न च सन्नयसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ 3-4 ॥
अर्थ - मनुष्य न तो कर्मों का आरम्भ किये बिना निष्कर्मता का अनुभव करता है और न कर्मों के त्यागमात्र से सिद्धि को ही प्राप्त होता है।
व्याख्या- ‘न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषो..ते’- कर्मयोग में कर्म करना अत्यन्त आवश्यक है। कारण कि निष्कामभाव से कर्म करने पर ही कर्मयोग की सिद्धि होती है। यह सिद्धि मनुष्य को कर्म किये बिना नहीं मिल सकती। मनुष्य के अन्त:करण में कर्म करने का जो वेग विद्यमान रहता है, उसे शान्त करने के लिये कामना का त्याग करके कर्तव्य-कर्म करना आवश्यक है। कामना रखकर कर्म करने पर यह वेग मिटता नहीं, प्रत्युत बढ़ता है।
‘नैष्कर्म्यम अश्रुते’ पदों का आशय है कि कर्मयोग का आचरण करने वाला मनुष्य कर्मों को करते हुए ही निष्कर्मता को प्राप्त होता है। जिस स्थिति में मनुष्य के कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात् बन्धन कारक नहीं होते, उस स्थिति को ‘निष्कर्मता’ कहते हैं। कामना से रहित होकर किये गये कर्मों में फल देने की शक्ति का उसी प्रकार सर्वथा अभाव हो जाता है, जिस प्रकार बीज को भूनने या उबालने पर उसमें पुन: अंकुर देने की शक्ति सर्वथा नष्ट हो जाती है। अत: निष्काम मनुष्य के कर्मों में पुन: जन्म-मरण के चक्र में घुमाने की शक्ति नहीं रहती।
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवश: कर्म सर्व: प्रकृतिजैर्गुणै: ॥ 3-5 ॥
अर्थ- कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्था में क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता क्योंकि प्रकृति के परवश हुए सब प्राणियों से प्रकृतिजन्य गुण कर्म करवा लेते हैं।
व्याख्या- मनुष्यों की एक ऐसी धारणा बनी हुई है, जिसके अनुसार वे बच्चों का पालन-पोषण तथा आजीविका-व्यापार, नौकरी, अध्यापन आदि को ही कर्म मानते हैं और इनके अतिरिक्त खाना-पीना, सोना, बैठना, चिन्तन करना आदि को कर्म नहीं मानते। इसी कारण कई मनुष्य व्यापार आदि कर्मों को छोड़कर ऐसा मान लेते हैं कि मैं कर्म नहीं कर रहा हूं। परन्तु यह उनकी भारी भूल है। शरीर-निर्वाह-सम्बन्धी स्थूल शरीर की क्रियाएं और नींद, चिन्तन आदि सूक्ष्म-शरीर की क्रियाएं और समाधि आदि कारण शरीर की क्रियाएं ये सब कर्म ही हैं। जब तक शरीरमें अहंता-ममता है, तब तक शरीर से होने वाली मात्र क्रियाएं ‘कर्म’ हैं। कारण कि शरीर प्रकृति का कार्य है, और प्रकृति कभी अक्रिय नहीं होती।
क्रिया मात्र केवल प्रकृति में ही होती है। परन्तु प्रकृति के साथ अपना तादात्म्य स्वीकार करने से मनुष्य प्रकृति जन्य गुणों के अधीन हो जाता है और उसका क्रिया के साथ सम्बन्ध हो जाता है।
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