कुछ बातें जो संभ्रात इतिहास में दर्ज नहीं की जा सकेंगी

क्यूँ ज़रुरी हैं न्यायिक हत्याओं का विरोध -01


एक सवाल जो कुछ अच्छे किस्म के इंसान पूछते हैं वो है की न्यायिक हत्याओं का विरोध क्यूँ ? किसी आतंकी या अपराधी को फांसी क्यूँ ना दी जाए ? कुछ लोग आतंकियों को फांसी देने से गुरेज़ करने पर राज़ी हो जाते हैं मगर दूसरे मामलों में जैसे की बलात्कार के आरोपी को फांसी नहीं देने की बात पर बिदक जाए हैं कुछेक अन्य अपराधों पर फांसी नहीं देने की बात पर राज़ी हो जाते हैं मगर आतंकी गतिविधियों में संलग्न लोगों के लिए फांसी से अलावा कोई और चारा नहीं मानते! कुछ ऐसे भी हैं जो रेयर आफ रेयरेस्ट केस में फांसी की वकालत करते हैं! तो कुछ सांप्रदायिक आधार पर फांसी जैसी सजाओं को सही या ग़लत ठहरा देते हैं
#saveBhuller
मानने और ना मानने की परंपरा अच्छी है मगर सवाल वही रुका होता है की फांसी ना देने के कौन से तर्क हैं मानवीय समाज वाला तर्क लोगों के गले नहीं उतरता, इसलिए ज़रुरी है की मौत की सजाओं का विरोध क्यूँ किया जाये! मौत की सजाओं के विरुद्ध जो सबसे अहम बात है वो है
१.      इन सजाओं का चयनात्मक होना. मैं देश द्रोही न्यायलय द्रोही कहे जाने के बगैर क्या ये पूछ सकता हूँ की आखिर वो कौन सी वजह है की हमारे देश की सौ फीसद न्यायिक हत्याएं मेहनतकश लोगों दलितों और अल्पसंख्यको (मुसलमान सिखों इसाईयों) के ही हिस्से क्यूँ आती हैं! (सन्दर्भ)  क्या अपराधी गुंडे और आतंकी महज़ यही हैं वो कौन से कारण हैं की सरकार द्वारा प्रायोजित सामूहिक नरसंहारों के रचियता आजतक मौज क्यूँ उड़ाते फिर रहे हैं! क्या ये सवाल पूछा जा सकता हैं की बड़े बड़े गुंडों और माफियाओं को अदालतें अपने दायरे में क्यूँ नहीं आने देती! क्या ये पूछा जा सकता है की स्वर्ण मंदिर में नंगा नाच करने वाली सरकार के मुखियाओं को इन्साफ के दायरे से किसने बाहर किया क्या ये सवाल नहीं बनता की सिखों में अलगाव की आग किसने और क्यूँ भड़काई और अगर आप उन्हें आतंकवादी कहकर पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहे हैं तो फिर केन्द्र में तथाकथित राष्ट्रवादियों की अटल बिहारी वाली सरकार के आते ही अकाल तख़्त द्वारा संत भिंडरावाले को शहीद और संत का दर्जा देने से आप क्यूँ नहीं रोकने गए (सन्दर्भ) मतलब साफ़ है आप अपनी सुविधानुसार किसी को आतंकी या संत नहीं कह सकते, और शब्द आतंकवाद पूरी तरह राजनैतिक शब्द है! एक व्यक्ति एक सरकार के लिए एक समय में सबसे बड़ा वांछित आतंकवादी होता है और आप उसे पकड़ने एक धर्मस्थल में पूरी फ़ौज घुसा देते हैं वही व्यक्ति एक दूसरी सरकार आते ही उसी धर्म स्थल में संत और शहीद का दर्जा पाता है! सैकडो सिख युवकों को आतंकी कह कर फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया गया होसकता है उनमे से कई गैरकानूनी गतिविधि में शामिल रहा हूँ मगर हो सकता है ऐसा पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता! और क्या देश की कोई अदालत भिंडरावाले को पकड़ने के लिए स्वर्ण मंदिर पर किये गए सरकारी हमले को गलत कह सकी? नहीं! क्या वही अदालत भिंडरावाले को अकाल तख़्त द्वारा संत और शहीद की उपाघी देने की आलोचना कर सकी नहीं तो मामला साफ़ है अदालतें भी राजनीति और राज्य का हिस्सा हैं (आमतौर पर होती हैं इसमें कोई बुराई भी नहीं) तो उन नौजवानों को फांसी क्यूँ जिन्हें बरगलाया या जोश दिलाया गया हो! जिनके सामने आपकी पुलिस और फ़ौज ने उनके सबसे अहम धर्म स्थल पर हमला बोला हो! उनके गुस्से और पीड़ा को आप न्याय के नाम पर फांसी पर क्यूँ चढाना चाहते हैं!
२.      हमारे देश में हजारो मंदिरें हजारो मस्जिदें दरगाहें तोड़ दी गयी बर्बाद हो गयी आज भी हरयाणा पंजाब के गाँव में कई वीरान मस्जिदें पड़ी हैं जहाँ लम्पट तत्व बैठे दारु पिते हैं भैसे बंधी जाती है किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता वहाँ कल को मंदिर बना दो तो किसी को क्या पता चलना कुछ ऐसी हालत थी बाबरी मस्जिद की उसको पहले आन का मुद्दा बनाया गया फिर सरेआम तोडा गया आप एक समुदाय को बेईज्ज़त करना चाहते हो, लोग गुस्सा हुए सड़क पर निकले तो दंगा हुआ और फिर बदला लिया गया बॉम्बे बम्ब ब्लास्ट के शक्ल में सैकडो निर्दोष मरे, आप शक्तिशाली राज्य हो फिर भी आपने दंगाईयों के सरगना बाल ठाकरे को राजनैतिक सुविधा देकर केस तक दर्ज ना होने दिया और बात तै कर दी मेमन बंधुओं को फांसी पर चढाने की! जिसने पुरे देश में बाबरी मस्जिद और राम मंदिर को लेकर उन्माद बनाया वो प्रधानमंत्री बन्ने की राह पर है! ये वजहें हैं आपके देश में मेहनतकशो अल्पसंख्यको और दलितों के फांसी चढ़ने की! ठीक वही २००२ वाले मामले में हुआ गोधरा के आरोपियों को तख्ते पर भेज दिया गया मगर बाद के दंगों में ऐसा नहीं हो सका
३.      आमतौर पर फांसी के दो लक्ष्य होते हैं एक की आमुक व्यक्ति को समाज में वापस भेजना उचित नहीं दूसरा की व्यापक समाज में कानून का भय बनेगा मगर और ऐसी चयनात्मक फांसियों से समाज डरेगा नहीं समाज भीतर ही भीतर आपसे नफरत करेगा और जब नफरत ज्वाला बनेगी तब और ऐसे लोग पैदा होंगे जिन्हें फांसी देना होगा! गाँधी कहते हैं की आँख के बदले आँख का सिद्धांत अगर लागू कर दिया जाए तो सारी दुनिया अंधी हो जायेगी! आपने आमिर अजमल को फांसी दी क्या तीर मारा वो मरने ही आया था वो मौत के लिए तैय्यारी करके आया था उसे पता था मरना है, वो मर भी गया मगर कुछ लोगों के लिए मौत को गौरान्वित कर गया, किसी एक देश में उसकी मौत को शहादत कहा गया और दूसरे युवाओं को उससे सीख लेने की नसीहत दी गयी! एक चाय वाले आम से इंसान का आम सा मजदूर लड़का जिसने सैकड़ों जाने ली और खुद भी मर गया भारतीय उपमहाद्वीप की लोक कथाओं में ऐसी तमाम कहानियाँ मौजूद है जो हारे हुए लोगों की मौत के जश्न में गढ़ी गयी हैं    
क्या मैं अदालतों के फैसलों और विवेक पर प्रश्न चिन्ह लगते हुए मौत की सजा को खत्म किये जाने की वकालत कर रहा हूँ? नहीं ऐसा नहीं है अदालतों की अपनी सीमाएं हैं अदालतें जाँच नहीं करती उपलब्ध जाँच और सबुत (जो की पेश किये जाते हैं) पर अपने फैसले देती हैं ज़ाहिर है जब जाँच राजनैतिक कारणों से प्रभावित होगी तो न्याय भी राजनैतिक कारणों से प्रभावित होगा! और फांसी दलितों अल्पसंख्यको और मेहनतकशों (गरीब सवर्ण भी) के हिस्से आती रहेगी! तो क्या हमें  ऐसे में किसी को ऐसी सजा जो कभी वापस नहीं ली जा सकती से बचना नहीं चाहिए ??
क्या हमें ये नहीं सोचना होगा की ऐसी चयनात्मक मौत की सजाएं नागरिकों में कानून और सरकार के द्वारा लक्ष्य किये जाने के अहसास का सबब बनती हैं  (जारी रहेगा )    

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