बहुत उन्मुक्त
बेहद सहज
और खूब प्रफुल्लित हूँ मैं
तुमसे अलग होने के बाद
अब ये और बात है कि
कविताओं में
तुम्हारा जिक्र आ जाता है।
और आँखें
धुँधला जाती हैं
फिर भी बहुत खुश हूँ मैं
बेहद सहज
और खूब प्रफुल्लित हूँ मैं
तुमसे अलग होने के बाद
अब ये और बात है कि
कविताओं में
तुम्हारा जिक्र आ जाता है।
और आँखें
धुँधला जाती हैं
फिर भी बहुत खुश हूँ मैं
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आओ रिश्तों को यहीं दोराहे पर छोड़
हम निकल जाएँ अलग अलग
फिर कभी ना मिलने के लिए
तुम्हे तो शायद कोई दर्द ना हो
मगर सच कहूँ तो मुझे भी नहीं होगा
क्योकि मैंने हर कोशिश की
अब जब तुम्हे अंतिम परिणति
हमारी जुदाई लगती है
तो चलो तुम्हारे अहसास को बरकार
ही रखूँगा
कुछ भरम जो मेरे भीतर हैं या तुम्हारे
उनको भरम बना छोड़ दें वही
बेहतर
आओ इससे पहले की हमें मजबूरियां
अलग करें
हम खुद अलग राहों पर निकल पड़ते हैं
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तुमने कुछ कहा नहीं
वरना हम रुक जाते
जाते जाते चोर नज़र से हमने
पीछे मुड मुड के बार-बार देखा
की काश तेरी उन्गिलियाँ
मुझे रोकने की कोशिश करें
पर जाने कौन सी मज़बूरी थी जो
हाथ बांध गयी तुम्हारा
और मै चलता रहा
चलते चलते इतना दूर आ पहुंचा की
चाह कर भी नहीं लौट सकता
इस जीवन में तो बिलकुल नहीं
प्यार को ना तुने समझा है ना मैंने
और भला जब प्यार को भी समझना पड़े
तो वो प्यार ही कैसा
तुम सही थी और मै भी
बस सही नहीं थे तो
हमारे लक्ष्य हमारी मंजिलें
.............................................................
हम अक्सर
'तुम' और 'मैं'
में विभाजित हो जाते हैं
बड़ी आसानी से।
पर आज तुम्हें
एक चुनौती देना चाहता हूँ,
मुझे आसमान को
विभाजित करके दिखाओ,
हवाओं को बाँटकर दिखाओ,
पानी के टुकड़े कर के दो,
कर सकते हो इन्हें अलग?
नहीं न,
फिर
'हम' शब्द की
सघनता को समझे बगैर
क्यों हम अक्सर
विभाजित हो जाते हैं
'तुम' और 'मैं' में
अनजाने में
'तुम' और 'मैं'
में विभाजित हो जाते हैं
बड़ी आसानी से।
पर आज तुम्हें
एक चुनौती देना चाहता हूँ,
मुझे आसमान को
विभाजित करके दिखाओ,
हवाओं को बाँटकर दिखाओ,
पानी के टुकड़े कर के दो,
कर सकते हो इन्हें अलग?
नहीं न,
फिर
'हम' शब्द की
सघनता को समझे बगैर
क्यों हम अक्सर
विभाजित हो जाते हैं
'तुम' और 'मैं' में
अनजाने में
बड़ी आसानी से।
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