एक तो शीला सरकार ने पहले से ही जान आफत में की हुई है, उस पर यह चिदंबरी-तुर्रा! पहले सड़कों पर डिवाइडर भर थे। सामने जाना है तो मुँह उठाया और चल पड़े नाक की सीध में। अपने आप चीं-चीं करती गाड़ियाँ और भड़भड़ाती बसें रुक जाया करती थीं।
अब तो सड़क पार करना ऐसा हो गया है, जैसे भव सागर पार करना हो! सरकार के निर्देश पर रोड डिवाइडरों पर जंगले जड़ दिए गए हैं-"अब करो सड़क पार" की चुनौती देते हुए। पर तुम डाल-डाल तो हम पात-पात की तर्ज पर भाई लोगों ने उसके सींखचे तोड़कर रास्ता बना लिया है। शार्ट-कट। इस बंदे ने भी एक दिन राहत की साँस ली और जा भिड़ा जंगले से।
अजब दुर्गति हुई जी! मुंडी तो निकल गई, मगर पापी पेट फँस गया बीचोबीच। उस पर पीछे खड़े दफ्तरी बाबू ने हँस कर कहा- अंकलजी साँस बाहर करके पेट को अंदर ले जाओ। मगर यह खाए-पिए आदमी का पेट था, कोई बाँस के कागज का लिफाफा नहीं, सो बड़ा फजीता हुआ और यह बंदा अपना सा मुँह लेकर आ गया और दार्शनिकता हावी होने लगी।
पुल तो नदी, नहर, नाले पर होता है। यह कैसा अंतरराष्ट्रीय शहर हम बना रहे हैं, जिसमें सड़कें, नदियाँ बन गई हैं, जिसमें मोटरें तैरती हैं और आदमी डूब जाते हैं। हे राम! जहाँ देखो पुल ही पुल। पुल के ऊपर पुल। कहाँ से ढूँढ़ा जाए शॉर्ट-कट! अजीब पहेली है।
जाकर गिरा सड़क पर। पैंट फट गई और वह भी ऐसी जगह से कि बताते हुए शर्म आए। घुटने छिल गए। तेज रफ्तार गाड़ी मुश्किल से पास में आकर रुक सकी। जान बची। सोचा इस तरह सारे शॉर्ट-कट दिल्ली की जनता से छीन लिए गए हैं। यह बस यात्रियों के साथ अन्याय है।
दुःख होता है। कैसा अच्छा शहर था अपना अब इसे अंतरराष्ट्रीय बनाने के चक्कर में बर्बाद किया जा रहा है। पहले जहाँ जी आए थूकते थे, जहाँ जी आए सिनकते थे, जहाँ जी आए लघु शंकाओं का निदान ढूँढ़ लेते थे, जहाँ जी आए चाट के पत्ते और कचरा फेंकते थे, जहाँ जी आए अपने कुत्तों-बिल्लियों को टहलाते थे और जहाँ जी आए मजमे लगाते थे, जहाँ जी आए आदमियों तक पर मोटर वगैरह चढ़ा लाते थे और जहाँ जी आए धड़ाधड़ हार्न बजाते थे।
अस्पताल हो, स्कूल हो, श्मशान हो, कैसी स्वतंत्रता थी! बजाते रहो! बसें सड़कों पर कैसा सरकस दिखाती चलती थीं और कंडक्टर कितना प्रेम से बातचीत करता था! लोगों में कैसा सद्भाव था! बूढ़े खड़े हैं और नौजवान बैठे हैं और कंडक्टर से लड़ रहे हैं कि स्टाफ के आदमी हैं।
महिलाओं की सीटों पर मुस्टंडे जमे हैं और कोई कहे उठो तो कहते हैं सीट महिलाओं के लिए रिजर्व हैं, कन्याओं के लिए नहीं! कंडक्टर सवारियों के लिए चिल्लाते हैं तो ड्राइवर स्टापों पर यात्रियों को गिराते और टपकाते हैं। कैसी कमनीय बस संस्कृति है! कंडक्टर के मुख से तो फूल झड़ते हैं! अब कहते हैं, उन्हें सरकार तमीज सिखाएगी और वे तमाम अतिथियों से मुस्करा कर कहेंगे : "गुड मॉरनिंग सर। टिकट प्लीज। काँ जागा ब्रदर? सबदरजंग? ले फड़ अर चल आग्गे कू अंग्रेज। आग्गै रेन नहीं हो रही! कैसे तहजीब के नाम पर अब दिल्लीवालों को बिगाड़ा जाएगा। हाय रे! कुछ तो शर्म करो।
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