कुछ बातें जो संभ्रात इतिहास में दर्ज नहीं की जा सकेंगी

अष्टभुजा

"घोड़ों की तरह

हरदम

मुँह लटकाए नहीं रहना चाहिए

मुँह है तो

बोलने के लिए

और हँसने के लिए"


गोबर पाथती हंसा

जब-तब

ऎसे ही सुभाषित कहती है

पता नहीं

यह हंसा भी

किस लोक में रहती है?

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ऊपर-ऊपर

जिसने भी देखा

हर वक़्त

हरा ही दिखा मैं


समूल उखाड़ने पर ही

समझ सके लोग

कि भीतर गहरे तक

मुझ में मूली जैसी सफ़ेदी थी

या गाज़र जैसी लाली।

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कँटीली झाड़ी को

कौन-सा अभिशाप

देंगे आप?


सूअर को, चींटी को

ढाल को, आँसुओं को

आप

देंगे कौन-सा अभिशाप?


बिजली के तार को

राख को

मिट्टी के तेल को

तितहे बेल को

हिजड़े को

पिंजड़े को

कौन-सा अभिशाप

देंगे आप?


केंचुए को

कौए को

रंक को

मुर्दे को

कौन-सा अभिशाप

देंगे आप?


वरदान तो

ये आप से

मांग ही नहीं सकते, ऋषिवर्य!

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प्रेमी जीव हूँ मैं

जबकि दुनिया प्रेम की ही विरोधी है

बहुत तस्कर हैं प्रेम के

बहुत हैं ख़रीददार


कौन-सा बैंक अपने लाकर में रखेगा इसे?

समुद्र में डाल दूँ तो

मैं ही कैसे निकालूंगा बाद में


किसी तारे में

उसकी प्राण-प्रतिष्ठा कर दूँ

कल कैसे खोज पाऊंगा, मैं ही,

आसमान देखकर


एक दिन तो प्रेम

मधु से निकलकर चुपचाप

मिट्टी के तेल में बैठा मिला

एक दिन चांदनी में

किसी पादप की छाया देखकर

भ्रम हो गया मुझे

कि सो रहा है प्रेम


कुछ दिनों के लिए उसे रख दिया था

तुम्हारी आँखों में

कुछ दिनों के लिए

तुम्हारी हथेलियों में

रख दिया था उसे

कुछ दिनों के लिए

बिछा दिया था प्रेम को

पलंग की तरह

जिसके गोड़वारी (पैताने)मैं था

और मुड़वारी (सिरहाने)तुम


जब निकाल दिया तुमने अपने यहाँ से

प्रेम को

वह मुझ से मिला

जैसे निकाल दिया गया आदमी

मैं उसे अपने साथ लाया

उसके हाथ-पैर धुलाए

उसे जलपान कराया

बहलाया-सहलाया

कुछ दिनों बाद उसे

अपने अन्तर्जगत का कोना-कोना दिखलाया


अपने साथ रहते-रहते

जब कुछ-कुछ ऊबने लगा प्रेम

तो उसे मैंने

बालू भरी बाल्टियों की तरह

जगह-जगह रख दिया

नफ़रत की आग बुझाने के लिए


आग बुझाते-बुझाते एक दिन

वह स्वयं झुलसा हुआ आया

दोनों पहिए पंचर साइकिल की तरह लड़खड़ाता


उसी दिन से

मैंने कहीं नहीं जाने दिया अन्यत्र

अपने प्रेम को

शब्दों में रखकर

हो गया निश्चिन्त

कि उसके लिए

कविता से आदर्श और अच्छी

दूसरी कोई जगह नहीं

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जो रोशनी में खड़े होते हैं वे

अंधेरे में खड़े लोगों को

तो देख भी नहीं सकते


लेकिन अंधेरे के खड़े लोग

रोशनी में खड़े लोगों को

देखते रहते हैं साफ़-साफ़ ।

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कराह सुनकर

जो न टूटे

नींद नहीं,

मृत्यु है


चाहे जितना थका हो आदमी

और चाहे जब सोया हो ।

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भाग रहा हूं निपट अकेला

खोज रहा उस साथी को

दोनों हाथों में सहमति हो

तो कस लेंगे हाथी को ।

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कविजन खोज रहे अमराई ।

जनता मरे , मिटे या डूबे इनने ख्याति कमाई ॥

शब्दों का माठा मथ-मथकर कविता को खट्टाते ।

और प्रशंसा के मक्खन कवि चाट-चाट रह जाते ॥

सोख रहीं गहरी मुषकैलें, डांड़ हो रहा पानी ।

गेहूं के पौधे मुरझाते , हैं अधबीच जवानी ॥

बचा-खुचा भी चर लेते हैं , नीलगाय के झुंड ।

ऊपर से हगनी-मुतनी में , खेत बन रहे कुंड ॥

कुहरे में रोता है सूरज केवल आंसू-आंसू ।

कविजन उसे रक्त कह-कहकर लिखते कविता धांसू ॥

बाली सरक रही सपने में , है बंहोर के नीचे ।

लगे गुदगुदी मानो हमने रति की चोली फींचे ॥

जागो तो सिर धुन पछताओ , हाय-हाय कर चीखो ।

अष्टभुजा पद क्यों करते हो कविता करना सीखो ॥

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