कल तब उनका दावा था कि वह न टायर्ड हैं और न रिटायर्ड. आज अटल बिहारी वाजपेयी दोनों हैं. हालांकि ओखर तक लखनऊ में कयास लगता रहा कि वह फ़िर लोकसभा का नामांकन करने आयेंगे. इसका कारण भी था. कई बार वह प्रण कर चुके थे कि फ़िर चुनाव नहीं लड़ेंगे. वह प्रण गत पखवारे ही पूरा हुआ. चर्चा उनके चहेते कर रहे थे कि बस दस्तखत अटलजी कर दें, बाकी चुनावी प्रबंधन सब हो जायेगा. बक्से वोटों से भर जायेंगे. यह सब कुछ उन रजवाड़ों की विवाह शैली में होता है, जब वर की अनुपस्थिति में उसकी तलवार के साथ वधू की सप्तपदी हो जाती थी. अंतत भाजपाइयों का विवेक जगा और तब जाना कि महाकालेश्वर का एक चक्र चलता है. उसके मुताबिक जीवन होता है. आबे हयात पीकर कोई नहीं आता. लखनऊ पर अटलजी का फ़िदा होना सहज रहा. उनका नवयौवनकाल इसी नवाबी शहर की गलियों और कूचों से शु हुआ था. चौक की रबड़ी और कचौड़ी के शौकीन अटलजी जीवन के लावण्य और लालित्य भरे पहलुओं में अतीव रुचि लेते रहे. उन्होंने खुद एक महिला रिपोर्टर को एक दफ़ा अविवाहित और ब्रह्मचारी में अंतर समझाया था. उस रिपोर्टर ने नारी-सुलभ उत्कंठा से सवाल किया था कि वह अभी तक गृहस्थी क्यों नहीं बना पाये. ‘‘आपका प्रश्न है या प्रस्ताव?’’ पूछा था अटलीजी ने. यही अटलजी थे, जिन्होंने लखनऊ के सहकारिता भवन में भावुक होकर महिला श्रोताओं की बड़ी संख्या पर कहा था कि करवा चौथ के दिन पूजा छोड़ कर महिलाएं एक कुंवारे को सुनने आयी हैं, जिसके लिए कोई व्रत रखनेवाली भी नहीं हैं.
बात पहली लोकसभा (1952) के चुनाव बाद की है. भारतीय जनसंघ ने तभी गौवध पर कानूनी प्रतिबंध लगाने के लिए जनांदोलन चलाया था. लखनऊ में अटलजी इसका नेतृत्व कर रहे थे. उसी वर्ष (1955) लखनऊ से लोकसभा का उपचुनाव हुआ. विजयलक्ष्मी पंडित ने संयु राष्ट्र सभा में पदाधिकारी बनने के बाद संसद से त्यागपत्र दे दिया था. वह लखनऊ से प्रथम लोकसभा में चुनी गयी थीं. उपचुनाव (1955) हुआ. भारतीय जनसंघ ने 30 वर्षीय अटल को प्रत्याशी बनाया. अचंभा होता है कि पिछले दो महीनों से अटलजी पर लिखे गये सभी विवरणों में जिक्र है कि पहला लोकसभा चुनाव अटलजी 1957 में लखनऊ से हारे मगर बलरामपुर से जीते. यह हम पत्रकारों की कोताही है. पूर्व प्रधानमंत्री के बारे में तथ्य न जानना अक्षम्य है. उपचुनाव से ही संसदीय संघर्ष का प्रारंभ अटलजी का चौक अमीनाबाद की गलियों से हुआ था. चौकवासी और लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र यूनियन के (1958 में ) मंत्री रहे एडवोकेट शंभुनाथ तांगड़ी 1955 के लोकसभा उपचुनाव की बात बताते हैं विजयलक्ष्मी पंडित के त्याग पत्र से उपचुनाव हो रहा था. कांग्रेस की शिवराजवती नेह और प्रजा समाजवादी पार्टी के बाबू त्रिलोकी सिंह में मुकाबला था. तभी तीस वर्षीय अटलजी जनसंघ के प्रत्याशी बने. दो दिग्गज प्रतिद्वंद्वी के सामने खड़े इस युवा अटल ने खुनखुनजी मार्ग पर खटिक सब्जीवालों से अपना प्रचार अभियान शु किया था. उनके साथ एकमात्र प्रचारक देवीप्रसाद अग्रवाल गोटेवाले थे. दीपक के निशान पर वोट मांग रहे थे, मगर उधर वे भाजीवाले थे कि अपने तराजू में ही मग्न रहे, अनसुनी करते रहे. फ़िर अटलजी को रिक्शे पर बैठा कर अमीनाबाद के लिए देवीप्रसाद ने रवाना किया. इतने अकेले थे अटलजी कि मैंने उनका साथ देना चाहा, पर मेरे पास साइकिल न थी और बस के लिए जेब में इकन्नी भी न थी. मैं उनके साथ रिक्शे में बैठ न सका. प्रधानमंत्री बने अटलजी की तब की एकाकी दशा ऐसी थी. फ़िर कई चुनाव अटलजी लड़े. खासियत यह रही कि हर बार उनके विरोधियों को उनका मुकाबला करने में सक्षम प्रत्याशी खोजना पड़ता था. कभी फ़िल्मी लोग जैसे राजबब्बर और मियां मुजफ्फ़र अली और साथ में धरती पकड़ काका जोगिंदर सिंह, नामी-गिरामी वकील और उनकी राजग काबीना में नगर विकास मंत्री रहे रामचंद बूलचंद जेठमलानी, कश्मीर के डा कर्ण सिंह वगैरह. मगर जीते हर बार अटलजी, वह भी लंबी मार्जिन से. लखनऊ के तीन लाख द्विज मतदाता भी आंख मूंद कर इस मांसाहारी, सोमरसी विप्र को वोट देते रहे.लखनऊ के जनजीवन में सांसद अटल बिहारी वाजपेयी ऐसे पैठ रहे हैं, जैसे गोमती का जल और दशहरी आम. हालांकि संयोग है कि प्रदूषित गोमती डरावनी बन गयी और आम भी आमजन की क्रयश िसे दूर हो गया है. यह अतिरंजना नहीं है कि लखनऊ और अटलजी में सात दशकों के दौरान अभिन्नता आ गयी है. कई कारण रहे, उदाहरण भी हैं. अमीनाबाद की मारवाड़ी गली की कोठरी में ईंट के तकिये और पुराने अखबारों के बिछौने पर रात गुजारना, ‘राष्ट्रधर्म’ की प्रूफ़ रीडिंग करने से संपादन तक करना, फ़िर बंडल बांध कर भिजवाना, इन सबने युवा अटल का लखनऊ से शुरुआती नाता रचा था.यूं तो अटलजी जब भी लखनऊ आते तो प्रेस मीट में आत्मीयता से मिलते. पिछली बार कुछ वर्षो पूर्व आये थे, तो वय का असर गोचर था, स्मृति पर विशेष कर. इस अंतराल के बाद समीप से अटलजी को निहारा तो तुलना में मंजर ही काफ़ी भिन्न दिखा था. जनसभा में उनके एक पुराने प्रशंसक ने कहा भी ‘‘वे ऐसे कैसे हो गये?’’ बस प्रश्न यह है कि वह वैसे क्या थे, जो ऐसे हो गये? उनके लोकाधार का पैमाना उतार पर दिखा. जो पहले ऊर्जावान थे, अब बोझिल नजर आये. निदान का प्रयास करें कि यह सब क्यों हुआ, कब हुआ और ओखर हुआ तो कैसे? एक कवि सत्ता के गलियारे में गुम हो गया. एक राजनेता साझा-दलीय समीकरणों में उलझ गया. अपनों के बोझ तले ही दब गया. लखनऊ में पिछले प्रवास के दौरान अटलजी में एक अभाव बहुत अखरा, खासकर इसलिए कि 1955 के लोकसभा उपचुनाव से उन्हें देखता-जानता रहा हूं. इस बार विनोदी स्वभाव दर्शाने के लिए उन्हें सायास कोशिश करनी पड़ रही थी. अभिव्य िमें विनोदी पुट मसाले का काम करता है, वरना बेस्वाद दाल लगती है. अटलजी तो शब्दों के बाजीगर हैं. लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने उनकी जिह्वा पर सरस्वती का वास देखा था. भारत में जार्ज फ़र्नाडीज को छोड़ कर अटलजी का वा के रूप में कोई सानी नहीं है. ग्वालियर के स्कूल में पहली बार रट कर वाद-विवाद प्रतियोगिता में बोले थे. बीच में भूल कर, भाषण अधूरा छोड़ आनेवाले अटलजी जब बोलते थे, तो श्रोता बीन सुन कर फ़न फ़ैलानेवाले मुग्ध सरीसृप जैसे हो जाते हैं. किंतु उस दिन लखनऊ में लगा नाग अपना मणि कहीं खो आया है, मृग बिना कस्तूरी के आ गया है. न आभा थी, न सुगंध! सिर्फ़ दो हल्के-फ़ुल्के से उदगार सुनाई दिये. वहीं विनोदी स्वभाव की झलक थी उनमें जब मैंने इंटरव्यू के लिए समय मांगा था. वह तब पड़ोस ही में अतिविशिष्ट गेस्ट हाउस में ठहरे थे. फ़ोन पर बोले ‘‘अभी चले चले आओ.’’ तब मैं छुट्टी मना रहा था, दो दिन से दाढ़ी नहीं बनायी थी. मैंने कुछ समय मांगा कि दाढ़ी बना कर पहुंच जाऊंगा. अटलजी हंसे, फ़िर बोले, ‘‘ठीक है, दाढ़ी जरा अच्छी तरह साफ़ करके ही आइयेगा.’’ अटलजी से जुड़ा हुआ एक चुनावी दुष्प्रचार का उल्लेख आवश्यक है, क्योंकि जब-जब अटलजी नामांकन करते थे, उनके खिलाफ़ यह गड़ा मुर्दा पैदा हो जाता है कि 1942 में उन्होंने देशद्रोह किया था. अपर्याप्त साक्ष्य के कारण इतिहास के तराजू पर अक्सर जनश्रुतियां ही पसंगे का रोल करती है. घटना को झुठलाती हैं. यही हुआ, जब इतिहासवेत्ता प्रो इरफ़ान हबीब ने 13 वें आम चुनाव के दौरान लखनऊ में (सितंबर 26, 1999) अटल बिहारी वाजपेयी को ब्रिटिश राज का मुखबिर बताया था. अटल बिहारी वाजपेयी ने यदि जो कुछ भी 1942 में किया होगा, वह 17 साल के कमसिन, देहाती लड़के की आयु में किया था. आज इतने विकसित सूचना तंत्र के युग में, एक 17 वर्षीय किशोर की सूझबूझ, सोच और रुचि कितनी परिपक्व होती है, इससे सभी अवगत हैं. सात दशक पूर्व गुलाम भारत के ग्वालियर रजवाड़े के ग्रामीण अंचल में अटल बिहारी वाजपेयी कितने समझदार रहे होंगे? इस कसौटी पर समूचे मसले को जांचने की आवश्यकता हैं. क्रमवार घटनाओं का विवरण देखें. सर्वप्रथम राजनीतिक तौर पर नयी दिल्ली की लोकसभा सीट के चुनाव-अभियान (1971) में कांग्रेस के शशिभूषण वाजपेयी ने इस बात को प्रचारित किया था कि भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष रहे पंडित अटल बिहारी वाजपेयी ने ग्राम बटेश्वर कांड (1942) में ब्रिटिश सरकार के पक्ष में बयान दिया था, जिसके आधार पर राष्ट्र भक्तों को सजा दी गयी थी. वह दौर चुनावी था, जब इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ के नारे पर लोकसभा में बहुमत पाया था. सोवियत कम्युनिस्टों का प्रभाव भारत में चढ़ाव पर था. फ़िर मुंबई के साप्ताहिक ‘ब्लिट्ज’ (9 फ़रवरी 1974) ने इस विषय को तोड़-मरोड़ कर लिखा था. तत्पश्चात 1989 के लोकसभा निर्वाचन के दौरान जब पूरा देश तोप की दलाली (बाफोर्स) के मुद्दे पर वोट दे रहा था, तो राजीव गांधी की नेतृत्ववाली कांग्रेस ने अटल बिहारी वाजपेयी पर ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के साथ धोखा देने का आरोप लगाया था. जिस बयान के आधार पर अटल को आज तक हर चुनाव के समय लांछित और प्रताड़ित किया जाता हैं, वह फ़ारसी में लिखा दस्तावेज है. इसमें बटेश्वर गांव में 27 अगस्त 1942 की पूरी घटना का विवरण युवा अटल की जुबानी है. अंतिम अनुच्छेद में केवल एक वाक्य है, जिस पर व्याख्याकारों ने अपनी मंशा तथा आवश्यकता के अनुसार आख्या लिखी है. यह अनूदित वाक्य है किशोर अटल की जुबानी ‘‘मैंने सरकारी इमारत गिराने में कोई मदद नहीं की.’’ दो सौ लोगों के हुजूम में एक 17 साल का देहाती छात्र कितना कर पाता? एक साधारण स्कूल मास्टर कृष्णबिहारी वाजपेयी का छोटा बेटा अटल कम से कम राष्ट्रवादियों के जत्थे में शामिल होकर 1942 में तेईस दिवस जेल तो काट आया. इस उम्र में कितने कांग्रेसी और कम्युनिस्ट अंगरेजी पुलिस के थाने में एक दिन भी रहे थे? अब इन अदालती तथ्यों पर भी गौर कर लें, ताकि भ्रांतियां दूर हो जाये. युवा अटल ब्रिटिश हुकूमत के इकबालिया गवाह (एप्रूवर) नहीं थे. अभियोजन पक्ष ने उन्हीं के साथियों के विरुद्ध उन्हें साक्षी नहीं बनाया था. अपने बचाव में, रिहाई के हक में युवा अटल ने कोई भी माफ़ीनामा नहीं लिखा था. उनके बयान को किसी सबूत के तौर पर भी प्रस्तुत नहीं किया गया था. उपरो तथ्य उस पत्रकारी जांच से उजागर हुए हैं, जिसे दैनिक ‘हिंदू’ के साप्ताहिक ‘द फ्रंट लाइन’, के माक्र्सवादी संपादक एन राम ने अपने तीन विशेष संवाददाताओं की खोजी टीम से करायी थी. (द फ्रंटलाइन, मदास, फ़रवरी 20, 1998, पृष्ठ 115 से 127). पिछले माह तक अटल बिहारी वाजपेयी अपने स्वास्थ्य संबंधी अफ़वाहों को नकारते रहे, मगर वर्षो पूर्व ‘धर्मयुग’ में उनकी छपी कविता याद आती है कि ‘मौत से ठन गयी.’ तब उनका एक गुर्दा निकाल दिया गया था. न्यूयार्क में परीक्षण भी हुआ था. एक बार उनसे पूछा भी किसी ने कि आपकी मनोकामना क्या है. अटलजी बोले, ‘‘हंसते-हंसते मरना है. मरते-मरते हंसना है.’’ लेकिन उनके भाजपाई संगी-साथियों के क्रियाकलाप किसी और दिशा में चलते हैं. आज किसी भी पार्टी में अटल के समकक्ष कोई राजनेता नहीं है. बौनों के समाज में दिल भी छोटा होता है, शरीर के आकार के मुताबिक. भारतीय जनता पार्टी इन बौनी पार्टियों के वर्ग में वापस लौट रही है, शायद!
बात पहली लोकसभा (1952) के चुनाव बाद की है. भारतीय जनसंघ ने तभी गौवध पर कानूनी प्रतिबंध लगाने के लिए जनांदोलन चलाया था. लखनऊ में अटलजी इसका नेतृत्व कर रहे थे. उसी वर्ष (1955) लखनऊ से लोकसभा का उपचुनाव हुआ. विजयलक्ष्मी पंडित ने संयु राष्ट्र सभा में पदाधिकारी बनने के बाद संसद से त्यागपत्र दे दिया था. वह लखनऊ से प्रथम लोकसभा में चुनी गयी थीं. उपचुनाव (1955) हुआ. भारतीय जनसंघ ने 30 वर्षीय अटल को प्रत्याशी बनाया. अचंभा होता है कि पिछले दो महीनों से अटलजी पर लिखे गये सभी विवरणों में जिक्र है कि पहला लोकसभा चुनाव अटलजी 1957 में लखनऊ से हारे मगर बलरामपुर से जीते. यह हम पत्रकारों की कोताही है. पूर्व प्रधानमंत्री के बारे में तथ्य न जानना अक्षम्य है. उपचुनाव से ही संसदीय संघर्ष का प्रारंभ अटलजी का चौक अमीनाबाद की गलियों से हुआ था. चौकवासी और लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र यूनियन के (1958 में ) मंत्री रहे एडवोकेट शंभुनाथ तांगड़ी 1955 के लोकसभा उपचुनाव की बात बताते हैं विजयलक्ष्मी पंडित के त्याग पत्र से उपचुनाव हो रहा था. कांग्रेस की शिवराजवती नेह और प्रजा समाजवादी पार्टी के बाबू त्रिलोकी सिंह में मुकाबला था. तभी तीस वर्षीय अटलजी जनसंघ के प्रत्याशी बने. दो दिग्गज प्रतिद्वंद्वी के सामने खड़े इस युवा अटल ने खुनखुनजी मार्ग पर खटिक सब्जीवालों से अपना प्रचार अभियान शु किया था. उनके साथ एकमात्र प्रचारक देवीप्रसाद अग्रवाल गोटेवाले थे. दीपक के निशान पर वोट मांग रहे थे, मगर उधर वे भाजीवाले थे कि अपने तराजू में ही मग्न रहे, अनसुनी करते रहे. फ़िर अटलजी को रिक्शे पर बैठा कर अमीनाबाद के लिए देवीप्रसाद ने रवाना किया. इतने अकेले थे अटलजी कि मैंने उनका साथ देना चाहा, पर मेरे पास साइकिल न थी और बस के लिए जेब में इकन्नी भी न थी. मैं उनके साथ रिक्शे में बैठ न सका. प्रधानमंत्री बने अटलजी की तब की एकाकी दशा ऐसी थी. फ़िर कई चुनाव अटलजी लड़े. खासियत यह रही कि हर बार उनके विरोधियों को उनका मुकाबला करने में सक्षम प्रत्याशी खोजना पड़ता था. कभी फ़िल्मी लोग जैसे राजबब्बर और मियां मुजफ्फ़र अली और साथ में धरती पकड़ काका जोगिंदर सिंह, नामी-गिरामी वकील और उनकी राजग काबीना में नगर विकास मंत्री रहे रामचंद बूलचंद जेठमलानी, कश्मीर के डा कर्ण सिंह वगैरह. मगर जीते हर बार अटलजी, वह भी लंबी मार्जिन से. लखनऊ के तीन लाख द्विज मतदाता भी आंख मूंद कर इस मांसाहारी, सोमरसी विप्र को वोट देते रहे.लखनऊ के जनजीवन में सांसद अटल बिहारी वाजपेयी ऐसे पैठ रहे हैं, जैसे गोमती का जल और दशहरी आम. हालांकि संयोग है कि प्रदूषित गोमती डरावनी बन गयी और आम भी आमजन की क्रयश िसे दूर हो गया है. यह अतिरंजना नहीं है कि लखनऊ और अटलजी में सात दशकों के दौरान अभिन्नता आ गयी है. कई कारण रहे, उदाहरण भी हैं. अमीनाबाद की मारवाड़ी गली की कोठरी में ईंट के तकिये और पुराने अखबारों के बिछौने पर रात गुजारना, ‘राष्ट्रधर्म’ की प्रूफ़ रीडिंग करने से संपादन तक करना, फ़िर बंडल बांध कर भिजवाना, इन सबने युवा अटल का लखनऊ से शुरुआती नाता रचा था.यूं तो अटलजी जब भी लखनऊ आते तो प्रेस मीट में आत्मीयता से मिलते. पिछली बार कुछ वर्षो पूर्व आये थे, तो वय का असर गोचर था, स्मृति पर विशेष कर. इस अंतराल के बाद समीप से अटलजी को निहारा तो तुलना में मंजर ही काफ़ी भिन्न दिखा था. जनसभा में उनके एक पुराने प्रशंसक ने कहा भी ‘‘वे ऐसे कैसे हो गये?’’ बस प्रश्न यह है कि वह वैसे क्या थे, जो ऐसे हो गये? उनके लोकाधार का पैमाना उतार पर दिखा. जो पहले ऊर्जावान थे, अब बोझिल नजर आये. निदान का प्रयास करें कि यह सब क्यों हुआ, कब हुआ और ओखर हुआ तो कैसे? एक कवि सत्ता के गलियारे में गुम हो गया. एक राजनेता साझा-दलीय समीकरणों में उलझ गया. अपनों के बोझ तले ही दब गया. लखनऊ में पिछले प्रवास के दौरान अटलजी में एक अभाव बहुत अखरा, खासकर इसलिए कि 1955 के लोकसभा उपचुनाव से उन्हें देखता-जानता रहा हूं. इस बार विनोदी स्वभाव दर्शाने के लिए उन्हें सायास कोशिश करनी पड़ रही थी. अभिव्य िमें विनोदी पुट मसाले का काम करता है, वरना बेस्वाद दाल लगती है. अटलजी तो शब्दों के बाजीगर हैं. लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने उनकी जिह्वा पर सरस्वती का वास देखा था. भारत में जार्ज फ़र्नाडीज को छोड़ कर अटलजी का वा के रूप में कोई सानी नहीं है. ग्वालियर के स्कूल में पहली बार रट कर वाद-विवाद प्रतियोगिता में बोले थे. बीच में भूल कर, भाषण अधूरा छोड़ आनेवाले अटलजी जब बोलते थे, तो श्रोता बीन सुन कर फ़न फ़ैलानेवाले मुग्ध सरीसृप जैसे हो जाते हैं. किंतु उस दिन लखनऊ में लगा नाग अपना मणि कहीं खो आया है, मृग बिना कस्तूरी के आ गया है. न आभा थी, न सुगंध! सिर्फ़ दो हल्के-फ़ुल्के से उदगार सुनाई दिये. वहीं विनोदी स्वभाव की झलक थी उनमें जब मैंने इंटरव्यू के लिए समय मांगा था. वह तब पड़ोस ही में अतिविशिष्ट गेस्ट हाउस में ठहरे थे. फ़ोन पर बोले ‘‘अभी चले चले आओ.’’ तब मैं छुट्टी मना रहा था, दो दिन से दाढ़ी नहीं बनायी थी. मैंने कुछ समय मांगा कि दाढ़ी बना कर पहुंच जाऊंगा. अटलजी हंसे, फ़िर बोले, ‘‘ठीक है, दाढ़ी जरा अच्छी तरह साफ़ करके ही आइयेगा.’’ अटलजी से जुड़ा हुआ एक चुनावी दुष्प्रचार का उल्लेख आवश्यक है, क्योंकि जब-जब अटलजी नामांकन करते थे, उनके खिलाफ़ यह गड़ा मुर्दा पैदा हो जाता है कि 1942 में उन्होंने देशद्रोह किया था. अपर्याप्त साक्ष्य के कारण इतिहास के तराजू पर अक्सर जनश्रुतियां ही पसंगे का रोल करती है. घटना को झुठलाती हैं. यही हुआ, जब इतिहासवेत्ता प्रो इरफ़ान हबीब ने 13 वें आम चुनाव के दौरान लखनऊ में (सितंबर 26, 1999) अटल बिहारी वाजपेयी को ब्रिटिश राज का मुखबिर बताया था. अटल बिहारी वाजपेयी ने यदि जो कुछ भी 1942 में किया होगा, वह 17 साल के कमसिन, देहाती लड़के की आयु में किया था. आज इतने विकसित सूचना तंत्र के युग में, एक 17 वर्षीय किशोर की सूझबूझ, सोच और रुचि कितनी परिपक्व होती है, इससे सभी अवगत हैं. सात दशक पूर्व गुलाम भारत के ग्वालियर रजवाड़े के ग्रामीण अंचल में अटल बिहारी वाजपेयी कितने समझदार रहे होंगे? इस कसौटी पर समूचे मसले को जांचने की आवश्यकता हैं. क्रमवार घटनाओं का विवरण देखें. सर्वप्रथम राजनीतिक तौर पर नयी दिल्ली की लोकसभा सीट के चुनाव-अभियान (1971) में कांग्रेस के शशिभूषण वाजपेयी ने इस बात को प्रचारित किया था कि भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष रहे पंडित अटल बिहारी वाजपेयी ने ग्राम बटेश्वर कांड (1942) में ब्रिटिश सरकार के पक्ष में बयान दिया था, जिसके आधार पर राष्ट्र भक्तों को सजा दी गयी थी. वह दौर चुनावी था, जब इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ के नारे पर लोकसभा में बहुमत पाया था. सोवियत कम्युनिस्टों का प्रभाव भारत में चढ़ाव पर था. फ़िर मुंबई के साप्ताहिक ‘ब्लिट्ज’ (9 फ़रवरी 1974) ने इस विषय को तोड़-मरोड़ कर लिखा था. तत्पश्चात 1989 के लोकसभा निर्वाचन के दौरान जब पूरा देश तोप की दलाली (बाफोर्स) के मुद्दे पर वोट दे रहा था, तो राजीव गांधी की नेतृत्ववाली कांग्रेस ने अटल बिहारी वाजपेयी पर ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के साथ धोखा देने का आरोप लगाया था. जिस बयान के आधार पर अटल को आज तक हर चुनाव के समय लांछित और प्रताड़ित किया जाता हैं, वह फ़ारसी में लिखा दस्तावेज है. इसमें बटेश्वर गांव में 27 अगस्त 1942 की पूरी घटना का विवरण युवा अटल की जुबानी है. अंतिम अनुच्छेद में केवल एक वाक्य है, जिस पर व्याख्याकारों ने अपनी मंशा तथा आवश्यकता के अनुसार आख्या लिखी है. यह अनूदित वाक्य है किशोर अटल की जुबानी ‘‘मैंने सरकारी इमारत गिराने में कोई मदद नहीं की.’’ दो सौ लोगों के हुजूम में एक 17 साल का देहाती छात्र कितना कर पाता? एक साधारण स्कूल मास्टर कृष्णबिहारी वाजपेयी का छोटा बेटा अटल कम से कम राष्ट्रवादियों के जत्थे में शामिल होकर 1942 में तेईस दिवस जेल तो काट आया. इस उम्र में कितने कांग्रेसी और कम्युनिस्ट अंगरेजी पुलिस के थाने में एक दिन भी रहे थे? अब इन अदालती तथ्यों पर भी गौर कर लें, ताकि भ्रांतियां दूर हो जाये. युवा अटल ब्रिटिश हुकूमत के इकबालिया गवाह (एप्रूवर) नहीं थे. अभियोजन पक्ष ने उन्हीं के साथियों के विरुद्ध उन्हें साक्षी नहीं बनाया था. अपने बचाव में, रिहाई के हक में युवा अटल ने कोई भी माफ़ीनामा नहीं लिखा था. उनके बयान को किसी सबूत के तौर पर भी प्रस्तुत नहीं किया गया था. उपरो तथ्य उस पत्रकारी जांच से उजागर हुए हैं, जिसे दैनिक ‘हिंदू’ के साप्ताहिक ‘द फ्रंट लाइन’, के माक्र्सवादी संपादक एन राम ने अपने तीन विशेष संवाददाताओं की खोजी टीम से करायी थी. (द फ्रंटलाइन, मदास, फ़रवरी 20, 1998, पृष्ठ 115 से 127). पिछले माह तक अटल बिहारी वाजपेयी अपने स्वास्थ्य संबंधी अफ़वाहों को नकारते रहे, मगर वर्षो पूर्व ‘धर्मयुग’ में उनकी छपी कविता याद आती है कि ‘मौत से ठन गयी.’ तब उनका एक गुर्दा निकाल दिया गया था. न्यूयार्क में परीक्षण भी हुआ था. एक बार उनसे पूछा भी किसी ने कि आपकी मनोकामना क्या है. अटलजी बोले, ‘‘हंसते-हंसते मरना है. मरते-मरते हंसना है.’’ लेकिन उनके भाजपाई संगी-साथियों के क्रियाकलाप किसी और दिशा में चलते हैं. आज किसी भी पार्टी में अटल के समकक्ष कोई राजनेता नहीं है. बौनों के समाज में दिल भी छोटा होता है, शरीर के आकार के मुताबिक. भारतीय जनता पार्टी इन बौनी पार्टियों के वर्ग में वापस लौट रही है, शायद!
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