कुछ बातें जो संभ्रात इतिहास में दर्ज नहीं की जा सकेंगी

सत्ता बदली, सरकारेंबदली पर मुद्दे जस की तस

मुद्दे वही हैं, जो 10 वर्ष पहले हुआ करते थे, बल्कि जनता के सवाल और भी जटिल और उलझ-से गये हैं. त्रस्त आमजन शासन-प्रशासन सबसे क्षुब्ध है. 10 साल पहले जो संकट था, आज और भी भयानक प में सामने है. 1999 में भी झारखंड के लिए सबसे बड़ा मुद्दा रोटी का ही था, 2004 में भी वही सवाल जनता को कचोट रहे थे और आज 2009 में भी वही सवाल बरकरार है. रोजगार की तलाश में पलायन 10 वर्ष पहले भी था, 2004 में भी नहीं थमा और आज वैश्वीकरण और तकनीकी क्रांति के आधुनिकतम दौर में यह कई गुना अधिक बढ़ गया है.1999 में जनता ने 14 में से महज तीन सीटों पर ही भाजपा के विकल्प को मौका दिया था. किंतु 2004 के जनादेश में लोगों ने स्थानीय स्तर पर भाजपा के कई विकल्प ढ़ूंढ लिये. राज्य में महज तीन पार्टियां ही अस्तित्व में थी. 2004 में पांच पार्टियां राज्य में उभर आयीं. 2004 के संसदीय चुनावों में भाजपा के एकमात्र विजयी प्रत्याशी बाबूलाल मरांडी ने भी आगे चल कर भाजपा से नाता तोड़ लिया और अपनी नयी पार्टी झाविमो बना ली.झारखंड में 1999 के लोकसभा चुनाव में कुल मतदान प्रतिशत का 45.48 फ़ीसदी वोट अकेले भाजपा के पाले में गया था. लेकिन अगले संसदीय चुनावों में झारखंड की जनता ने ऊंट की तरह सरपट अपना करवट बदल लिया और भाजपा एक-एक सीट के लिए मोहताज हो गयी. 2004 का जनादेश खंडित रहा, जिसमें कांगेस को छह, झामुमो को चार और राजद को दो सीटें हाथ लगीं. 2004 में 1999 के मुकाबले भाजपा को मिलनेवाले कुल मत में भी करीब 12 फ़ीसदी की गिरावट आयी. मतलब कि आमजन ने भारतीय राजनीति के सबसे बड़े पक्ष और विपक्ष दोनों को जनमुद्दों पर काम का मौका दिया. 2004 के चुनावी परिणामों ने तो स्पष्ट कर दिया था कि भाजपा 1999 से 2004 के बीच जनआकांक्षाओं पर खड़ी नही उतर पायी. लेकिन 2004 से 2009 के बीच के वषरें में जनता यूपीए के कामों से कितनी संतुष्ट रही, यह तो आगामी चुनावों के नतीजे ही बता पायेंगे. लेकिन विगत चुनावी इतिहास पर नजर डालें, तो इतना कहा जा सकता है कि झारखंड की जनता न तो किसी पार्टी विशेष की अंधभक्त है, और न ही किसी कद्दावर नेता की. तभी तो केंद्र में एनडीए शासनकाल में विदेश मंत्री जैसे अति महत्वपूर्ण पद पर काबिज रहे यशवंत सिन्हा को भी हजारीबाग की जनता ने खाई में धकेल दिया था. बिल्कुल वही हाल पूर्व केंद्रीय मंत्री कड़िया मुंडा का भी हुआ था. तमाड़ के हालिया विधानसभा चुनाव में यह दलील और भी मजबूत और सटीक साबित होती है. झारखंडी राजनीति के पुरोधा शिबू सोरेन एक अदने-से राजनीतिज्ञ से हार गये. यह संकेत आगामी चुनावी समीकरणों की भविष्यवाणी को और भी अनिश्चित बना देती है.विस्थापित समुदाय एनडीए और यूपीए के विकल्प की तलाश में है. संथाल परगना क्षेत्र कुछ अचंभित करनेवाले नतीजे दे सकता है. अन्य क्षेत्रों के विस्थापितों के मत भले ही अधिक संख्याबल में न हो, किंतु मतों के बिखराव और उससे भावी समीकरणों में कुछ हद तक हस्तक्षेप की हैसियत अवश्य रखते हैं. किसी भी क्षेत्र विशेष की समस्या पर शायद ही कोई सांसद संसद में मुखर होकर आवाज बुलंद कर पाया हो. कमोबेश पिछले 10 सालों में हरेक सांसद के साथ क्षेत्र में वही बहरापन-अंधापन और संसद भवन में वही गूंगापन हावी रहा. पिछले 10 वषरें में आमजन हर तरफ़ से ठगा-हारा महसूस कर रहा है. इस पार्टी को भी गले लगाया और उस पार्टी को भी. लेकिन सभी ने पीठ पर खंजर ही भोंका. ओदवासी बिलख रहे हैं कि रोज कोई दलाल उनके अपनों को उड़ा ले जा रहा है. झारखंड की राजनीति में समाधान दूर-दूर तलक नजर नहीं आ रहा.(जनमाध्यम शोध संस्थान, रांची)

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