ओ मेरी तुम !
दानव के खुनी जबड़े में
पड़ा मेरा प्रेम
मिम्याता रहा किसी मेमने सा
और ओ मेरी "तुम"
निर्विकार "सती" बनी
देखती रही "प्राण नाथ" को काल
के मुंह में समाते
..............................................................................(2).............................................................................
मुझे पता है की जीवन गति के संघर्ष में
हर प्रेम कुचल दिया जाता है
अर्थ के भरी बोझ तले
अक्सर व्यक्तिकता हावी हो जाती है
समर्पण पर और बेचारा प्रेम कराहता हुआ
भोग के पीछे कहीं छिप जाता है
अनंत दिक्कालो से उत्पन्न आशा
की किरण अंधी दौड़ की चकाचौंध में
अपना अस्तित्व खो देतीं हैं
और अबोध प्रेम व्यवह्रिकता
का अभिभावक बन जाता है
दानव के खुनी जबड़े में
पड़ा मेरा प्रेम
मिम्याता रहा किसी मेमने सा
और ओ मेरी "तुम"
निर्विकार "सती" बनी
देखती रही "प्राण नाथ" को काल
के मुंह में समाते
..............................................................................(2).............................................................................
मुझे पता है की जीवन गति के संघर्ष में
हर प्रेम कुचल दिया जाता है
अर्थ के भरी बोझ तले
अक्सर व्यक्तिकता हावी हो जाती है
समर्पण पर और बेचारा प्रेम कराहता हुआ
भोग के पीछे कहीं छिप जाता है
अनंत दिक्कालो से उत्पन्न आशा
की किरण अंधी दौड़ की चकाचौंध में
अपना अस्तित्व खो देतीं हैं
और अबोध प्रेम व्यवह्रिकता
का अभिभावक बन जाता है
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