कुछ बातें जो संभ्रात इतिहास में दर्ज नहीं की जा सकेंगी

मेरे दोस्तों के नाम

कितने अनजानों से तुमने करा दिय मेरा परिचय

कितने पराए घरों में दिया मुझे आश्रय।
बंधु, तुम दूर को पास
और परायों को कर लेते हो अपना।
अपना पुराना घर छोड़ निकलता हूँ जब
चिंता में बेहाल कि पता नहीं क्या हो अब,
हर नवीन में तुम्हीं पुरातन
यह बात भूल जाता हूँ।


बंधु, तुम दूर को पास
और परायों को कर लेते हो अपना।


जीवन-मरण में, अखिल भुवन में
मुझे जब भी जहाँ गहोगे,
ओ, चिरजनम के परिचित प्रिय!
तुम्हीं सबसे मिलाओगे।

कोई नहीं पराया तुम्हें जान लेने पर
नहीं कोई मनाही, नहीं कोई डर
सबको साथ मिला कर जाग रहे तुम-
मैं तुम्हें देख पाऊँ निरन्तर।


बंधु, तुम दूर को पास
और परायों को कर लेते हो अपना
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मैं अनेक वासनाओं को चाहता हूँ प्राणपण से
उनसे वंचित कर मुझे बचा लिया तुमने।
संचित कर रखूंगा तुम्हारी यह निष्ठुर कृपा

जीवन भर अपने।


बिना चाहे तुमने दिया है जो दान
दीप्त उससे गगन, तन-मन-प्राण,
दिन-प्रतिदिन तुमने ग्रहण किया मुझ को
उस महादान के योग्य बनाकर
इच्छा के अतिरेक जाल से बचाकर मुझे।

मैं भूल-भटक कर, कभी पथ पर बढ़ कर

आगे चला गया तुम्हारे संघान में
दृष्टि-पथ से दूर निकल कर।


हाँ, मैं समझ गया, यह भी है तुम्हारी दया
उस मिलन की चाह में, इसलिए लौटा देते हो मुझे

यह जीवन पूर्ण कर ही गहोगे
अपने मिलने के योग्य बना कर
अधूरी चाह के संकट से
मुझे बचा कर
(रविंदर नाथ टैगोर की गीतांजली के अंश)
बचपन से लेकर आजतक लगातार मेरे दोस्तों ने मुझे रास्ता दिखाया मुझे सराहना दी ताकि मै बिना किसी अलगाव के बिना किसी दबाव के अपने काम में लगा रहूँ अनेक मित्र जिनके बिना मेरा अस्तित्व पुरा नही हो सकता ! आज की इस घड़ी में जब मेरे अधिसंख्यक मित्र मेरे साथ नही तो याद करता हूँ, मेरी प्रेरणा मेरे मित्र

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