संयुक्त राष्ट्र की बाल अधिकार संधि पर हस्ताक्षर के 20 साल बाद बच्चों की असामयिक मौत में कमी आई है और स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या बढ़ी है. लेकिन यूनिसेफ़ ने कहा है कि एक अरब बच्चों की हालत अब भी बदतर है.
यूनिसेफ़ ने कहा है कि एक अरब बच्चों को आज भी जीवन जीने और विकास के लिए आवश्यक मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल रही हैं. बाल अधिकार संधि की 20 वर्षगांठ पूरी लेकिन बदले नहीं हालात.
संयुक्त राष्ट्र बाल संस्था यूनीसेफ़ ने बच्चों के अधिकारों के लिए 1989 में हुई बाल अधिकार संधि की बीसवीं वर्षगांठ पर दुनिया भर के बच्चों पर एक वार्षिक रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट में पिछले दो दशकों में हासिल उपलब्धियों के साथ भविष्य में आने वाली चुनौतियों का ज़िक्र किया गया है. इस रिपोर्ट में यूनिसेफ़ ने बच्चों की औसत उम्र में वृद्धि को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि माना है. लेकिन दिक़्क़तें फिर भी हैं. धनी देश जर्मनी में भी भी. जर्मनी में संयुक्त राष्ट्र संधि को लागू करने के लिए बनने मोर्चे के प्रवक्ता योर्ग मायवाल्ड कहते हैं, ''सभी बच्चों को शिक्षा का समान अवसर प्राप्त नहीं है. हमारे यहां बच्चों में अधिक ग़रीबी है, स्वास्थ्य के क्षेत्र में मोटापे की समस्या है.बाल अधिकार संधि ने बच्चों को नाम, राष्ट्रीयता, शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य और शोषण से बचाव का अधिकार दिया. यूनिसेफ ने कहा कि बच्चों के ये सारे अधिकार चार मूल सिद्धांतों पर आधारित हैं. इनमें भेदभाव की समाप्ति, बच्चों के सबसे बड़े हित, जीवन जीने और विकास के अधिकार और बच्चों की सोच का सम्मान करना शामिल है.
बच्चों के हित में तय इस संधि को अब तक 193 देशों का समर्थन हासिल है, केवल दो देश अमेरिका और सोमालिया ने अब तक इस पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं. लेकिन भविष्य में वे इस पर अपनी रज़ामंदी दे सकते हैं. यूनिसेफ़ के कार्यकारी निदेशक एन वेनमन ने बाल अधिकार संधि की सराहना करते हुए कहा कि इस संधि की वजह से दुनिया भर के लोगों में बच्चों के प्रति ग़लत व्यवहारों और विचारों को बदल दिया है.
रिपोर्ट में बताया गया कि 1990 से 2008 तक पांच साल से कम उम्र के बच्चों में होने वाली मौतों की संख्या में अट्ठाइस प्रतिशत की कमी हुई है. दूसरी तरफ प्राथमिक स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या भी पहले से बढ़ी है. जहां 2002 में एक करोड़ पन्द्रह लाख बच्चे स्कूल नहीं जा रहे थे, 2007 में यह संख्या घटकर एक करोड़ ही रह गई. इतना ही नहीं स्कूल जा रहे लड़कों और लड़कियों की संख्या में भी पहले की तुलना में कम अंतर रह गया है.युद्ध और संकट क्षेत्रों में बच्चों की सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता है. यूनीसेफ़ जर्मनी के डीटर पूल कहते हैं, ''हम कोशिश कर सकते हैं उन देशों पर राजनीतिक दबाव डालने की जहां बच्चों के लिए ख़ास सुरक्षा पर बातचीत कर रहे हैं.''
हालांकि यूनिसेफ़ ने बच्चों की वर्त्तमान स्थिति पर चिंता जताई है और कहा है कि दुनिया में अभी भी बच्चे निमोनिया, मलेरिया, खसरा और कुपोषण जैसी बीमारियों से मर रहे हैं जिनसे बचाव आसानी से संभव है. दुनिया के कई बच्चे आज तक स्कूल के कमरे तक नहीं गए और लाखों आज भी हिंसा, भेदभाव, उपेक्षा और शोषण के शिकार हैं.
यूनिसेफ़ ने कहा है कि एक अरब बच्चों को आज भी जीवन जीने और विकास के लिए आवश्यक मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल रही हैं. बाल अधिकार संधि की 20 वर्षगांठ पूरी लेकिन बदले नहीं हालात.
संयुक्त राष्ट्र बाल संस्था यूनीसेफ़ ने बच्चों के अधिकारों के लिए 1989 में हुई बाल अधिकार संधि की बीसवीं वर्षगांठ पर दुनिया भर के बच्चों पर एक वार्षिक रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट में पिछले दो दशकों में हासिल उपलब्धियों के साथ भविष्य में आने वाली चुनौतियों का ज़िक्र किया गया है. इस रिपोर्ट में यूनिसेफ़ ने बच्चों की औसत उम्र में वृद्धि को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि माना है. लेकिन दिक़्क़तें फिर भी हैं. धनी देश जर्मनी में भी भी. जर्मनी में संयुक्त राष्ट्र संधि को लागू करने के लिए बनने मोर्चे के प्रवक्ता योर्ग मायवाल्ड कहते हैं, ''सभी बच्चों को शिक्षा का समान अवसर प्राप्त नहीं है. हमारे यहां बच्चों में अधिक ग़रीबी है, स्वास्थ्य के क्षेत्र में मोटापे की समस्या है.बाल अधिकार संधि ने बच्चों को नाम, राष्ट्रीयता, शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य और शोषण से बचाव का अधिकार दिया. यूनिसेफ ने कहा कि बच्चों के ये सारे अधिकार चार मूल सिद्धांतों पर आधारित हैं. इनमें भेदभाव की समाप्ति, बच्चों के सबसे बड़े हित, जीवन जीने और विकास के अधिकार और बच्चों की सोच का सम्मान करना शामिल है.
बच्चों के हित में तय इस संधि को अब तक 193 देशों का समर्थन हासिल है, केवल दो देश अमेरिका और सोमालिया ने अब तक इस पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं. लेकिन भविष्य में वे इस पर अपनी रज़ामंदी दे सकते हैं. यूनिसेफ़ के कार्यकारी निदेशक एन वेनमन ने बाल अधिकार संधि की सराहना करते हुए कहा कि इस संधि की वजह से दुनिया भर के लोगों में बच्चों के प्रति ग़लत व्यवहारों और विचारों को बदल दिया है.
रिपोर्ट में बताया गया कि 1990 से 2008 तक पांच साल से कम उम्र के बच्चों में होने वाली मौतों की संख्या में अट्ठाइस प्रतिशत की कमी हुई है. दूसरी तरफ प्राथमिक स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या भी पहले से बढ़ी है. जहां 2002 में एक करोड़ पन्द्रह लाख बच्चे स्कूल नहीं जा रहे थे, 2007 में यह संख्या घटकर एक करोड़ ही रह गई. इतना ही नहीं स्कूल जा रहे लड़कों और लड़कियों की संख्या में भी पहले की तुलना में कम अंतर रह गया है.युद्ध और संकट क्षेत्रों में बच्चों की सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता है. यूनीसेफ़ जर्मनी के डीटर पूल कहते हैं, ''हम कोशिश कर सकते हैं उन देशों पर राजनीतिक दबाव डालने की जहां बच्चों के लिए ख़ास सुरक्षा पर बातचीत कर रहे हैं.''
हालांकि यूनिसेफ़ ने बच्चों की वर्त्तमान स्थिति पर चिंता जताई है और कहा है कि दुनिया में अभी भी बच्चे निमोनिया, मलेरिया, खसरा और कुपोषण जैसी बीमारियों से मर रहे हैं जिनसे बचाव आसानी से संभव है. दुनिया के कई बच्चे आज तक स्कूल के कमरे तक नहीं गए और लाखों आज भी हिंसा, भेदभाव, उपेक्षा और शोषण के शिकार हैं.
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