आई जब उनकी याद तो आती चली गई हर नक़्शे मासिवा को मिटाती चली गई
हर मन्ज़रे जमाल दिखाती चली गई जैसे उन्हीं को सामने लाती चली गई
हर वाक़या क़रीबतर आता चला गया हर शै हसीन तर नज़र आती चली गई
वीराना ए हयात के एक एक गोशे में जोगन कोई सितार बजाती चली गई
दिल फुँक रहा था आतिशे ज़ब्तेफ़िराक़ से दीपक को मेघहार बनाती चली गई
बेहर्फ़ ओ बेहिकायत ओ बेसाज़ ओ बेसदा रग रग में नग़मा बन के समाती चली गई
जितना ही कुछ सुकून सा आता चला गया उतना ही बेक़रार बनाती चली गई
कैफ़ियतों को होश सा आता चला गया बेकैफ़ियतों को नीन्द सी आती चली गई
क्या क्या न हुस्नेयार से शिकवे थे इश्क़ को क्या क्या न शर्मसार बनाती चली गई
तफ़रीक़े हुस्न ओ इश्क़ का झगड़ा नहीं रहातमइज़े क़ुर्ब ओ बोद मिटाती चली गई
मैं तिशना कामे शौक़ था पीता चला गयावो मस्त अंखडि़यों से पिलाती चली गई
इक हुस्ने बेजेहत की फ़िज़ाए बसीत में उठती हुई मुझे भी उठाती चली गई
फिर मैं हूँ और इश्क़ की बेताबियाँ जिगरअच्छा हुआ वो नीन्द की माती चली गई।
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दिल गया रौनके हयात गई ।
ग़म गया सारी कायनात गई ।।
दिल धड़कते ही फिर गई वो नज़र,
लब तक आई न थी के बात गई ।
उनके बहलाए भी न बहला दिल,
गएगां सइये-इल्तफ़ात गई ।
मर्गे आशिक़ तो कुछ नहीं लेकिन,
इक मसीहा-नफ़स की बात गई ।
हाए सरशरायां जवानी की,
आँख झपकी ही थी के रात गई ।
नहीं मिलता मिज़ाजे-दिल हमसे,
ग़ालिबन दूर तक ये बात गई ।
क़ैदे-हस्ती से कब निजात 'जिगर'
मौत आई अगर हयात गई ।
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ये सब्जमंद-ए-चमन है जो लहलहा ना सकेवो गुल हे ज़ख्म-ए-बहाराँ जो मुस्कुरा ना सके
ये आदमी है वो परवाना, सम-ए-दानिस्ताजो रौशनी में रहे, रौशनी को पा ना सके
ये है खुलूस-ए-मुहब्बत के हादीसात-ए-जहाँमुझे तो क्या, मेरे नक्श-ए-कदम मिटा ना सके
ना जाने आखिर इन आँसूओ पे क्या गुजरीजो दिल से आँख तक आये, मगर बहा ना सके
करेंगे मर के बका-ए-दवाम क्या हासिलजो ज़िन्दा रह के मुकाम-ए-हयात पा ना सके
मेरी नज़र ने शब-ए-गम उन्हें भी देख लियावो बेशुमार सितारे के जगमगा ना सके
ये मेहर-ओ-माह मेरे, हमसफर रहे बरसोंफिर इसके बाद मेरी गर्दिशों को पा ना सके
घटे अगर तो बस एक मुश्त-ए-खाक है इंसानबढ़े तो वसत-ए-कौनैन में समा ना सके
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तेरी खुशी से अगर गम में भी खुशी न हुईवोह ज़िंदगी तो मुहब्बत की ज़िंदगी न हुई!
कोई बढ़े न बढ़े हम तो जान देते हैंफिर ऐसी चश्म-ए-तवज्जोह कभी हुई न हुई!
तमाम हर्फ़-ओ-हिकायत तमाम दीदा-ओ-दिलइस एह्तेमाम पे भी शरह-ए-आशिकी न हुई
सबा यह उन से हमारा पयाम कह देनागए हो जब से यहां सुबह-ओ-शाम ही न हुई
इधर से भी है सिवा कुछ उधर की मजबूरीकी हमने आह तो की उनसे आह भी न हुई
ख़्याल-ए-यार सलामत तुझे खुदा रखेतेरे बगैर कभी घर में रोशनी न हुई
गए थे हम भी जिगर जलवा-गाह-ए-जानां मेंवोह पूछते ही रहे हमसे बात ही न हुई
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