कुछ बातें जो संभ्रात इतिहास में दर्ज नहीं की जा सकेंगी

काहे का झग़ड़ा काहे की प्रीत रे..

कहते हैं कि आम आदमी का प्रतिनिधित्व करनेवाला चुनाव है लोक सभा का चुनाव. इसीलिए इसे ‘आम चुनाव’ भी कहते हैं. सिद्धांतत यह सच भी है शायद. लेकिन ड-ाइंग म पोलिटिङ्घस या राजनीति के पिले दरवाजे (राज्यसभा) की शान अब जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों से कहीं ज्यादा दिखती है. सीधे-सीधे वर्तमान केंद्र सरकार के मंत्रियों की ही बात करें तो मामला ङ्घलीयर हो जायेगा. सत्ता की मुख्यधारा में आम जनता के प्रतिनिधि से ज्यादा तवज्जो अब उन्हें मिलता है, जो या तो लोगों द्वारा (लोकसभा चुनाव में) ठुकरा दिये जाते हैं या कभी लोगों का सामना करने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते. एक बानगी देखिए. अभी की केंद्रीय मंत्रिपपरषद में हालिया फेरबदल को परे कर देखें तो 24 मंत्री राज्यसभा से रहे. इनमें 21 कांग्रेस के. सबसे खास बात यह कि इन मंत्रियों के पास कोई ऐरा-गैरा विभाग नहीं, बल्कि सारे महत्वपूर्ण विभाग हैं.

प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह तो खैर राज्यसभा के सदस्य हैं ही, कैबिनेट में पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटील, रक्षा मंत्री एके एंटनी, मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह, ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे, कानून व न्याय मंत्री हंसराज भारद्वाज, आप्रवासी मामलों के मंत्री वायलर रवि, जल संसाधन मंत्री सैफुद्दीन सोज, पेट-ोलियम व प्राकृतिक गैस मंत्री मुरली देवड़ा, पर्यटन व संस्कृति मंत्री अंबिका सोनी, कारपोरेट मामलों के मंत्री प्रेमचंद गुप्ता भी राज्यसभा के ही सदस्य हैं. राज्य मंत्रियों के स्वतंत्र प्रभारवाले मंत्रालय में भी तीन अहम विभागों के मंत्री- श्रम व नियोजन मंत्री ऑस्कर फर्नाडीस, नागपरक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल, सांख्यिकी व योजना क्रियान्वयन मंत्री जीके वासवन भी राज्यसभा सदस्य हैं. इसी तरह राज्यमंत्रियों में भी नौ मंत्री, जिनके जिम्मे कोयला, खनिज, स्टील से लेकर विदेश विभाग तक की जिम्मेदारी है, राज्यसभा से रहे.और, अब ओखर में जरा कु सामान्य जानकापरयां साझा कर लें. शिवसेना सुप्रीमो चुनाव नहीं लड़ते. भाजपा के मुखिया राजनाथ सिंह फिलहाल राज्यसभा की राजनीति कर रहे हैं. पिले वर्ष तक यूपीए सरकार की धुरी बने रहे और तीसरी बार तीसरा मोरचा बनाने में लगे माकपा के प्रकाश करात, सीताराम येचुरी भी राज्यसभा के हैं. भाकपा के एबी वर्धन अभी किसी सदन में नहीं, पर ये सभी चुनाव लड़वा रहे हैं. भाजपा के अरुण जेटली लोकसभा के लफड़े में नहीं पड़ते. उसी तरह रविशंकर प्रसाद वगैरह जैसे कई स्टार भी चुनाव का झंझट नहीं मोल लेना चाहते. शरद बाबु जार्ज साहब को अपने साथ राज्य सभा ले जाना चाहते है । नीतिश जी की सोच है की दोनों साथ होलें मगर जार्ज साहब कहते हैं समाजवादी राज्यसभा की राजनीती नही करते ! मगर जार्ज साहब अब क्या कीजिये गा छोडिये काहे का घग्दा कहे की प्रीत चलता है भाई सब चलता है

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