कुछ बातें जो संभ्रात इतिहास में दर्ज नहीं की जा सकेंगी

बचपन संवारती दिल्ली

दिल्ली  देश  की  अधिकारिक  और  सर्वमान्य  राजधानी  है ! और  देश  का  कोई  भी  नागरिक देश-प्रेम  से  ओत पोत  होकर  भले  ही  इसे  सर्वकालिक  और  सर्वमान्य राजधानी  की  कामना  करता  हो  मगर  इतना  तो  ज़रूर  चाहता  है  की  दिल्ली  कम  से  कम  कानून  तोड़ने  और  अपराध  कर्मो  की  राज्य्धानी  ना  बने ! आयें  आपका  परिचय  करते  हैं . दिल्ली  के  एक  और  रूप  से  और  वो  रूप  है  बाल  मजदूरों  की  राजधानी  के  रूप  में ! ये  सच  है  की  यहीं  से  देश  भर  के  बाल  मजदूरों  को  मुक्त  करने  के  नाम  पर  सैकड़ों  संगठन  काम  कर  रहे  हैं ! और  उनके  द्वारा  मुक्त  कराये  जाने  वाले   बच्चों  की  गिनती  भी  लगातार  बढ़  रही  है. नीतियाँ  बन  रही  हैं  और  करोडो  खर्च  किये  जा  रहे  है  टास्क  फाॅर्स  बनती  रहती  है  मगर  अकेले  दिल्ली  में  ही  हजारो  बाल  मजदूर  हमारे  और  आपके  सामने  सरे  नियम  और  नीतिओ  की  पोटली  टाक  पर  रख  कानूनों  को  मुह  चिड़ा  रहे  हैं . हमें  भी  सब  कुछ  पाता  है  मगर  हम  उन  बाल  मजदूरों  को  जे जे  एक्ट  और  दुसरे  वैधानिक  धाराओं की  कसौटी  पर  कस  भर  लेने  की  मेहरबानी  दिखा  भर  जाते  हैं . 


दिल्ली  की  किसी  रेड लाइट  पर  रुकिए  तो  आपके  सामने  गुलदस्ता  पत्रिकाएं  और  आपके  बच्चों  के  खिलोने  बेचने  वालों  पर  गौर  कीजिये  वो  बच्चा  है  और  मजदूर  भी ! उनसे  बात  कीजिये  पाता  चलेगा  की  ज़रूरत  निति  की  नहीं  नीयतों  की  है ! एन जी  ओ  वाले  उनके  पुनर्वास  पर  कुछ  नहीं  बोलेंगे  क्योकि  वो  उनके  लिए  वो  मसाला  नहीं  जो  उन्हें  चाहिए.


आश्रम  चौक  पर  किताबों  की  बिक्री  करने  वाला  १३  साल  का  किशोर  छपरा  से  3 साल  पहले  दिल्ली  आया  था  पहले  उसने  दिल्ली  के  दिल  कनौट   प्लेस में  मूंगफली  बेचीं  अब  किताबें  बेचता  है . वो  बताता  है  की  किताबों  के  नाम  तो  उसे  पाता  होते  हैं  मगर  वो  उन्हें  अध्नागी  तस्वीरों  को  देख  कर  पहचानता  है  वो  बड़ी  उत्साह  से  बड़ी  गाडियो  में  चलने  वालों  के  बारे  में  बताना  चाहता  है  की  वो  "कैसे  गंदे  और  घटिया  होते  हैं . "कैसे"  के  जवाब  में  कहता  है  की  वो  हमेशा  गन्दी  किताबें  खरीदते  है  औरतों  का  लिहाज  भी  नहीं  करते !!" नहीं  मै  उन  सम्भारत  लोगों  की  जीवन  शैली  पर  कोई  सवाल  नहीं  खड़ा  कर  रहा  मै  तो  केवल  एक  बच्चे  की  मानसिकता  बता  रहा  हूँ  और  केवल  ये  प्रशन  खड़ा  करने  की कोशिश  कर  रहा  हूँ  की  12 साल  का  एक  बच्चा  जिसे  "शिष्टाचार"  का  पाठ  पढना  था  वो  दूसरों  की  कुंठाओ  के  निवारण  के  लिए  अश्लील  साहित्य  बेच  रहा  है ! और  हमारे  समाज  में  जब  उसका  एक  नागरिक  के  तौर  पर  परवेश  होगा  तो  क्या  होगा  सोचा  जा  सकता  है.

खैर  वो  अपने  बारे  में  बताता  है  उसे  उसके  गाँव  से  उसका  मामा  लाया  था  ताकि  उसका  परिवार  चल  सके  जिसमे  उसकी  माँ  और  दो  छोटी  बहने  हैं . पिता  की  मौत  के  बाद  चचो  ने  संपत्ति  से  बेदखल  कर  दिया वो  बताता  है  बच्चे  जो  काम  करता  है  जहाँ  काम  करता  है  वो  सारा  ठेकेदारों  का  होता  है  ! पुलिसिया  दखल  के  बारे  में  कहता  है  की  हर  जगह  चढ़ावा जाता  है फिर  दर  कैसा! तो  क्या  किशोर  पढना  नहीं  चाहता ? हनन ! बिलकुल  वो  पढना  नहीं  चाहता ! वो  क्लाहता  है  की  पढ़-लिख  कर  कोई  फायदा  नहीं  होता  ! नौकरी  तो  मिलती  नहीं  ऊपर  से  खर्च  बढ़  जाता  है ! वो  बताता  है  की  मुश्किलें  ज्यादा  नहीं  होती  मगर  कभी  कभी  माँ  बहन  की  याद  आती  है  तो  बहुत  रोने  का  दिल  करता  है  मगर  जिंदा  रहना  है  तो  लड़ना  पड़ेगा  उसे  किसी  से  कोई  शिकायत  नहीं 

मगर  मुझे  है  बहुत  है  इन  काले  अंग्रेजों  से  मुझे  शिकायत  की  कमी  नहीं  बल्कि  सच  तो  ये  है  की  मै  चाहता  हूँ  की ...................................
खैर  हमारे  देशवासियो  की  वैचारिक  स्थिति  वाकई  अजीब  है ! असमानता  और  ग़रीबी  के  खिलाफ  भासन  के  बेहतर  से  बेहतर  पञ्च लाइन  का  इस्तेमाल  करने  में  ये  किसी  विदुसक  और  किसी  भी  क्रन्तिकारी  या  नेतृत्वकारी  को  मात  देते  हैं! मगर  समस्या  जब  यक्ष  हो  तो  स्वय  को  आस-पास  के  वातावरण  से  ऐसा  काट  लेते  हैं  जैसे  वर्षो  से  समाधी  लगा  रखी  हो. ऐसा  नहीं  की  बाल  मजदूरों  का  ये  समूह  इन्हें  नज़र  नहीं  आता! आता  है  मोटर  मिस्त्रियों  के  पास  जूस  दुकानों  में  और  तमाम  जगह  जहाँ  भी  आपकी  नज़र  जसके  वहां  तक  अनंत ............यहाँ  तक  की  देश  के  लाखों  बाल  मजदूरों  को  मुक्त  करने  वाली  एक  संस्था  जिसने  अब  पाकिस्तान  बंगलादेश  और  नेपाल  आदी  में  भी  इन्हें  बचपन  लौटने  का  बीड़ा  उदय  है  के  राष्ट्रीय कार्यालय  के  सामने  रेहड़ी  वाला  बच्चा  जैसे  सुबह  से शाम  तक इन्हें  मुह  चिडाता  है  हमें  आपको  देश  के  वर्त्तमान  को  भविष  को ............
मगर  हम  विश्व  गुरु  अनेक  धार्मिक  मिथक  में  उलझे  है  हाँ  नींद  खुलते  ही  सेंसेक्स  की  उछल  और  लुध्काओ  देख  कर  पुनः  विश्वगुरु  बन  जाने  का  सपना  देखने  में  व्यस्त  है .

अभी तो और मज़ा आना है 

अभी कामोन वेल्थ  गेम होने हैं दिल्ली संवर रही है और भारी सफाई अभियान चल रहे हैं युद्ध स्तर पर निर्माण के काम चल रहे हैं हजारों महिला पुरुष मजदूर लगातार काम कर रहे हैं उनके साथ उनके छोटे छोटे बच्चे हैं मगर उन बच्चो के लिए कोई क्रेच नहीं सरकार सोती है सो सो रही है हम एन जी ओ वाले मीटिंग कर रहे हैं! मजदूर दिल्ली संवारेंगे और फिर उन्हें लात पड़ेगी उन्हें डेल्ही छोडनी होगी ताकि गेम के समय दिल्ली सुन्दर लगे! उन के साथ उनके बच्चों को भी दिल्ली की सीमा से बहार कर दिया जायेगा! वो कहाँ जायेंगे ये सोचने का काम सरकार का नहीं! हजारो बच्चे काम कर रहे है सर्कार गेम के समय इन्हें बहार निकलना चाहती हैं उन्हें जाना होगा कहाँ ये किसी को पाता नहीं मगर दिल्ली की सुन्दरता में ये बच्चे सही नहीं होंगे! सरकार व्यस्त है अभी अतिथियों के सत्कार में कोई कसार नहीं छोड़ना चाहती सो छोटे छोटे दाबों और आम नागरिकों से कहा है की टिफिन सिस्टम के लिए तैयार रहो नाश्ता खाना बेचो पैसा कमाओ, अब नए धंधा पाने वाले ये लोग अपने सहायता के लिए बच्चा नहीं रखेंगे इसकी कोई गारंटी तो है नहीं ज़ाहिर है बच्चे काम पर रखे जायेंगे और फिर नए मेहमानों की आमद से जिस्म के धंधे वालों की भी चांदी होने वाली है आखिर ये गेम्स जहाँ भी हुए वहां के जिस्मानी कारोबार वालों की चांदी तो हुयी है सो हमारे यहाँ भी होनी वैसे भी एशिया की लड़कियों की मांग कुछ ज्यादा ही है इन कारोबारों में सो पक्का है की मानव तस्करी बढेगी 
मैंने खुद देखा है की हरयाणा में शादी के नाम पर खरीदी जाने वाली लड़कियों के गायब होने का सिलसिला शुरू हो चूका है! महज़ दो गाँव की यात्रा में मैंने दो लड़कियां गायब पाई हैं ! इन तस्कारियों में बच्चों की ज़बरदस्त तस्करी की सुगबुगाहट मिल रही है! तस्करों दलालों का पूरा का दल अपने धंधे के लिए पूरी तरह तैयार हैं! 

संवारिये दिल्ली कितना संवारते हैं हम भी देखेंगे भैस पर आटा मल मल के उसको सफ़ेद बनाने की कवायद देखने हम भी बैठे है 

9 टिप्‍पणियां:

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

badhiya prayaas hai,par font badaa karen...

shama ने कहा…

Bada karara aalekh hai..shaili bahut sundar hai!

kshama ने कहा…

Bahut sundar aalekh hai!

RAJ SINH ने कहा…

sarthak lekhan . aapka swagat hai .

EP Admin ने कहा…

आप तमाम साथियों द्वारा प्रोत्साहित किये जाने का धन्यवाद......आशा है आप अपनी छात्र छाया में रखेंगे......

राम बंसल/Ram Bansal ने कहा…

देश के श्रमिकों का खून चून्स चून्स कर दिल्ली के मार्गों को चार मंज़िला कर दिया गया है - अधोभूमार्ग, भूतलमार्ग, उड़ान मार्ग और मेट्रो रेल की हवाई उड़ान. इस पर भी यातायात सुगम नहीं हुआ है. अब आयेज क्या होगा? इसी धन से लाखों गाओं का विकास हो सकता था जिससे करोड़ों लोगों का जीवन सुलभ हो जाता. शासन-प्रशासन की मूर्खता का प्रतीक बनती जेया रही है दिल्ली.

Arshad Ali ने कहा…

sachet karne wali aalekh

talib د عا ؤ ں کا طا لب ने कहा…

अस्सलाम अल्लैकुम,आप अपने हल्क़े में बेहतर काम कर रहे हैं.कभी फुर्सत मिले तो आयें दीन-दुन्या की भी बातें की जाए!!खुश-आमदेद है!

EP Admin ने कहा…

@ talib د عا ؤ ں کا طا لب..... मेरा दिल तो आशना है सनम मुझे क्या मिलेगा नमाज़ में