कुछ बातें जो संभ्रात इतिहास में दर्ज नहीं की जा सकेंगी

काम वासना और धर्म

खजुराहो जैसा कुछ हिमाचल प्रदेश के चंबा में भी है। भाषा एवं संस्कृति विभाग पुरातत्व विभाग के लिए यहां ऐसी मूर्तिकला होना बेशक अचंभा हो, लेकिन उनके लिए जरूर है जो पर्यटक के रूप में यहां आते हैं।

चंबा में लकड़ी व मंदिरों के बाहर लगे पत्थरों पर बनी कलाकृतियां केवल मध्य व दक्षिणी भारत में ही दिखती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, ये कलाकृतियां करीब 10वीं शताब्दी में उस वक्त बनाई गई थी। जब लोगों का ध्यान काम-वासना से बदल रहा था। लोगों में धार्मिक प्रवृति बढ़ने के कारण उनका इस तरफ मोह भंग हो चुका था। यह देखते हुए धर्मप्रमुखों ने सर्वसम्मति से मंदिरों के बाहर खुजराहो जैसी कलाकृतियां बनवाई।

प्रदेश और खासतौर पर चंबा जिला को देव भूमि कहा जाता है। बावजूद इसके चंबा में मंदिरों के बाहर खजुराहो शैली का इस्तेमाल बताता है कि किसी समय यहां सांस्कृतिक आदान-प्रदान खूब होता था।

खोजबीन के बाद पता चला है कि 10वीं शताब्दी में चंबा के शासक दिल्ली जाते रहते थे जहां से आए कारीगरों ने ये कलाकृतियां बनाई। चंबा में लक्ष्मी नारायण मंदिर, चंपावती मंदिर व चामुंडा माता मंदिर में यह आकृतियां देखी जा सकती हैं। फिलहाल भाषा एवं संस्कृति विभाग इन ऐतिहासिक कलाकृतियों को संभालने में जुटा हुआ है।

उधर, जिला भाषा एवं संस्कृति अधिकारी प्रेम शर्मा के मुताबिक, ये 10वीं शताब्दी में बनी हैं जिन्हें शासकों ने बाहरी कारीगरों से बनवाया होगा।

अब मै कुछ नही कहना चाहता मैंने कहा तो हंगामा ............................

मगर आप सोंचें की जो बात ऊपर लिखी है वो कितनी तर्क सांगत है

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