समझे वही इसको जो हो दीवाना किसी का 'अकबर' ये ग़ज़ल मेरी है अफ़साना किसी का
गर शैख़ो-बहरमन सुनें अफ़साना किसी का माबद न रहे काब-ओ-बुतख़ाना किसी का
अल्लाह ने दी है जो तुम्हे चांद-सी सूरतरौशन भी करो जाके सियहख़ाना किसी का
अश्क आँखों में आ जाएँ एवज़ नींद के साहब ऐसा भी किसी शब सुनो अफ़साना किसी का
इशरत जो नहीं आती मिरे दिल में, न आए हसरत ही से आबाद है वीराना किसी का
करने जो नहीं देते बयाँ हालते-दिल को सुनिएगा लबे-ग़ौर से अफ़साना किसी का
कोई न हुआ रूह का साथी दमे-आख़िरकाम आया न इस वक़्त में याराना किसी का
हम जान से बेज़ार रहा करते हैं 'अकबर' जब से दिले-बेताब है दीवाना किसी का
वे कौन लोग हैं जो पृथ्वी को नारंगी की शक्ल में देखते हैं और इसे निचोड़कर पी जाना चाहते हैं यह तपी हुई अभिव्यक्ति है उस ताकत के खिलाफ---जो सूरज को हमारे जीवन में---उतरने से रोकती है---जो तिनके सा जला देती है---और कहती है---यह रही तुम्हारे हिस्से की रोशनी।'
कुछ बातें जो संभ्रात इतिहास में दर्ज नहीं की जा सकेंगी
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मन्दिरा इंसान दो तरह के होते हैं! अच्छे लोग और बुरे लोग........मगर इतना भर कह देने से सब कुछ ठीक नहीं होजाता! दुनिया रंगीन है यह...
समझे वही इसको जो हो दीवाना किसी का
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