कुछ बातें जो संभ्रात इतिहास में दर्ज नहीं की जा सकेंगी

गवनबस : अर्थ, उपयोग और प्रासंगिकता

राजनीति या समाज या देश में गवनबस का मुद्दा निर्णायक बन रहा है. जाति, धर्म या भावात्मक मुद्दे पीछे हट रहे हैं. धीरे-धीरे. चुनाव में और सार्वजनिक जीवन में, गवनबस से जुड़े सवाल उछल-उठ रहे हैं. पर यह गवनबस है, क्या? इसकी परिभाषा क्या है? अवधारणा क्या है? अर्थ क्या है? इसे साफ़-साफ़ समझना है, इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि समझनी है, तो द इनटेलिजेंट पर्सन्स गाइड टू गुड गवनबस Þोष्ठ पुस्तक है. लगभग 200 पेजों की किताब. इसका प्रकाशन सेज ने किया है. कीमत है, 270 रूपये. इसके लेखक हैं, जाने माने नाम प्रो सुरेंद्र मुंशी. आइआइएम कोलकाता से रिटायर्ड समाजशास्त्र के प्रोफ़ेसर. प्रो बीजूपाल अब्राहम, आइआइएम कोलकाता में पब्लिक पालिसी के प्रोफ़ेसर. प्रो सोमा चौधरी, समाजशास्त्र विभाग, मिचिगन विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफ़ेसर. सार्वजनिक जीवन में उठ रहे गवनबस की अवधारणा को जो समझना-जानना चाहते हैं, उनके लिए यह जरूरी किताब है. एक ही जगह सब कुछ. इसमें गुड गवनबस की अवधारणा स्पष्ट की गयी है. इस सवाल पर अंतर्राष्ट्रीय सोच क्या है, इस पर भी चर्चा है. राजसत्ता (स्टेट) का रोल क्या है, और लोकतंत्र में इस शब्द का क्या महत्व है, इसका विवेचन है. इस तरह गवनबस का मर्म (एसेंस) बतानेवाली है, यह पुस्तक. गवनबस पर इन दिनों बाजार में अपार साहित्य उपलब्ध है. एक औसत आदमी को भ्रम में डालनेवाली स्थिति. पर यह किताब गवनबस से जुड़े हर पहलू को, एक जगह, एक साथ स्पष्ट करती है. स्टेट (राजसत्ता), मार्केट (बाजार) से आगे जाकर सहभागिता (पार्टनरशिप), जनसहभागिता (पब्लिक पार्टिसिपेशन) के संदर्भ में गवनबस की चर्चा इस पुस्तक में है. लेखक मानते हैं कि व्यवस्था में मौजूद संकटों के समाधान की संभावनाएं भी गवनबस की इसी अवधारणा में निहित है. पुस्तक में कुल छह अध्याय हैं. पहला अध्याय है, द कांसेप्ट आफ़ गुड गवनबस (गुड गवनबस की अवधारणा). इस पर तीन दृष्टि से विचार किया गया है. दूसरा अध्याय है, द रोल आफ़ द स्टेट (राजसत्ता की भूमिका). पांच दृष्टियों से इसे परखा गया है. तीसरा अध्याय है, द थर्ड वे (तीसरा रास्ता). इसे भी तीन पहलुओं से देखा गया है. चौथा अध्याय है, द आइडिया आफ़ सिविल सोसाइटी (सिविल सोसाइटी का विचार). इसे भी तीन नजरों से परखा गया है. अलग-अलग समाजों में सिविल सोसाइटी का अलग-अलग स्वरूप. सिविल सोसाइटी की प्रकृति. क्या सिविल सोसाइटी प्रासांगिक है? पांचवां अध्याय है, बियांड नेशनल बाउंड्रीज (राष्ट्रीय चौहद्दी के बाहर). इसे भी तीन दृष्टि से परखा गया है. छठा अध्याय है, द इश्यू आफ़ डेमोक्रेसी (लोकतंत्र का मुद्दा). इसके चार महत्वपूर्ण पहलुओं पर लेखकों ने गौर किया है. पहला, लोकतंत्र की कमियां. दूसरा, क्या विकल्प है. तीसरा, लोकतंत्र का रास्ता. और चौथा, लोकतांत्रिक विकल्प. परिशिष्ट में भारत के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण विचार है. इज इंडिया अनगवर्नेबल? (क्या भारत शासन से परे है?) इसके साथ ग्रंथ-सूची और अनुक्रमणिका भी पुस्तक में है. द कांसेप्ट आफ़ गुड गवनबस में लेखकों ने एक प्रासंगिक उद्धरण दिया है. यह 1656 का है. आज के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है, बुद्धिमान युवराजों या युवा सम्राटों की प्रशंसा, उनकी सरकार के लिए नहीं, बल्कि उनके गवनबस के लिए होनी चाहिए. इसी तरह गवनबस की अवधारणा पुरानी है. अलग-अलग संगठनों ने भी इस पर अलग-अलग तरह से विचार किया है. पर गुड गवनबस शब्द बड़ा मुद्दा बना, ’80 के दशक के बाद. दो अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं ने इसे मुख्य मुद्दा माना. द वल्र्ड बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने विभिन्न देशों में पॉलिसी प्रक्रिया को गौर करना शुरू किया, जिसके तहत ये संस्थाएं वित्त उपलब्ध कराती थी. वल्र्ड बैंक ने 1992 में गवनबस एंड डेवलपमेंट रिपोर्ट प्रकाशित की. उसमें इसे परिभाषित किया. बताया गया कि देश के ओर्थक और सामाजिक संसाधनों को विकास के लिए इस्तेमाल करने के प्रबंधन में किस तौर तरीके से सत्ता का इस्तेमाल होता है, यही प्रक्रिया गवनबस है. इसमें यह भी जोड़ा गया कि विश्व बैंक के लिए गुड गवनबस ठोस विकास प्रबंधन का पर्याय है. इस तरह खराब गवनबस को साफ़-साफ़ देखा-परखा जा सकता है. इसके कुछ बड़े सूचक हैं. मसलन, सार्वजनिक संसाधनों को निजी लाभ के लिए इस्तेमाल, कानून और तय प्रक्रियाओं के अनुसार काम नहीं करना, कानूनों की अत्यधिक जटिलता. विकास की प्राथमिकताओं के अनुसार संसाधनों का असंगत बंटवारा. इस तरह अलग-अलग ढंग से गवनबस पर विचार किया गया है. प्रो मुंशी ने गवनबस को साफ़ ढंग से परिभाषित किया है. इस पुस्तक का हर अध्याय रोचक है. परिशिष्ट का अध्याय है, क्या भारत अनियंत्रणीय (अनगवर्नेबल) है? क्या शासन की दृष्टि से भारत बेकाबू और बेलगाम है? भारत को लेकर दुनिया में एक उत्सुकता है. ’50 और ’60 के दशकों में पश्चिमी विचारकों ने माना कि इसे नियंत्रित कर पाना,चला पाना कठिन है. नोबल पुरस्कार पाये, प्रो गुन्नार मिर्डेल ने इसे सॉफ्ट स्टेट कहा. माना था कि इसकी कमजोरी और लाचारी, कमजोर राजसत्ता के कारण है. यह शासन से परे है. आज भी राजनीतिज्ञों का उच्छृंखल व्यवहार, भ्रष्टाचार के बड़े मामले बताते हैं कि हमारी व्यवस्था में गंभीर चुनौतियां और कमजोरियां हैं. यह सवाल अक्सर उठता है कि क्या भारतीय डेमोक्रेसी, मोबोक्रेसी में बदल गयी है? इस प्रश्न पर विचार करने के लिए लेखकों ने इस अध्याय में प्रो अतुल कोहली की पुस्तक का उल्लेख किया है. 1990 में प्रो अतुल कोहली ने एक किताब लिखी, डेमोक्रेसी एंड डिस्कंटेंट इंडियाज ग्रोइंग क्राइसिस आफ़ गवर्नेबलिटी. यह चर्चित किताब है. प्रो. कोहली ने ’60 से ’80 के दशकों के बीच भारत के राजनीतिक बदलावों के संदर्भ में यह पुस्तक लिखी. 1985 और 1986 में इस पुस्तक के लिए फ़ील्डवर्क किया. ’89 के आम चुनावों तक यह पुस्तक तैयार हो गयी थी. पर उनके अनुभवों और अध्ययन ने उनके मन में ’89 के चुनावों के पहले ही सवाल खड़ा कर दिया कि आनेवाले वषाब में भारत में एक पार्टी की सरकार या स्थायी सरकार रहना कठिन होगा. जो भारत, ’50 और ’60 के दशकों में स्थिर लोकतंत्र (स्टेबल डेमोक्रेसी) के रूप में देखा जाता था, कोहली का मानना है कि यह लगातार अनियंत्रित और बेकाबू होता जा रहा है. केंद्र और राज्यों में निजी शासन (पर्सनल रूल) के उदाहरण साफ़ देखे जा सकते हैं. नौकरशाही अब न्यूट्रल नहीं रही. समाज के अलग-अलग तबके िहसक और उग्र हो चुके है. अपने-अपने हित साधने के लिए. प्रो कोहली का निष्कर्ष है कि स्टेट (राजसत्ता) इस स्थिति से निबटने में अक्षम-असमर्थ है. फ़लस्वरूप राजसत्ता या तो ऐसी नाजुक परिस्थितियों की अनदेखी करती है, या दबाने की कोशिश? पार्टियों के अंदर की स्थिति का भी जायजा प्रो कोहली ने लिया. इस संदर्भ में वह कांग्रेस पार्टी की अंदरूनी स्थिति का उल्लेख करते हैं. कांग्रेस पार्टी के अंदर की क्षमता, ऐसी परिस्थितियों से निबटने में घटी है. अब पार्टी किसी पर्सनालिटी को आगे कर उसके प्रभाव, उसकी छवि और लोक-लुभावन नारों को इनकैश (भुनाती) कराती है. इस प्रक्रिया में राज्य की संस्थाएं कमजोर हई हैं. और राजनीतिक नेता अधिक निरंकुश (अथॉरिटेरियन). इस स्थिति में पार्टी कार्यकर्ता नेता के प्रति प्रतिबद्धता (लायल्टी) पर निर्भर करता है. पार्टी के संगठन के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का कोई उपयोग या अर्थ नहीं रह गया है. उधर सिविल सोसाइटी से जुड़ी संस्थाओं का क्षय हआ है. इस तरह प्रो कोहली के अध्ययन का सारांश यही है कि संपदा के वितरण को लेकर भी समस्याएं हैं. पर वह मानते हैं कि इससे भी अधिक चुनौतियां, भारतीय राजसत्ता के फ़ेल होने से है. भारतीय राजसत्ता, वैसी मजबूत संस्थाएं नहीं गढ़ पायीं या विकसित कर सकीं, जो ओर्थक विकास या सामाजिक उथल-पुथल या बदलाव से उपजे मुद्दों को हल कर सके. लेखकों ने भवानी सेनगुप्त की पुस्तक इंडिया प्राबलम्स आफ़ गवनबस (1986) का भी हवाला दिया है. यह पुस्तक दिल्ली के सेंटर फ़ॉर पालिसी रिसर्च के तत्वाधान में प्रकाशित हई. प्रो सेनगुप्ता ने पाया है कि सत्ता और जनसमूह के बीच दूरी लगातार बढ़ रही है. राजनीतिक नेता लोगों से लगातार दूर हो रहे हैं. यह कहा जा सकता है कि संसदीय लोकतंत्र का जो मॉडल हमने आयात किया, वह हमारे यहां कारगर नहीं रहा. लेखक मानते है कि आज भारत में बेहतर इफिसियेंसी की जरूरत है. भारतीय समाज के भिन्न तबकों, खासतौर से राजनेताओं को जगने की जरूरत है, ताकि वे भारत को उसकी पूरी क्षमता के उपयोग की स्थिति में पहंचा सकें.

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