गुलज़ार ने जय हो लिखा तो आस्कर मिल गया भाई
वीरेन्द्र जैन भी लिखते हैं इन्हे क्या मिले आप तय करें मगर मै कहता हूँ की आख़िर सच बोलने का इनाम क्या होना चाहिए
गुलज़ार ने एक फतासी रचना की है मगर
वीरेन्द्र जैन तो सच लिखते हैं मुलाहिज़ा फरमाएं जय हो! |
| | लूट मार के बाद सभी का अपना हिस्सा तय हो जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो जय होदल बदलू वोटों की जय हो संसद में नोटों की जय हो लोकतंत्र की इस चौपड़ में अमरीकी गोटों की जय हो सीनाजोरी करता फिरता हर दलाल निर्भय हो जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो सच पर प्रतिबंधों की जय हो जाँचों के अन्धों की जय हो लोकतंत्र के नाम चल रहे सब काले धंधों की जय हो मतलब तो सीधा सपाट पर पेंचदार आशय हो जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो पंजों की कमलों की जय हो काँटों के गमलों की जय हो कन्याओं पर राम नाम की सेना के हमलों की जय हो गूंगी जनता बहरा शासन अंधा न्यायालय हो जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो और फिर वही कहते है
मानता, मैंने तुझे निशिदिन बुलाया था इस बहाने दर्दो-ग़म को बरगलाया था झेल लूँ गम की जलालत और थोड़ी-सी मौत मुझको दे दे मोहलत और थोड़ी-सी अब न सपने शेष हैं ना काम बाकी है अब न साकी, अब न मय, ना जाम बाकी है शेष पर रिन्दों-सी चाहत, ''और थोड़ी-सी`' मौत मुझको दे दे मोहलत और थोड़ी-सी अब न कोई मुस्कराता उस सलीके से हो गए हैं ज़िन्दगी के रंग फीके से है मगर अटकी मुहब्बत और थोड़ी-सी मौत मुझको दे दे मोहलत और थोड़ी-सी
क्या करे बोल की लैब आजाद हैं तेरे
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