कुछ बातें जो संभ्रात इतिहास में दर्ज नहीं की जा सकेंगी

गोपाल दास नीरज मेरे पसंदीदा कवि

हर सुबह जगाने वाले, हर शाम सुलाने वाले
दुःख रचना था इतना जग में, तो फिर मुझे नयन मत देता

जिस दरवाज़े गया ,मिले बैठे अभाव, कुछ बने भिखारी
पतझर के घर, गिरवी थी ,मन जो भी मोह गई फुलावारी
कोई था बदहाल धूप में, कोई था गमगीन छाँवों में
महलों से कुटियों तक थी सुख की दुःख से रिश्तेदारी
हर खेल खिलाने वाले , हर रस रचाने वाले
घुने खिलौने थे जो तेरे, गुड़ियों को बचपन मत देता

गीले सब रुमाल अश्रु की पनहारिन हर एक डगर थी
शबनम की बूंदों तक पर निर्दयी धूप की कड़ी नज़र थी
निरवंशी थे स्वपन दर्द से मुक्त था कोई भी आँचल
कुछ के चोट लगी थी बाहर कुछ के चोट लगी भीतर थी
बरसात बुलाने वाले बादल बरसाने वाले
आंसू इतने प्यारे थे तो मौसम को सावन मत देता

भूख़ फलती थी यूँ गलियों में , ज्यों फले यौवन कनेर का
बीच ज़िन्दगी और मौत के फासला था बस एक मुंडेर का
मजबूरी इस कदर की बहारों में गाने वाली बुलबुल को
दो दानो के लिए करना पड़ता था कीर्तन कुल्लेर का
हर पलना झुलाने वाले हर पलंग बिछाने वाले
सोना इतना मुश्किल था, तो सुख के लाख सपन मत देता

यूँ चलती थी हाट की बिकते फूल , दाम पाते थे माली
दीपों से ज्यादा अमीर थी , उंगली दीप बुझाने वाली
और यहीं तक नहीं , आड़ लेके सोने के सिहांसन की
पूनम को बदचलन बताती थी अमावास की रजनी काली
हर बाग़ लगाने वाले हर नीड़ लगाने वाले
इतना था अन्याय जो जग में तो फिर मुझे विनम्र वचन मत देता

क्या अजीब प्यास की अपनी उमर पी रहा था हर प्याला
जीने की कोशिश में मरता जाता था हर जीने वाला
कहने को सब थे सम्बन्धी , लेकिन आंधी के थे पते
जब तक परिचित हो आपस में , मुरझा जाती थी हर माला
हर चित्र बनने वाले, हर रास रचाने वाले
झूठे थी जो तस्वीरें तो यौवन को दर्पण मत देता

हर सुबह जगाने वाले हर शाम सुलाने वाले
दुःख रचना था इतना जग में तो फिर मुझे नयन मत देता
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अब तुम रूठो, रूठे सब संसार, मुझे परवाह नहीं है।
दीप, स्वयं बन गया शलभ अब जलते-जलते,
मंजिल ही बन गया मुसाफिर चलते-चलते,
गाते गाते गेय हो गया गायक ही खुद
सत्य स्वप्न ही हुआ स्वयं को छलते छलते,
डूबे जहां कहीं भी तरी वहीं अब तट है,
अब चाहे हर लहर बने मंझधार मुझे परवाह नहीं है।
अब तुम रूठो, रूठे सब संसार, मुझे परवाह नहीं है।

अब पंछी को नहीं बसेरे की है आशा,
और बागबां को न बहारों की अभिलाषा,
अब हर दूरी पास, दूर है हर समीपता,
एक मुझे लगती अब सुख दुःख की परिभाषा,
अब न ओठ पर हंसी, न आंखों में हैं आंसू,
अब तुम फेंको मुझ पर रोज अंगार, मुझे परवाह नहीं है।
अब तुम रूठो, रूठे सब संसार, मुझे परवाह नहीं है।

अब मेरी आवाज मुझे टेरा करती है,
अब मेरी दुनियां मेरे पीछे फिरती है,
देखा करती है, मेरी तस्वीर मुझे अब,
मेरी ही चिर प्यास अमृत मुझ पर झरती है,
अब मैं खुद को पूज, पूज तुमको लेता हूं,
बन्द रखो अब तुम मंदिर के द्वार, मुझे परवाह नहीं है।
अब तुम रूठो, रूठे सब संसार, मुझे परवाह नहीं है।

अब हर एक नजर पहचानी सी लगती है,
अब हर एक डगर कुछ जानी सी लगती है,
बात किया करता है, अब सूनापन मुझसे,
टूट रही हर सांस कहानी सी लगती है,
अब मेरी परछाई तक मुझसे न अलग है,
अब तुम चाहे करो घृणा या प्यार, मुझे परवाह नहीं है।
अब तुम रूठो, रूठे सब संसार, मुझे परवाह नहीं है।
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दर्द दिया है, अश्रु स्नेह है, बाती बैरिन श्वास है,
जल-जलकर बुझ जाऊँ, मेरा बस इतना इतिहास है !

मैं ज्वाला का ज्योति-काव्य
चिनगारी जिसकी भाषा,
किसी निठुर की एक फूँक का
हूँ बस खेल-तमाशा

पग-तल लेटी निशा, भाल पर
बैठी ऊषा गोरी,
एक जलन से बाँध रखी है
साँझ-सुबह की डोरी
सोये चाँद-सितारे, भू-नभ, दिशि-दिशि स्वप्न-मगन है
पी-पीकर निज आग जग रही केवल मेरी प्यास है !
जल-जलकर बुझ जाऊँ, मेरा बस इतना इतिहास है !!

और गुलज़ार ने कहा

वो जो शायर था चुप सा रहता था


वो जो शायर था चुप- सा रहता था
बहकी- बहकी सी बातें करता था
आँखें कानों पे रख के सुनता था

गूंगी खामोशियों की आवाजें
जमा करता था चाँद के साए
और गीली- सी नूर की बूँदें
रूखे- रूखे से रात के पत्ते

ओक में भर के खरखराता था
वक्त के इस घनेरे जंगल में
कच्चे- पक्के से लम्हे चुनता था
हाँ वही, वो अजीब सा शायर

रात को उठ के कोहनियों के बल
चाँद की ठोडी चूमा करता था
चाँद से गिरकर मर गया है वो
लोग कहते है खुदखुशी की है..

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