करती हैं.घर्ष, लगन, धैर्य मेहनत और इच्छाशक्ति से लक्ष्यों को पा लेने की न जाने ऐसी कई कहानियां हैं. बिहार के एक नौजवान ने संघर्षो से उपजी सफ़लता की एक ऐसी ही नयी कहानी लिखी है. वह आज दुनिया के फ़लक पर एक चमकते सितारे की तरह छा गया है. नाम है संजय. मधुबनी जिले के एक छोटे-से गांव से निकल कर अमेरिका में सबसे ज्यादा वेतन पानेवाले अधिकारी. डॉ संजय कुमार झा को आज दुनिया भर में दूरसंचार की दुनिया में थ्री-जी सिस्टम का जनक माना जा रहा है. मोबाइल फोन की दुनिया का बादशाह भी. लेकिन एक समय था, जब संजय के घर में साधारण बेसिक फोन के लिए भी लंबी प्रतीक्षा और काफी फजीहत ङोलनी पड़ी थी. यह बात 36 साल पुरानी है. तब डॉ संजय झा सिर्फ संजय हुआ करते थे. उनके दादाजी को घर में फोन लगवाना था. इसके लिए उन्होंने टेलीफोन डिपार्टमेंट के दफ्तर में अरजी दी. उन्हें फोन का कनेक्शन नहीं मिला. आठ महीने के लंबे इंतजार के बाद जब घर में फोन लगा, तो नेटवर्क की व्यस्तता परेशानी ही देती. 36 साल गुजरने के साथ संजय ने एक लंबी यात्रा तय की है और अब उस पड़ाव पर हैं, जहां उनकी तरक्की और शोहरत से ईष्र्या करनेवाले दुनिया भर में हो गये हैं. डॉ संजय झा अमेरिका के सबसे ज्यादा वेतन पानेवाले सीइओ हैं और उनका सालाना पैकेज करीब 509 करोड़ रुपये है. यानी प्रतिमाह करीब 42 करोड़ रुपये से भी ज्यादा. संजय झा का गृह जिला मधुबनी और उनका गांव आज भी बहुत हद तक वहीं ठहरा हुआ-सा है.शेष पेज आठ पर509 करोड़..घंटों पैदल यात्रा के बाद गांव तक पहुंच, लेकिन उस गांव से निकले संजय इलाके की उन्हीं पगडंडियों से निकल कर आज दुनिया में आइकांस के तरह उभर रहे हैं. वह मोटोरोला के लिए काम करते हैं. यह एफटीएसइ -100 कंपनियों की सूची में शामिल है. आज से 20 साल पहले इस तरह की कंपनियों के सीइओ का वेतन अपने सर्वोच्च कर्मियों के वेतन का 17 गुना होता था, लेकिन संजय 75 गुना अधिक वेतन पा रहे हैं. उन्होंने मोटोरोला के कायाकल्प की प-रेखा तैयार कर दी है और उनकी प्रतिभा के कारण इसमें कुछ असंभव-सा भी नहीं लगता. 1963 में जन्मे डॉ संजय झा पिछले तीन दशक से विदेश में हैं. शु के 14 साल उन्होंने इंग्लैंड में गुजारे और अब अमेरिका में हैं. बैचलर ऑफ इंजीनियरिंग की पढ़ाई इंग्लैंड के यूनिवर्सिटी ऑफ लीवरपूल से हुई और उसके बाद इलेक््रिटकल इंजीनियरिंग का शिक्षण-प्रशिक्षण यूनिवर्सिटी ऑफ स्ट्रेटक्लाइड से. पढ़ाई के तुरंत बाद 1994 में क्वालकॉम नामक मोबाइल कंपनी में सीनियर इंजीनियर के तौर पर इन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत की. लेकिन प्रतिभा का सिक्का वहीं गहराई से जमा और पिछले साल जब वह उस कंपनी को छोड़ रहे थे, तो वह वहां के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर यानी मुख्य कर्ता-धर्ता थे. यह उनकी प्रतिभा, लगन और मेहनत का ही परिणाम था कि 1994 में ज्वाइन करने के मात्र तीन साल बाद 1997 में ही उन्हें उक्त कंपनी ने अपना वाइस प्रेसिडेंट बना दिया. इससे पूर्व 2005 में वह एसवाइए के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में शामिल हुए. इस आर्गेनाइजेशन में दुनिया भर के कुल 459 कारपोरेट मेंबर्स को लीड करने का तजुर्बा भी संजय के पास है. ऐसा भी नहीं कि कैरियर की धुन में संजय मानव से यंत्र की तरह बन गये. इस दौरान वह अपनी जड़ों-परंपराओं से जुड़े रहे. 28 साल की उम्र में यानी 1991 में इनकी शादी हुई. अब वह तीन बच्चों के पिता हैं. पिछले दिनों एक सर्वे में जब उनके सबसे ज्यादा वेतन पाने की बात सामने आयी, तो साइबर दुनिया में एक अलग कीर्तिमान स्थापित हुआ. सर्च इंजनों पर संजय झा के नाम का सर्च लगातार तेजी से बढ़ा. गुगल में सबसे ज्यादा सर्च हिट संजय झा के नाम से ही हुए. यह बात भी सामने आ चुकी है कि साइबर मीडिया की दुनिया में किसी एक खास पीरियड में एक नाम को सर्च करने का पुराना सारा रिकार्ड टूट गया. यह सब बिहार के ही संजय झा का कमाल है. यह अलग बात है कि उन्होंने 14 साल ब्रिटेन और 15 साल अमेरिका में गुजारे हैं, लेकिन 45 वर्षीय संजय के मन में संघर्ष, इच्छाशक्ति, लगन, मेहनत और ख्वाब और लक्ष्यों के फर्क को समझने की बुनियाद तो वहीं मजबूत हुई थी, मधुबनी के अपने उसी गांव में, अपने दादा के संघर्षो, परेशानियों को देख कर, जिन्हें एक बेसिक फोन लगाने में भी कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ा था.
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