कुछ बातें जो संभ्रात इतिहास में दर्ज नहीं की जा सकेंगी

ये मेरा रमजान वो तेरा रमजान

आज कोई चार बजे डीवीडी खरीदने पड़ोस के स्टेशनरी वाले के पास गया था! एक साईकिल सवार बड़ी मस्ती में क़ेरत कर रहा था आऊज़ो बिल लाहे ........आवाज़ में लरज़ और धमक दोनों थी, वो हाकर था एक अजीब मस्ती थी बंदे में अजीब अल्बलाहट, संयोग हम एक ही दुकान पर पहुचे उसने हुकम जारी किया जो ऑर्डर करना है अभी कर दो! रमजान में परेशान मत करना बीस रमजान को घर जाऊंगा और जाने क्या क्या........ जाने क्यूँ वो बंद मुझे मुझे प्रेमचंद की ईदगाह का हामिद लगा हामिद जो बड़ा होगया है कुछेक बाल पक गए हैं..... बैल हो अभी से बौरा रहे हो रमजान है अभी ईद नहीं आई मैंने बीच में टोक दिया. भाई साहब असली मज़ा तो रमजान का ही है सकुन के साथ खानदान और दोस्तों के बीच बैठना, इफ्तारी देना बुलाना जाना कहाँ कर पाते हैं साल भर..... नमाज़ कुरान पढ़ के सकुन मिलता है........साल भर तो बस गर्मी पसीना और चोरी बेईमानी में ही गुज़रता है.......साहिबे इमां ने जवाब दिया.............. अच्छा है लगे रहो मैंने खींसे निपोर दी सोचा नोवालिस ने सच ही तो कहा है “धर्म हृदयविहीन विश्व का ह्रदय और निष्प्राण की आत्मा की सांस है.”
शाम अचानक इन्टरनेट पर एक विडियो दिख गयी कतार में खड़े लोग अपनी मौत का इन्तेज़ार कर रहे हैं! और बड़ी ही निमर्मता से कुछ लोग उन्हें घुटने के बल खड़ा कर के गोलियों से उड़ा दे रहे हैं! मरने वाले और मारने वाले दोनों ही अल्लाह हो अकबर का नारा देते हैं, “कहीं एक शेइर दिखा था एक धमाका हुआ तन के चीथड़े उड़े जाने किसके मज़हब का भला हो गया” दिमाग को झटका याद आया मार्क्स ने कहा था धर्म लोगो के लिए अफीम है. 


(मैं कोई मार्क्स की खानदान से ना हो रहा मगर याद तो तब ताऊ की ही आई !प्रस्तुत घटना का सम्बन्ध जीवित इंसानो और विचारधाराओं से ही है! जिसको आपत्ति दर्ज करनी कर लो! )