कुछ बातें जो संभ्रात इतिहास में दर्ज नहीं की जा सकेंगी

यदि बहुगुणा, जॉर्ज व अटल मान जाते!

अब 15वीं लोकसभा के निर्वाचन की बेला पर कयास लग रहे हैं कि क्या नेह-गांधी कुटुंब की चौथी पुश्त (राहुल गांधी) शीर्ष पद पर आरूढ़ होगी? तो इस सिलसिले में आठवीं लोकसभा के चुनाव का घटनाक्रम याद आता है. युवा राजीव गांधी सर्वाधिक सीटें जीत कर छठे प्रधानमंत्री बने थे. मगर उनके विजय रथ के पहिये कहीं रुके थे, तो दंडकारण्य के उस पार कृष्णा-गोदावरी के दोआबे में जहां की जलधारा विप्लवी, विद्रोही आंध्र प्रदेश के तरल इतिहास का गवाह रही है. यहीं नंदमूरि तारक रामाराव ने 1984 में कांग्रेस को अपने तेलुगुदेशम पार्टी द्वारा बींध दिया था. अगर बन जाती तो वह घटना आठवीं लोकसभा (1984) में बड़ी ऐतिहासिक होती, मगर घटी ही नहीं. संदर्भ महत्वपूर्ण इसलिए था कि आठवीं लोकसभा में इंदिरा गांधी के बलिदान के नाम पर राजीव गांधी को जितनी सीटें मिलीं, वह उनके नाना या अम्मा को भी नहीं मिली थी. कुल 542 में 415 सीटें जीती थीं राजीव ने. जवाहरलाल नेह का अधिकतम रहा था 371 सीटें 1957 में. और इंदिरा गांधी का गरीबी हटाओ के नारे में 342 रहा 1971 में तथा 353 रहा 1980 में. तब प्याज के बढ़ते दाम, वोट उनको दो जो सरकार चला सके का नारा दिया गया था. खुद इमरजेंसी के बाद 1977 में जनता पार्टी ने 295 सीटें ही हासिल की थी. रामाराव 1984 के लोकसभा चुनाव के समय मुख्यमंत्री का डेढ़ वर्ष का कार्यकाल पूरा कर चुके थे. उन्हीं दिनों एक सप्ताह भर इंदिरा गांधी का शव भी घर-घर में दूरदर्शन के परदे पर दिखाया जा रहा था. लोगों की सहानुभुति राजीव के साथ थी, मगर आंध्र में रामाराव का करिश्मा बना रहा. कांग्रेस जिस राज्य से 42 में से 41 सीटें जीतती रही थी, वहां केवल ह सीटें जीत पायी. उसी दौर की यह बात है. राजीव गांधी के सलाहकारों ने बड़े गोपनीय तौर पर शकुनीवाला पासा फ़ेंका. विपक्ष के जितने दिग्गज थे, उन्हें राजनीतिक रूप से पराजित करने का. अमिताभ बच्चन, माधवराव सिंधिया ओद का ऐन वक्त पर बदले लोकसभा क्षेत्रों से नामांकन दाखिल कराया गया. परिणाम में इतिहास में आठवीं लोकसभा की चर्चा रहेगी कि तब विपक्ष क्लीव ही नहीं, नगण्य भी रहा. कांग्रेस की अभूतपूर्व बढ़त को देखते हुए और गैर-कांगेसवाद के लोहियावादी सपने को आगे बढ़ाते हुए रामाराव ने सुझाव दिया कि भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी हनमकोंडा (वारंगल) से, लोकदल के हेमवती नंदन बहुगुणा मेढ़क से और जनता दल के जार्ज फ़र्नाडीस कर्नूल से लोकसभा का चुनाव लड़ें. तेलुगुदेशम उनका समर्थन करेगी. मगर होना कुछ और ही था. ओखरी वक्त पर अपनी गुना लोकसभा सीट छोड़ कर माधवराव सिधिंया ग्वालियर से अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ़ लड़े और भाजपा प्रत्याशी केवल 28 प्रतिशत वोट ही प्राप्त कर सका. उधर, फ़िल्मी सितारे ने इलाहाबाद लोकसभा सीट पर 68 प्रतिशत वोट पाकर केवल 25 प्रतिशत वोट पाये बहुगुणा को पराजित किया. बेंगलुरु (उत्तर से) जॉर्ज फर्नाडीस 41 प्रतिशत वोट पाकर भी रेल मंत्री सीके जाफ़र शरीफ़ के मुकाबले हार गये.अब देखिए रामाराव की उपलब्धि क्या रही. तब हनमकोंडा से तत्कालीन गृह मंत्री पीवी नरसिंह राव कांग्रेस के उम्मीदवार थे. वह पिछले दोनों आम चुनावों (1977 और 1980) में इस सीट को जीत चुके थे. मगर इंदिरा-बलिदान की आंधी के बावजूद गृह मंत्री राव को जिले स्तर के एक भाजपाई कार्यकर्ता सी जंगा रेड्डी ने 67 प्रतिशत वोट पाकर हराया. रामाराव की तब आकांक्षा थी कि राष्ट-ीय मोरचा बने, जो आंध्र प्रदेश की तरह भारत को भी कांग्रेस से मुक्त करा पाये. उन्हीं के प्रयास से 1984 के प्रारंभ में नयी दिल्ली के आंध्र भवन में गैर-कांग्रेसी नेताओं ने एक ढीले से, अनमने तौर पर मोरचा बनाया. तब वीपी सिंह राजीव गांधी के सर्वाधिक अंतरंग मंत्री थे. बाद में क्या हुआ, कैसे हुआ, यह सब जाना-समझा इतिहास है.

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