कुछ बातें जो संभ्रात इतिहास में दर्ज नहीं की जा सकेंगी

कितना धन चाहिए

झारखंड से जुड़े आयकर छापों ने अनेक सवाल खड़े किये हैं. सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक दृष्टि से. देश भर में ये छापे पड़े. विदेशों में भी इनकी जड़ें-फ़ैलाव है. छापों की इन खबरों को देख कर मन में सवाल उठा. कितना धन चाहिए, एक इंसान को ? धन की भूख की कोई सीमा है ? 23 महीने सत्ता में रह कर कैसे लोग हजारों करोड़ कमा लेते हैं ? यह किसी एक व्यक्ति का सवाल नहीं है. यह मानस है, जो हर जगह- हर तरफ़ है. इस मानस-मनोवृति की ललक क्या है ? इस भूख का मनोवैज्ञानिक राज क्या है? बड़ा आसान फ़ार्मूला है. उपभोक्ता मानस को दोष देना. कहना कि यह पश्चिमी मानस है. पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव. लोभ-लालच को इसकी जड़ बताना. फ़िर भी पूरा उत्तर नहीं मिलता. जीने के लिए कितना और क्या? सर ढकने के लिए कितनी छत चाहिए ? कितने देशों में और कितने शहरों में ? उदारीकरण ने भारत की मिट्टी छीन ली है. पश्चिमी ओर्थक मॉडल ने भारत में नया मानस दिया है. यह मानस है, संपूर्ण भोग का. भारतीय मानस मानता था, भोग-लालसा, आग है . इंद्रिय भोग भी आग है. उसमें घी डालिए, यह भभकेगा. अनियंत्रित उदाम इच्छाएं, वासनाएं. आज समाज की मुख्यधारा में इच्छाओं-वासनाओं की बाढ़ है. यही ’91 के बाद का भारतीय मानस है. समाज की मुख्यधारा का. आजादी की लड़ाई से लेकर ’91 के बीच तक, राजनीति में भारतीय मानस मौजूद था. संस्कारों के रूप में. विचारों के रूप में. गांधीजी ने राजनीति में इसी को आगे बढ़ाया. इसलिए आरएसएस से लेकर घोर वामपंथी भी आचार-विचार में, जीवन दर्शन में, सोच में, ईमानदार और नैतिक रहे. कह सकते हैं, हर दल समूह में गांधीवादी विचारों-चिंतन का बोलबाला था. अब ईमानदारी-नैतिकता बोझ है. इस दौर में प्रतिस्पर्धा ही मूल है. दूसरे की कीमत पर आगे बढ़ना. छल, छद्म, षडयंत्र और तिकड़म से. साधन और साध्य का कोई अर्थ ही नहीं रहा. भारत की राजनीति-व्यवस्था अब मैकियावेलि की राजनीति से संचालित है. साधन-साध्य फ़िजूल है. येनकेन प्रकारेण गद्दी, पैसा और प्रतिष्ठा. यह इस धारा का दर्शन है. भारतीय मूल्यों या गांधी के संस्कारों से अब यहां की राजनीति नहीं चल रही. आरएसएस में भी कार्यकर्ताओं का टोटा है. युवा नहीं आ रहे. वामपंथ से युवा शक्ति भड़क रही है. मध्यमार्गी दलों में कार्यकर्ता रहे नहीं. ठेकेदारों की फ़ौज है. इन दलों का सदस्यता अभियान, झूठ और फ़र्जी का पुलिंदा है. राजनीति में विचार और मूल्य हैं, कहां ? आज कोई दल का सदस्य बनता है, कल उसे टिकट चाहिए. पद और पैसे की आग में दल जल रहे हैं. भारतीय मानस पूछता था कि इतनी संपत्ति क्यों और किसलिए ? लोहिया मरे, तो दो जोड़ी कुर्ता, धोती और एक टूटा सूटकेस था. यही जर्मनी से पढ़ कर लौटे मौलिक चिंतक की कुल संपत्ति थी. जेपी, जो कुछ था, वह भी बांट चुके थे. मित्रों के भरोसे जीवन चलता था. जवाहरलालजी भी प्रधानमंत्री रहे. पर उनके पत्रों को पढ़िए, वह राजीव गांधी को मदद नहीं कर सके. राजीव लंदन में पढ़ते थे. जवाहरलाल जी ने लिखा, खुद खटो, कमाओ और पढ़ो. मेरे पास पैसे नहीं. राजीव गांधी ने क्लीनर का काम किया.

गुजारा के लिए. रफ़ी अहमद किदवई लंबे समय तक केंद में मंत्री रहे. मरे तो बेगम गांव लौट गयीं. अपनी टूटी झोपड़ी में. पासबुक में 24 रुपये थे. दीनदयाल उपाध्याय की यही स्थिति थी. कम्युनिस्ट अत्यंत सादगी से रहते थे. आरएसएस के बड़े नेता भी जीवन में सादगी और शुचिता के साथ जीते थे. क्या कारण था कि धुर वाम से धुर दक्षिण तक की जीवन पद्धति में सादगी और ईमानदारी थी. तप और त्याग था. यह गांधी का युग था.

यह मानस भारतीय संस्कारों को मानता था. इस मानस में धन कमाना वर्जित नहीं है. चार पुरूषाथरें ं में एक धन कमाना भी है. आज की आत्मकेंद्रित होती दुनिया में धन होना और भी आवश्यक हो गया है. पर वह धन आये कैसे? गवेद मानता है- स्वार्थपूर्ण धन संग्रह विपत्ति का कारण है. मोघमन्नं विन्दते अप्रचेता सत्यं ब्रवीमि वध इत् सतस्य नार्यमणं पुष्यति नो सखायं केवलाघो भवति केवलादी

अर्थात् मैं सत्य कहता हूं कि स्वार्थ के लिए अन्न-संग्रह (धनसंग्रह) मनुष्य के लिए कठिनाई (विपत्ति) का कारण होता है. वृहदारण्य उपनिषद ने तो स्पष्ट कहा कि धन से अमृतत्व (अमरता) प्राप्त होने की आशा ही नहीं है. ’अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन‘ . बेन जानसन ने भी इसी प्रकार कहा था- धन ने किसी को सचमुच धनी नहीं बनाया, बल्कि उसके मानसिक विकास ने ही सच्चा धनी बनाया है- (मनी नेवर मेड एनी मैन रिच बट हिज माइंड - बेन जानसन). शोषणपूर्ण एवं स्वार्थपूर्ण धनसंगह से जीवन के लक्ष्य की पूर्ति नहीं होती है. इसी आशय से महात्मा ईसा ने कहा था- सुई की नोक में से ऊं ट का गुजरना संभव हो सकता है, किंतु धनिक स्वर्ग में नहीं घुस सकता है. यह परिग्रह पर कुठाराघात है.महाभारत में विदुर कहते हैं- अदत्वा परसंतापं, अगत्वा खलमंदिरम् अनुल्लंध्य सतां वर्त्म, यदल्पमपि तद् बहु अर्थात् किसी अन्य को न सता कर, किसी दुष्ट के घर न जाकर, सज्जनों के मार्ग का उल्लंघन न करके, अर्थात् नेकी से कमाये हुए, थोड़े से धन को भी बहुत (पर्याप्त) समझना चाहिए. (जीवन और सुख शिवानंद से साभार)

आज धन जमा करने की यह भूख बेलगाम है. न कानून का भय. न सामाजिक बंधन है. न पुराने भारतीय संस्कार रहे. खुद झारखंड के पुराने नेताओं को देखिए. आज भी कई ईमानदारी में बेमिसाल और देश के लिए प्रेरक हैं. अनेक झारखंडी विधायक हुए. सांसद हुए, जो मंत्री, सांसद होने के बाद भी हल चलाते रहे. चलाते हैं. हर दल में. स्व कार्तिक उरांव को देखिए. ललित उरांव. झारखंड पार्टी के होरो साहब, जो हाल में मरे हैं. इन्हें देखिए. आज भी कड़िया मुंडा सामने हैं. ओदवासी जीवन और मिट्टी में ईमानदारी और सादगी है. पर इस मिट्टी से घोर लोभी और लालची कैसे पैदा हो रहे हैं? यह पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है. समाज भूल रहा है कि सब मरणधर्मा है. कोई संपत्ति साथ नहीं जानेवाली. कठोपनिषद् का प्रसंग है. बालक नचिकेता यम से वर मांगता है. यम कहते हैं तीसरा वर मांगो. नचिकेता कहता है- हे यम तृतीय वर मांगूं मैं, जिज्ञासा है, मरणोत्तर क्या ?

इस मनुज रूप का क्या होता, दो समाधान बचता है क्या ?...यम बरजते हैं. कहते हैं, यह सूक्ष्म विषय है- कुछ और मांगो. पर नचिकेता अडिग है. अटल है. उसका यही सवाल है- मरणोत्तर क्या हे मृत्यु बता, मेरी इतनी ही अभिलाषा.पर यम कहते हैं-

गज अश्व स्वर्ग पशु भू ले ले, वे पुत्र-पौत्र ले जो शतायु संपदा मांग हे नाचिकेत, जब तक जीना हो मांग आयु . हे नाचिकेत भू-खंड राज्य, धन-धान्य दीर्घ जीवन ले लो इस वर के बदले जो चाहो, कामना पूर्ति का वर ले लो . रथ वाद्य सहित ये कामिनियां, दुष्प्राप्य कामना अभिलाषा देता हं तुङो भोग करने, बस छो़ड़ मृत्यु की जिज्ञासा .

(उपनिष्दगीत गीतासुगीता - लेखक भवेशनाथ पाठक. श्री पाठक षि परंपरा के लेखक हैं. उनकी किताबें अदभुत हैं. हर इंसान को पढ़नी चाहिए)

पर नचिकेता अडिग है. यम उसे सब दे रहे हैं. वैसी अलभ्य, दुर्लभ्य सुंदरियां, जो मनुष्य के लिए दुष्प्राप्य हैं. अपार धन, सुख, लंबी उम्र, दीर्घायु पुत्र-पौत्र ओद. कामिनियों की लंबी फ़ौज. पर नचिकेता कहता है, ये सभी सुख क्षणभंगुर हैं. हे यम, ये सब अपने पास रखिए. ऐसे ही सवाल बुद्ध के भी मन में गूंजे होंगे. वृद्ध को देख कर. बीमार को देख कर. मरे को देख कर. राजपुत्र बुद्ध ने परिव्रज्या (गृहत्याग) की. महाभिनिषिक्रमण. उनकी कृति, संदेश दिग-दिगंत फ़ैला.

यही संस्कार, यही मानस यही मूल्य भारत का रहा. इसी मूल्य पर भारत की राजनीति खड़ी हई - बढ़ी. विनोबा इसी कड़ी के षि थे. इन सबका नैतिक असर समाज और राजनीति पर था. स्कूल के अध्यापक नैतिक पुंज होते थे. आस्था के केंद्र . संयुक्त परिवार का गार्जियन, सबके लिए जीने का संदेश देता था. बड़े-छोटे का रिश्ता था. बूढ़े, अनादर के पात्र नहीं थे. न अयाचित. वे श्रद्धा-शिक्षा के केंद्र थे. तब समाज और राजनीति में नैतिक प्रहरी मौजूद थे. प्रेरणा और उत्कृष्ट जीवन के जीवंत मॉडल थे. आज कहां भटक रहा है, यह समाज?

दो दिनों पहले यह सुना. योगदा मठ के स्वामी विश्वानंद से . अवसर था, महर्षि योगदानंद की बहचर्चित पुस्तक ‘ऑटोबायोग्राफ़ी ऑफ़ ए योगी’ का लोकार्पण. योगदा आश्रम में. झारखंड के राज्यपाल मुख्य अतिथि थे. देश-दुनिया के आये लोग मौजूद थे. विश्वानंद जी मूलत अमेरिकी हैं. अमेरिका से ही आये थे. वहीं रहते हैं. वह बोले अंग्रेजी में ही. उनकी बातों में अदभुत मर्म था. उन्होंने कहा, आज दुनिया इतनी बेचैन क्यों ह़ै? तनाव क्यों है? आतंकवाद क्यों है? वगैरह-वगैरह. इन सबकी जड़ में पश्चिम का भौतिक विकास मॉडल है. पश्चिम इस संकट से उबरने के लिए पूरब की ओर देखता है. पूरब से उनका आशय भारत से था. बहत पहले गांधी के जमाने में महान इतिहासकार प्रो अर्नाल्ड टायनबी ने भी लिखा, भारत की आजादी से पश्चिम को नयी रोशनी मिलेगी. भौतिक ग्रस्त सभ्यता को पूरब से ही नये विचार और जीवनमूल्य मिलेंगे.

पर कहां खो गये भारत के वे मूल्य जिनमें पश्चिम को नयी रोशनी दिखाई देती थी. जिसकी चर्चा टायनबी ने की या योगी विश्वानंदजी ने. डॉ लोहिया ने बहत पहले कहा था, राजनीति अल्पकालिक धर्म है और धर्म दीर्घकालिक राजनीति. जयप्रकाश नारायण ने जब माक्र्सवाद छोड़ा, तो उनके मन में कई नैतिक सवाल उठे थे. यह राजनीति किधर जा रही थी. इसको भारत के ही एक मनीषी राजनेता ने बहत पहले देख लिया था. राजाजी या राजगोपालाचारी ने. 1922 में उन्होंने जेल डायरी में लिखा, जैसे ही हमें आजादी मिलेगी, चुनाव और भ्रष्टाचार, सत्ता और धन का अहं और प्रशासन की इनइफ़ीसियेंसी (अकुशलता) जीवन को नरक बना देगें. लोग पश्चाताप करते हए अतीत को याद करेंगे. पुराने दिनों की तुलनात्मक न्यायपूर्ण व्यवस्था, इफ़िसियेंट सिस्टम (प्रभावकारी व्यवस्था) शांति और कमोबेश ईमानदार प्रशासन को याद करेंगे. (आशय अंग्रेजी राज को बेहतर कहने से है). एक ही उपलब्धि (तात्पर्य आजादी मिलने से) होगी. एक कौम अपमान-अनादर से बचेगी. अधीन होने से बचेगी.

कितने दूरदर्शी और महान थे, ये नेता जिन्होंने भारत का भविष्य 1922 में पढ़ लिया था. खुद तौल लीजिए आज के राजनेताओं की दृष्टि और विजन से. उनमें देवत्व था, तो आज के अधिसंख्य राजनेताओं में क्या है? खुद जज करें. मैं, मेरा परिवार और मेरे नाते-रिश्तेदार. बहत बढ़ेंगे तो बात जाति की करेंगे. सिर्फ़ ठगने के लिए. अपनी ही जाति के गरीबों से कोई धर-छुआव नहीं. चुनाव भर ऐसे नेता जाति की दुहाई देंगे, सत्ता में आते ही अपने भोग की दुनिया में सिमट जायेंगे.

राजनीति भोग की आग में दहक रही है. सारे दल इसी में डूब-उतर रहे हैं. विद्यार्थी था, तो राजनेताओं से सुना. ‘मैन इज पालिटिकल एनीमल’ (मनुष्य राजनीतिक पशु है). आज इस फ्रेज से लगता है, राजनीति हट गयी है? बचपन में बतलाया गया था. इंसान और पशु में क्या फ़र्क है? विवेक, अच्छा-बुरा समझना, दया, धर्म, ममता वगैरह यही न? पर पैसे की भूख ने सब सोख लिया है.

पहले गांव के स्कूलों में सुना. उपदेश. नैतिक पाठ. गीता, उपनिषद, रामायण, महाभारत, बाइबल, कुरान वगैरह के अंश. समझ नहीं थी. पर अच्छी बातें सुहाती थी. आज स्कूलों में एसएमएस की शिक्षा मिलती है. ईल तसवीरों-संदेशों का आदान-प्रदान बचपन से. कच्ची उम्र में अधिक पैसे कमाने का पाठ. बुनियाद से ही. ब्रांडेड चीजों का जमाना है. बाजार के विचार - संस्कृति का दौर. चंद्रशेखरजी अकसर कहा करते थे कि बाजार और करूणा में रिश्ता नहीं होता. यह करूणाविहीन समाज उभर रहा है. पैसों से, भोग से ऐहिक-दैहिक सुख-आनंद पाने के लिए बेचैन. भोग, हवस, तृष्णा, लालसा की आग में झुलसता. यहां न चोरी करने पर शर्म है, न बड़ा से बड़ा अपराध करने पर पश्चाताप. न देशद्रोही होने का अपराध बोध. यह ग्लोबल विलेज का दौर है. समाज अब तपस्वियों-त्यागियों के पीछे नहीं भागता. अब अनीतिकार व पापी भी पूज्य हैं, बर्शते धनवान हों.

क्या कारण था कि गांधी की प्रार्थना सभाओं में जाकर इंसान पवित्र होता था. बुद्धि, विचार और संस्कारों में निर्मल होता था. उसमें नहाता था. सांसारिक मैल धोता था. कैसे बादशाह खां जैसे महान लोग तब थे? कैसे तब ऐसे लोग थे, आज नहीं?

प्रो सीएन वकील देश के बड़े अर्थशास्त्री हए. लंदन स्कूल ऑफ़ इकनॉमिक्स में पढ़े. उन्होंने कहा, अर्थशास्त्र ऐसा विषय है, जो सबको छूता है. स्पर्श करता है. सबको उसकी समझ जरूरी है.

पर धर्म से नैतिक और मूल्यगत पाठ न सीखना या अपनी सभ्यता और संस्कृति को न जानना, गंभीर संकट खड़ा करता है.

आज समाज, देश, राजनीति, परिवार और इंसान, अर्थशास्त्र तो समझ रहे हैं. पहले से अच्छी तरह. पर अन्य चीजें भूल गये हैं. अब नैतिक होना, मूल्यों की बात करना, पुरातनपंथी है. बुर्जुआपना है. आधुनिकता विरोधी है. धर्म और धर्मग्रंथ, अब सिर्फ़ सांप्रदायिक अथाब में चर्चित होते हैं.

आइंसटीन ने कहा था कि अगर मनुष्य और मानवता को बचना है, तो हमें मौलिक ढंग से सोचना होगा. क्या आज रहनुमाई करनेवाला कोई दल, नये विचार-सोच-समझ में सक्षम है? मारकूस अरेलियस ने बहत पहले कहा, अतीत को देखो, न जाने कितनी सभ्यताएं और संस्कृतियां इसमें दफ़न हो गयीं. बड़े-बड़े साम्राज्य हए, जिनकी गूंज दुनिया के कोने-कोने में हई, पर वे राख की तरह मिट गये और गायब हो गये.

इसी तरह हम अपना भविष्य भी आंक सकते हैं. अगर हम नयी राह नहीं चले, झारखंड के इन चुनावों में लोगों के बीच से नये सवाल नहीं उठे, नये राजनीतिक मूल्यों - वसूलों की बात नहीं हई, तो हमारा हश्र भी भिन्न नहीं होगा.

नहीं जानता, यह कहना, लिखना, बोलना लोगों को सुहाता है या नहीं, क्योंकि ये बातें अप्रिय हैं. कटु हैं. धारा के विपरीत हैं. एक ऐंग्लिकन बिशप की कही बात बार-बार याद आती है. 11र्वी शताबदी में कही बात. उन्होंने कहा, जब मैं युवा और आजाद था, मैंने दुनिया बदलने का सपना पाला. वयस्क हआ तो पाया कि संसार नहीं बदल सकता. तय किया अपना ही देश बदलूंगा. कुछ प्रयासों के बाद समझा, यह भी असंभव है. यह प्रयास छोड़ दिया. जीवन का अंतिम पड़ाव था. तब लगा कि अपना परिवार ही बदल दूंगा. लेकिन पाया कि मेरे प्रयासों के बाद भी वे वैसे ही हैं, जैसे तब थे. अब मृत्युशय्या पर हं. अब मेरा मानना है कि मेरा मिशन ही गलत था. मेरा मिशन होना चाहिए था, खुद को बदलना. अगर मैं खुद को बदल पाता, तो शायद अपने परिवार को भी बदल पाने में कामयाब होता. तब अगर थोड़ा भाग्य साथ देता, तो देश को भी बदलने में सफ़लता मिलती. पर कौन जानता है, तब शायद दुनिया भी इस बदलाव से सीखती-समझती. उपनिषदों में मान्यता है, आत्मदीपो भव . हम खुद ही अपने लिए प्रकाश बनें. समाज, राजनीति की बातों को करते हए ऐसे संशय मन में उभरते हैं. कौन सुनता है, धारा के खिलाफ़ की बातों को? यह तो सत्ता सुख, इंद्रिय सुख, धन सुख, अहं सुख की स्पर्धा में पड़ी दुनिया है. कोई किसी की सुनता नहीं. फ़िर भी अपना धर्म है, कहना, सो कहा. बुरा लगे, बातें अटपटी लगे, तो आपसे भी क्षमा.

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