कुछ बातें जो संभ्रात इतिहास में दर्ज नहीं की जा सकेंगी

हाँ ! मुझे शिकवा अल्लाह से है


अभी-अभी मिले हैं, पर जन्मों की बात लगती है हमारा रिश्ता ख्वाबों की बारात लगती है आओ... एक रिश्ता हम उगा लें ज़िंदगी के बरगद पर, तुम कुछ लम्हों की रोशनी फैला दो, मैं कुछ यादों की झालर बिछा दूँ ... कुछ तेरी साँसें, कुछ मेरी साँसें इस रिश्ते के नाम उधार दे दे... आओ, एक ख्वाब बुन लें इस रिश्ते में जो इस उम्र को ठहरा दे एक ऐसे मोड़ पर ... जहाँ मैं तेरी आँखों से आँसू चुरा लूँ जहाँ मैं तेरी झोली, खुशियों से भर दूँ जहाँ मैं अपनी हँसी तुझे दे दूँ.. जहाँ मैं अपनी साँसों में तेरी खुशबू भर लूँ जहाँ मैं अपनी तकदीर में तेरा नाम लिख दूँ जहाँ मैं तुझमें पनाह पा लूँ... आओ, एक रिश्ता बनाएँ जिसका कोई नाम न हो जिसमें रूह की बात हो.. और सिर्फ तू मेरे साथ हो और मोहब्बत के दरवेश कहें अल्लाह, क्या मोहब्बत है।।
....................................................................
तेरे जाने के बाद रहा मैं जीवित मेरे जाने के बाद गीत रह जाएगा मैं नहीं कह सका था जो, वह कह जाएगा। उछलेगी कोई गीत-लहर, संगीत-लहर चीत्कारों-हाहाकारों के अंदर से ही किलकारी भर जन्मेगा शिशु-सा एक शहर विध्वंसों के अनजान किसी खंडहर से ही उससे पहले संभवत: मेरे सम्मुख मेरे सपनों का राजमहल ढह जाएगा अवशेष धरोहर का अंचल लहराएगा। हर यादगार टूटन में तेरी छवि होगी तेरे दुख में होगा मेरी रचना का क्षण तू एक अशांत नदी-सी बहती जाएगी तूफानों में होगा मेरा प्रत्यावर्तन निश्चित अप्रतिहत तेज समय-धारा में असमर्थ व्यर्थ कूड़ा करकट बह जाएगा अँजुरी में पावन गंगाजल रह जाएगा। .....................................................
मेर
तुम्हारे बीच कुछ है अब भी जो बह रहा है तैर रहा है थिरक रहा है पर इनसे गुजरकर न तुम मुझ तक आ सकते हो न ही मैं पहुँच सकती हूँ तुम तक फिर ये जो बह रहा है तैर रहा है थिरक रहा है नदी भी तो नहीं है जिस पर सेतु बनाया जा सके पर हमारे बीच कुछ है अब भी ये 'कुछ' क्यों है कौन समझाएगा मुझे... कौन...?
.................................................................
तुम्हारा चले जाना दुखद नहीं है पीड़ा तो इस बात की है कि तुम अपने साथ मेरे कुछ अहम 'रिश्ते' बहा ले गए इस वक्त मैं पूरी तरह रीती हूँ फिर भी प्रतीक्षित हूँ तुम्हारे लिए तुम्हारे खंडित व्यक्तित्व के लिए कि तुम आओगे और मुझे मेरे अहम रिश्ते लौटाकर चले जाओगे क्योंकि दुख तुम्हारे जाने का आज भी नहीं है तब भी नहीं होगा पीड़ा तो इस बात की रही है कि तुम अपने साथ मेरे कुछ खास 'रिश्ते' बहा ले गये तुम आना लौटकर मेरे लिए नहीं बस मेरे उन 'रिश्तों' को वापिस करने के लिए एक बार जरूर आना प्रतीक्षित हूँ मैं...!
.......................................................

सच! कवितायें शब्दों से नही दिल के खून से लिखी जाती हैं ......दर्द का समंदर और नाकामी का अहसास से बनता है काव्य ............................. कोई दोषी नही मगर बेचैनी पागलपन बन जाती है............रब सबको ताक़त दे की वो तेरे निजाम में जिंदा रह सकें .................. तुने दुनिया तो अपने तमाशे के लिए बनाई है ....... मगर मानव मात्र की भावना नही तुझ में ..................अरे तमाशा हम भी देखते हैं मगर उन कठपुतलियों में जान नही डालते ........................तू कितना निरंकुश है मदमस्त बावला हठी ................. कभी हमारी नही सुनी तुने हमेशा ख़ुद की चलायी .....................तुझे क्या पड़ी है हमसे या मुझसे .................... बार बार किस बात की परीक्षाएं लेता है तू ...................... कहीं हमने लगाओ तोड़ दिया न तो लाले पड़ जायेंगे तेरी ख़ुद की पहचान के ........................ मुझे सोने दे चुप चाप......................और खुशियाँ मना .............. तेरी बार बार की ये सनकी जिद मुझे अच्छी नही लगती .............................. तुझसे शिकवा नही मगर तुझ पर तरस ज़रूर आता है ................... तू दयावान नही एक भौंडा दर्शक है ...................... तू हर दोष से ऊपर है माना ये तेरा दोष नही ....................... मगर क्या करें ये दोष ही दीखता है हमें ...........................

कोई टिप्पणी नहीं: