महाभारत के भीस्म पितामह उनका हत्यारा शिखंडी, सल्तनत कालीन मालिक काफूर और मुग़ल कालीन इतेमाद खान जैसे लोग अपने अपने काल में बड़े प्रशासनिक अधिकारी और बड़े यौद्धा रहे हैं. मगर इसके अलावा एक बात ऐसी भी है जो इनमे सामान रही और वो है उनका पुरुष या महिला ना होना!
भले ही भीसम पितामह ने अपनी चारित्रिक पवित्रता और प्रतिज्ञा के सत्यार्थ अपने लीग को काट फेकने का दूसाहस किया हो ! और अन्य जनम से ही जनोत्पति के लिए लैंगिक तौर पर अक्षम रहे हों मगर इतिहास के पन्ने उनकी गौरव गाथाओ के मुहताज हैं ! सामाजिक इस्थिति युद्ध कौशल और तात्कालिक समाज में मजबूत राजनैतिक आर्थिक स्थितियों को प्राप्त करना उन पर किसी की दया नहीं आपितु उनके कौशलों को सामाजिक स्वीकारिता और समाज के अलैंगिक विमर्श का परिचायक है। मगर अफ़सोस आज जब हम स्वय को प्रगतिशील और नई तकनीकों से लैस २१वि सदी का सभ्य और सुसंस्कृत मानव होने का दावा करते हैं तब किन्नर समाज के दोयम दर्जे के (अतिश्योक्ति होगी दरअसल हम इन्हें लैंगिक तौर पर इनकी पहचान से भी इंकार करदेते है) की छवि उभरती है । इधर के वर्षो में जबकि किन्नरों ने राजनीती में हाथ अजमाया तो जैसे भूचाल आगया वो भी तब जबकि ये विधायक से अधिक कुछ और नहीं हो सके ! मीडिया और समाज ने अपने उदार होने का ऐसा नगाड़ा पीटा की लगा किन्नरों ने जाने कौन सा किला फ़तेह कर लिया ! आपको याद दिलाता चलूँ की इसी देश में एक किन्नर वितमंत्री रहा है ! हाँ वो राज तंत्र था और वो काल था शहंशाह अकबर का , और उस समय ये कोई अनहोनी नहीं थी ! ऐसे में बड़ा प्रासंगिक होजाता है की आज जब जेंडर और विभिन्न लैंगिक वादों का अविष्कार और उपयोग हो रहा है ! तब किन्नरों को समलैंगिक और एड्स वाहक होने का आरोप मड हम उन्हें कंडोम बाँट कर या विभिन्न एड्स जागरूकता कार्यकर्मों में इनकी प्रदर्शनी लगा भीड़ बटोरने का धंधा कर रहे हैं। जैसे इनके जीवन पूरी तरह यौनाधारित हों और इन्हें खाने पहने रहने जैसी कोई बुनयादी ज़रूरत ही ना हो
मगर हम इन्हें सामाजिक प्राणी मने तबतो कोई विचार हो । अभी जिस सर्व शिक्षा अभियान का जो वैश्विक ढोल पीटा जा रहा है वहां आपने कहीं देखा या सुना की इनके शिक्षा के लिए कोई विशेष इन्तेजाम किया गया हो , या नरेगा में कोई विशेष व्यवस्था हो (महिलाओं और पुरुषों के लिए नरेगा)जब की विकास-शील देशों के लिए ये एक वैश्विक आन्दोलन है,
किन्नरों के इतिहास को देखें और जानलें ये इतिहास हमारा अपना इतिहास है ! ये लैंगिक taur per भले ही हमसे कुछ अलग हों और ये अन्तेर ज्यादा नहीं बस वैसा ही जैसे सहोदर भाई बहनों के शारीरिक हाव भाव या लैंगिकता का और इन्होने ठीक उसी प्रकिर्या से जनम लिया है जैसे कोई सामान स्त्री या पुरुष !
फिर भी जाने क्यों ये आज के समाज में किसी बहरी दुनिया से आये हुए अलिंस की तरह देखे जाते हैं . किन्नर आधुनिक समाज का वो पहलु है जिसकी ओर देखना या सोचना भी स्वय की लैंगिकता पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर देता है !
किन्नरों द्वारा पहना जाने वाला महिला वस्त्र
दो वर्ष पहले उत्तर प्रदेश के एक पुलिस पदाधिकारी राधा बन कर भले ही उपहास के पात्र बने । मगर इस देश के दो प्रमुख धर्म सनातन और इस्लाम के भीतर की संत परम्परा इसे वैधता देती है . सूफी विचारो में ये एक स्थिति है की जहाँ बंद अपने महबूब (परमात्मा) के इश्क में अपनी सम्पूर्ण पहचान खो देता है यहाँ तक की लैंगिक पहचान भी, सूफी या संत होने की पहली शर्त है पैसिव होना और महिला वस्त्र धारण करना इसी भावना का प्रदर्शन है । वही सनातन संत परम्परा इसे आज भी सखी संप्रदाय के रूप में प्रतिष्ठित किये हुए है, ये वो स्थिति है जब कोई अपने प्रेमी (परमात्मा ) के प्रेम में डूब कर सब कुछ समर्पित कर देता है .और चुकी लैंगिकता समाज का बड़ा टैबू है सो इसका भी ,
और प्रेम की इसी स्थिति में पहुच कर एक पुलिस पदाधिकारी अपने पद से हाथ धो देता है बल्कि अपने पौरुष के समर्पण का सामाजिक (क्यों ना कहें क़ानूनी भी) दंड भी पाता है
दरअसल किन्नरों द्वारा धारण किया जाने वाला ये वस्त इसी संत परंपरा का अंग है जो कालांतर में इनकी पहचान बनता गया और आज की हालत में ये प्रेमी किन्नर अवैध वसूली और जोर ज़बरदस्ती के प्रतिक बन गए!
कुछ तो कुंठा जो फटे के पैवंद के लिए दूसरों के कपडे फाड़ने की आदत की पश्चिमी नक़ल करने की हरकत से लाचार हमारे दुष्प्रचार तो दूसरी तरफ धर्मो पर उन्मडियो का सनकी प्रभाव ! किन्नरों की पहचान बदलने लगी और ये समाज के वो अंग बनते चले गए जो समाज को किसी हाल में मंज़ूर नहीं थे ! यहाँ तक की इनकी मौत पर जश्न मानाने की परम्परा जो की "विसाल या समां जाना" (वह्दतुल वजूद अकैश्वर -वाद, जिसके अनुसार मौत प्रेमी अर्थात परमात्मा से मिलन है) का सिद्धांत है को प्रबुद्ध जनों ने ज़िल्लत भारी ज़िन्दगी से मुक्ति का जश्न बता दिया! आज हम जैसे जैसे संस्किरितिकृत हो रहे है और तमाम चीजों की अपने ढंग से व्याख्या कर रहे है वैसे वैसे किन्नरों से स्वंय को अथवा किन्नरों को समाज से अलग कर रहे हैं । और फिर तो रही सही कसर भुमंदलिकरण ने पूरी कर दी तब जबकि सारी चीजों का व्यवसायीकरण आरम्भ हुआ तब ये वर्ग भी अछूता नहीं रहा और फिर पैसे लेकर शिष्य बनाना, क्षेतों का बनवारा नकली किन्नर बनाना से शुरू होकर मानवीय तस्करी और वेश्यविरती तक जा पंहुचा जिस में हत्या और अपहरण भी सामान रूप से शामिल हो गए । और आज विशेष लैंगिक स्थिति और संत परंपरा वाले लोगो में भी कोई स्पष्ट अंतर नहीं रह पाया और हमने भी इन्हें मिटाने की कोई कसर नहीं छोड़ी ।
ऐसे में हाल के महीनो में जबकि तमिल्नाय्दु सर्कार ने दस्तावेजों में किन्नरों के अलग कोलुम दिए है राशन कार्ड और वोटर कार्ड भी जारी किया और बिहार सरकार के समाजिक कल्याण मंत्रालय द्वारा किन्नरों को नारी निकेतनो और बाल गृहों में सुरक्षा कर्मी के साथ साथ विशेष स्वस्थ्य कर्मी के बतौर भारती की विशेष योजना एक क्रांतिकारी कदम है ! और इन सरकारों की पहल शायद किन्नरों ki सामाजिक पहचान पुख्ता करेगी ऐसी आशा की जाये।
(शीर्षक के नाम से ही इस मुद्दे पर मेरा एक नृवंश अध्यन है.......प्रस्तुत आलेख मेरे उसी अध्यन पर आधारित है)
भले ही भीसम पितामह ने अपनी चारित्रिक पवित्रता और प्रतिज्ञा के सत्यार्थ अपने लीग को काट फेकने का दूसाहस किया हो ! और अन्य जनम से ही जनोत्पति के लिए लैंगिक तौर पर अक्षम रहे हों मगर इतिहास के पन्ने उनकी गौरव गाथाओ के मुहताज हैं ! सामाजिक इस्थिति युद्ध कौशल और तात्कालिक समाज में मजबूत राजनैतिक आर्थिक स्थितियों को प्राप्त करना उन पर किसी की दया नहीं आपितु उनके कौशलों को सामाजिक स्वीकारिता और समाज के अलैंगिक विमर्श का परिचायक है। मगर अफ़सोस आज जब हम स्वय को प्रगतिशील और नई तकनीकों से लैस २१वि सदी का सभ्य और सुसंस्कृत मानव होने का दावा करते हैं तब किन्नर समाज के दोयम दर्जे के (अतिश्योक्ति होगी दरअसल हम इन्हें लैंगिक तौर पर इनकी पहचान से भी इंकार करदेते है) की छवि उभरती है । इधर के वर्षो में जबकि किन्नरों ने राजनीती में हाथ अजमाया तो जैसे भूचाल आगया वो भी तब जबकि ये विधायक से अधिक कुछ और नहीं हो सके ! मीडिया और समाज ने अपने उदार होने का ऐसा नगाड़ा पीटा की लगा किन्नरों ने जाने कौन सा किला फ़तेह कर लिया ! आपको याद दिलाता चलूँ की इसी देश में एक किन्नर वितमंत्री रहा है ! हाँ वो राज तंत्र था और वो काल था शहंशाह अकबर का , और उस समय ये कोई अनहोनी नहीं थी ! ऐसे में बड़ा प्रासंगिक होजाता है की आज जब जेंडर और विभिन्न लैंगिक वादों का अविष्कार और उपयोग हो रहा है ! तब किन्नरों को समलैंगिक और एड्स वाहक होने का आरोप मड हम उन्हें कंडोम बाँट कर या विभिन्न एड्स जागरूकता कार्यकर्मों में इनकी प्रदर्शनी लगा भीड़ बटोरने का धंधा कर रहे हैं। जैसे इनके जीवन पूरी तरह यौनाधारित हों और इन्हें खाने पहने रहने जैसी कोई बुनयादी ज़रूरत ही ना हो
मगर हम इन्हें सामाजिक प्राणी मने तबतो कोई विचार हो । अभी जिस सर्व शिक्षा अभियान का जो वैश्विक ढोल पीटा जा रहा है वहां आपने कहीं देखा या सुना की इनके शिक्षा के लिए कोई विशेष इन्तेजाम किया गया हो , या नरेगा में कोई विशेष व्यवस्था हो (महिलाओं और पुरुषों के लिए नरेगा)जब की विकास-शील देशों के लिए ये एक वैश्विक आन्दोलन है,
किन्नरों के इतिहास को देखें और जानलें ये इतिहास हमारा अपना इतिहास है ! ये लैंगिक taur per भले ही हमसे कुछ अलग हों और ये अन्तेर ज्यादा नहीं बस वैसा ही जैसे सहोदर भाई बहनों के शारीरिक हाव भाव या लैंगिकता का और इन्होने ठीक उसी प्रकिर्या से जनम लिया है जैसे कोई सामान स्त्री या पुरुष !
फिर भी जाने क्यों ये आज के समाज में किसी बहरी दुनिया से आये हुए अलिंस की तरह देखे जाते हैं . किन्नर आधुनिक समाज का वो पहलु है जिसकी ओर देखना या सोचना भी स्वय की लैंगिकता पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर देता है !
किन्नरों द्वारा पहना जाने वाला महिला वस्त्र
दो वर्ष पहले उत्तर प्रदेश के एक पुलिस पदाधिकारी राधा बन कर भले ही उपहास के पात्र बने । मगर इस देश के दो प्रमुख धर्म सनातन और इस्लाम के भीतर की संत परम्परा इसे वैधता देती है . सूफी विचारो में ये एक स्थिति है की जहाँ बंद अपने महबूब (परमात्मा) के इश्क में अपनी सम्पूर्ण पहचान खो देता है यहाँ तक की लैंगिक पहचान भी, सूफी या संत होने की पहली शर्त है पैसिव होना और महिला वस्त्र धारण करना इसी भावना का प्रदर्शन है । वही सनातन संत परम्परा इसे आज भी सखी संप्रदाय के रूप में प्रतिष्ठित किये हुए है, ये वो स्थिति है जब कोई अपने प्रेमी (परमात्मा ) के प्रेम में डूब कर सब कुछ समर्पित कर देता है .और चुकी लैंगिकता समाज का बड़ा टैबू है सो इसका भी ,
और प्रेम की इसी स्थिति में पहुच कर एक पुलिस पदाधिकारी अपने पद से हाथ धो देता है बल्कि अपने पौरुष के समर्पण का सामाजिक (क्यों ना कहें क़ानूनी भी) दंड भी पाता है
दरअसल किन्नरों द्वारा धारण किया जाने वाला ये वस्त इसी संत परंपरा का अंग है जो कालांतर में इनकी पहचान बनता गया और आज की हालत में ये प्रेमी किन्नर अवैध वसूली और जोर ज़बरदस्ती के प्रतिक बन गए!
कुछ तो कुंठा जो फटे के पैवंद के लिए दूसरों के कपडे फाड़ने की आदत की पश्चिमी नक़ल करने की हरकत से लाचार हमारे दुष्प्रचार तो दूसरी तरफ धर्मो पर उन्मडियो का सनकी प्रभाव ! किन्नरों की पहचान बदलने लगी और ये समाज के वो अंग बनते चले गए जो समाज को किसी हाल में मंज़ूर नहीं थे ! यहाँ तक की इनकी मौत पर जश्न मानाने की परम्परा जो की "विसाल या समां जाना" (वह्दतुल वजूद अकैश्वर -वाद, जिसके अनुसार मौत प्रेमी अर्थात परमात्मा से मिलन है) का सिद्धांत है को प्रबुद्ध जनों ने ज़िल्लत भारी ज़िन्दगी से मुक्ति का जश्न बता दिया! आज हम जैसे जैसे संस्किरितिकृत हो रहे है और तमाम चीजों की अपने ढंग से व्याख्या कर रहे है वैसे वैसे किन्नरों से स्वंय को अथवा किन्नरों को समाज से अलग कर रहे हैं । और फिर तो रही सही कसर भुमंदलिकरण ने पूरी कर दी तब जबकि सारी चीजों का व्यवसायीकरण आरम्भ हुआ तब ये वर्ग भी अछूता नहीं रहा और फिर पैसे लेकर शिष्य बनाना, क्षेतों का बनवारा नकली किन्नर बनाना से शुरू होकर मानवीय तस्करी और वेश्यविरती तक जा पंहुचा जिस में हत्या और अपहरण भी सामान रूप से शामिल हो गए । और आज विशेष लैंगिक स्थिति और संत परंपरा वाले लोगो में भी कोई स्पष्ट अंतर नहीं रह पाया और हमने भी इन्हें मिटाने की कोई कसर नहीं छोड़ी ।
ऐसे में हाल के महीनो में जबकि तमिल्नाय्दु सर्कार ने दस्तावेजों में किन्नरों के अलग कोलुम दिए है राशन कार्ड और वोटर कार्ड भी जारी किया और बिहार सरकार के समाजिक कल्याण मंत्रालय द्वारा किन्नरों को नारी निकेतनो और बाल गृहों में सुरक्षा कर्मी के साथ साथ विशेष स्वस्थ्य कर्मी के बतौर भारती की विशेष योजना एक क्रांतिकारी कदम है ! और इन सरकारों की पहल शायद किन्नरों ki सामाजिक पहचान पुख्ता करेगी ऐसी आशा की जाये।
(शीर्षक के नाम से ही इस मुद्दे पर मेरा एक नृवंश अध्यन है.......प्रस्तुत आलेख मेरे उसी अध्यन पर आधारित है)
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