वादे शंभंगुर
यादो में हर लम्हा गुज़रे...
वादे आज का अक्स,
यादो में कल की मौत..
जिन वादों में तुम बीते थे..
उन यादो में हम बीतते है..
फर्क पूछते है वो हमसे...
वादे तेरे मेरे
यादे सिर्फ मेरी....
आगे बढा
खुद को हल्का पा
ठहर गया
मुड कर देखा तो
खुद को वहीँ अकेला बैठा पाया
जहाँ से उठा था
मै देख रहा था खुद को
उन्हीं आँखों से
जो मुझे देख गीलीं हो रही थी
यादो में हर लम्हा गुज़रे...
वादे आज का अक्स,
यादो में कल की मौत..
जिन वादों में तुम बीते थे..
उन यादो में हम बीतते है..
फर्क पूछते है वो हमसे...
वादे तेरे मेरे
यादे सिर्फ मेरी....
तर्कों और शब्दों के कसौटी की बात बेमानी लगने लगे, लफ्ज़ टूटने लगें, वाक्य का तरम्य धूमिल होने लगे और जब व्याकरण पर भावना हावी होने लगे तो समझो कविता बन रही, वास्तव में कविता शाश्वत अभिव्यक्ति है सो लिखे जाने से अधिक भावनाओ की आवश्यकता पाठक को होती है, स्मिता की ये कविता परिचायक है उस स्थिति की जहाँ कवि का विद्रोह समर्पण करता दिख रहा है, दो शब्दों को दो काल और दो स्थितियों में ढाल कर प्रस्तुत करना कोई आसन काम नही! कविता पढ़ते पढ़ते लगता है की कोई पेंटिंग कर रहे हैं या कोई रचना कर्म हो जैसे कोई अलगाव की घड़ी आजाये या किसी शिशु का जनम ...................................
स्मिता मनोविज्ञान की छात्रा और चंडीगढ़ चाइल्ड लाइन की समन्वयक है, उन्हें उनके पिता श्री ने पीएचडी करने को कहा है मुझे उम्मीद है वो ऐसा करेंगी, आख़िर हमें एक बेहतर मनोवैज्ञानिक को ज़रूरत है, स्मिता के बारे में अगर बताऊँ तो उनसे पहली मुलाकात अभी इसी महीने हुई जब वो एक कार्यशाला में लखनऊ जा रही थी और मैं भी, कुछ देर ट्रेन में बातें हुयी अच्छा लगा, (वैसे अच्छा वच्छा मुझे कम ही लगता है) वो एक बेहतर श्रोता हैं और स्वाभाविक है एक बेहतर वक्ता भी उनमे जो सबसे अच्छी बात है वो है उनका संतुलित व्यव्हार और अधिक से अधिक जानने की न केवल इच्छा आपितु प्रयास!!
अगर वो कवितायें करें तो यकीनन उनके भीतर का द्वंद ठोस आकर ले कर विचार बनायेगा, वो एक मानवीय मानव और सहनशील सामाजिक कार्यकर्त्ता है।
हाँ अगर मुझसे पूछो तो मैं कहूँगा "न उड़ा यूं ठोकरों से मेरी ख़ाक-ऐ-कब्र ऐ जालिम, यही ले दे रह गयी है मेरे प्यार की निशानी"। या फिर शायद ये कहूँ
मै उठाअगर वो कवितायें करें तो यकीनन उनके भीतर का द्वंद ठोस आकर ले कर विचार बनायेगा, वो एक मानवीय मानव और सहनशील सामाजिक कार्यकर्त्ता है।
हाँ अगर मुझसे पूछो तो मैं कहूँगा "न उड़ा यूं ठोकरों से मेरी ख़ाक-ऐ-कब्र ऐ जालिम, यही ले दे रह गयी है मेरे प्यार की निशानी"। या फिर शायद ये कहूँ
आगे बढा
खुद को हल्का पा
ठहर गया
मुड कर देखा तो
खुद को वहीँ अकेला बैठा पाया
जहाँ से उठा था
मै देख रहा था खुद को
उन्हीं आँखों से
जो मुझे देख गीलीं हो रही थी

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